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करभ

संस्कृत में करभ ऊंट के बच्चे को कहते हैं। परन्तु ऊंट की रास्ता चलते इधर-उधर मुंह मारने की जो प्रवृत्ति होती है उसी को आधार बनाकर संत साहित्य में मन को करभ कहा गया है।

कहा गया कि मन करभ की भांति इधर-उधर भटकता रहता है। मन की इस वृत्ति को रोककर साधक को सीधे अपने ही मार्ग कर चलना चाहिए, ऐसा संतों का मानना है।


Page last modified on Tuesday August 12, 2014 06:41:58 GMT-0000