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गांधीवाद

मोहनदास करमचन्द गांधी (1869-1948), जो महात्मा गांधी के नाम से विख्यात हैं, की विचारपद्धति और सिद्धान्तों को गांधीवाद का नाम दिया गया है।

गांधीवाद के अनेक आयाम हैं ठीक उसी प्रकार जैसे गांधीजी के जीवन के अनेक आयाम हैं। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के नेता के रूप में वह राजनेता थे, तो समाज की कुरीतियों को दूर करने के मामले में समाज-सुधारक। धर्मोपदेशक, शिक्षाशास्त्री, अर्थवेत्ता और चिंतक के रूप में भी उनकी ख्याति है।

गाधीवाद का मूल आधार गाधीजी की आत्मानुभूति है। आचार्य विनोबा भावे ने कहा कि गांधीजी समाज की बंधी हुए कल्पनाओं को तोड़ने के स्थान पर उनका परिष्कार कर विकसित रूप प्रदान करना चाहते हैं।

किशोरलाल मशरूवाला ने गाधीवाद को तीन भागों में विभक्त किया है - वर्णव्यवस्था, न्यासी या ट्रस्टीशिप तथा विकेन्द्रीकरण।

वर्णव्यवस्था में सुधार के मामले में उनकी तीन बातें प्रमुख हैं - पारिश्रमिक की समानता, होड़ का अभाव, तथा आनुवांशिक संस्कारों से लाभ उठानेवाली शिक्षण योजना का प्रस्ताव।

न्यासी के भाव के तहत आत्मविश्वास के साथ समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य करना।

विकेन्द्रीकरण के तहत राजसत्ता तथा अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण का प्रस्ताव।

गांधीवाद के तीन आदर्श हैं - सामाजिक आदर्श के रूप में सर्वोदय, जीवन के आदर्श के रूप में सत्याग्रह, तथा शासन के आदर्श के रूप में रामराज्य।

गाधीवाद में शोषकों, अत्याचारियों आदि का हृदयपरिवर्तन करना मुख्य उद्देश्य माना गया है जिसके माध्यम से सर्वोदय की परिकल्पना की गयी है।

गांधीवाद के दो स्तम्भ हैं - सत्य और अहिंसा। सत्य को ईश्वर स्वरूप माना गया है तथा अहिंसा को उसी का दूसरा पहलू माना गया है।

Page last modified on Saturday February 21, 2015 17:52:38 GMT-0000