पिंगलकाव्य
पिंगलकाव्य प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में एक प्रकार का छन्दबद्ध काव्य है, जिसका नाम छन्दशास्त्र के आदिग्रंथ छन्दसूत्र के रचयिता पिंगलाचार्य के नाम पर पड़ा। पिंगलाचार्य को नाग के नाम से भी जाना गया है। पिंगल के सूत्रों पर आधारित रचनाओं को ही वस्तुतः पिंगलकाव्य कहा गया। पिंगल या नाग शब्द का उपयोग इन भाषाओं के लिए भी किया गया। राजस्थान के अनेक कवियों ने जिस भाषा को पिंगल कहा वह ब्रजभाषा ही है। भिखारीदास आर कई अन्य कवियों ने जिसे नागबानी या नागभाषा कहा वह ब्रज भाषा से भिन्न है। अनेक अन्य विद्वानों के अनुसार देशी प्राकृत या अपभ्रंश को पिंगल मान है। राजस्थान, मिथिला, ब्रज आदि में देशी प्राकृत के रुप मिलते हैं।पिंगलकाव्य की परम्परा में पहली प्रमुख रचना है प्राकृतपैंगलम् जिसका काल 14 वीं शताब्दी है। इसमें अनेक कवियों की रचनाएं उदाहरण स्वरुप दी गयी हैं। इस शताब्दी की दूसरी रचना है पृथ्वीराजरासो। इसके रचयिता स्वयं के चंद कहते हैं और पृथ्वीराज का आश्रित भी, जिसके आधार पर इस रचना को 13वीं शताब्दी के होने की संभावना भी व्यक्त की गयी, परन्तु रचना के तथ्यों की ऐतिहासिकता पर संदेह है। बुद्धिरासो नामक एक रचना 14वीं या 15वीं शताब्दी की है जिसके रचनाकार हैं जल्ह। 16वीं शताब्दी की एक रचना है छिताई वार्ता जिनके रचयिताओं के नाम हैं नारायणदास और रत्नरंग। इसमें देवगिरि के यादव राजा रामदेव की कन्या छिताई के अलाउद्दीन द्वारा अपहरण की कथा है। 1443 ई. के आसपास चतुर्भुजदास निगम की रचना है मधुमालती कथा। इस काव्य परम्परा में और भी अनेक रचनाएं की गयी होंगी परन्तु अधिकांश अब उपलब्ध नहीं हैं।
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