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काव्य उपरूपक

काव्य एक प्रकार का उपरूपक होता है।

यह उपरूपक एक अंक का होता है। इसमें नायक विप्र, अमात्य, या वणिक होते हैं तथा नायिका कुलजा या वेश्या होती है। इसमें हास्य और श्रृंगार रस होता है।

विदूषक का चरित्र इसमें आवश्यक माना जाता है।

इसमें भग्नताल, मात्रा और लास्य का प्रयोग भी अपेक्षित माना जाता है।

ऐसे उपरूपक का उल्लेख सर्व प्रथम अग्निपुराण में मिलता है।


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