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क्लेश

जीवन में जो कष्ट प्रदान करने वाला कारक है उसको क्लेश कहते हैं। सभी प्रकार के क्लेशों का साधारण लक्षण है कष्टदायकता। परन्तु सामान्य जन कष्ट को ही क्लेश कहते हैं।

योगदर्शन के अनुसार पांच क्लेश हैं - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश। उसके अनुसार इसे दूर करने के लिए क्रिया योग अनिवार्य शर्त है। चित्तवृत्तियों के निरोध से समाधि सम्पन्न होती है और यही समाधि योग है। इसकी प्राप्ति के साथ ही क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

महर्षि व्यास ने इन्हें विपर्यय कहते हुए पांच अन्य नाम बताये हैं। ये हैं - तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्धतामिस्र।

अविद्या को सभी क्लेशों का मूल और पहला कारण माना जाता है। यह प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार नामक चार रूपों में प्रकट होती है।

पातंजल योगसूत्र या योगदर्शन के अनुसार अनित्य, अशुचि, दुःख, तथा अनात्म विषय पर क्रमशः नित्य, शुचि, सुख तथा आत्मस्वरुपता की ख्याति अविद्या है। अर्थात् अविद्या वह ज्ञान है जिससे अनित्य, नित्य जान पड़ता है, अशुचि को शुचि समझा जाने लगता है, दुःख ही सुख जैसा लगता है, और अनात्म है वही आत्म जैसा जान पड़ता है।

शरीर को ही अशुचि अर्थात् अपवित्र माना गया है क्योंकि इसके अन्दर हमेशा ही मल-मूत्र एकत्रित रहते हैं। इसलिए शरीर को पवित्र मान लेना भी अविद्या है। स्थान, बीज, उपष्टम्भ, निस्यन्द, निधन, और आधेयशौचत्व के कारण पंडित जैन शरीर को अशुचि मानते हैं परन्तु अविद्याग्रस्त लोग ऐसा नहीं मानते। अशुचि को शुचि मानने से राग उत्पन्न हो जाता है।

दुःख या दुःखदायक को सुख या सुखदायक मान लेना भी अविद्या है।

वास्तव में अविद्या ही अन्य चारों क्लेशों का मूल है। इसी कारण अविद्या को चार पैरों वाली चतुष्पदा माया कहा गया।

दूसरा क्लेश अस्मिता है। जब व्यक्ति अपनी अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक ही मान बैठता है तो वह दूसरे क्लेश अस्मिता में फंस जाता है। मैं तथा मेरा आदि भाव इसी से उत्पन्न होते हैं।

तीसरा क्लेश राग है जिसकी व्याख्या करते हुए पतंजलि ने कहा कि सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा, या लोभ ही राग है, अर्थात् यह सुखानुशयी है। राग उत्पन्न होते ही व्यक्ति उस व्यक्ति या वस्तु की ओर खिंचा चला जाता है जिसमें उसका राग होता है।

द्वेष नामक चौथा क्लेश दुःखानुशयी है। अर्थात् दुःख या दुःखजनक वृत्तियों के प्रति जिघांसा या क्रोध की अनुभूति ही द्वेष है। जब किसी वस्तु या व्यक्ति को किसी अनुचित या अननुकूल कार्य का कर्ता मान लिया जाता है तो क्रोध, लोभ, जिघांसा, या प्रतिघात की भावना उत्पन्न होती है तथा द्वेष हो जाता है। ऐसा अविद्या के कारण होता है। द्वेष के वश में होकर व्यक्ति क्लेश पाता है।

अभिनिवेश नामक जो क्लेश है उसका मूल भाव अविद्या ही है। इसकी अनुभूति स्वाभाविक रूप से सभी को होती है। यह जिजीविषा का ही दूसरा नाम है। स्वयं का नाश न होने या न मरने की लालसा स्वाभाविक लालसा होती है जो चेतन या अवचेतन में सर्वदा विद्यमान रहती है। प्राणी नित्य मरते हैं पर जो जीवित हैं वे सदैव जीवित रहना चाहते हैं। यही अभिनिवेश है जो तथ्य के विपरीत उत्कट आकांक्षा है। यह अनन्त कष्टों और पीड़ाओं को जन्म देता है। न्याय-अन्याय, कर्म-कुकर्म, अच्छा-बुरा सभी सब-कुछ इसके वशीभूत होकर किये जाते हैं, जबकि उनपर विचारण करना वांछित होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया कि ज्ञानाग्नि दग्ध कर्माणि, अर्थात् कर्मों को तो ज्ञान में तपाकर ही करना चाहिए। परन्तु बिना विचारे व्यक्ति काम करते हुए स्वयं को अनेक बंधनों में अर्थात् अनेक क्लेशों में बांधता रहता है।

कल्याण के लिए तो इन क्लेशों का क्षय आवश्यक है। क्रिया योग की सहायता से योगी इन क्लेशों का क्षय करता है तथा अन्त में परमार्थ सिद्ध करते हुए कैवल्य अवस्था अथवा मोक्ष को प्राप्त करता है।

Page last modified on Wednesday August 27, 2014 08:20:15 GMT-0000