शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2006

कौन होगा उत्तर प्रदेश का अगला मुख्य मंत्री

कुछ राज खोलेंगे स्थानीय निकायों के चुनाव

ज्ञान पाठक

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष के प्रारंभ में होने वाले राज्य विधान सभा के चुनाव में बहुमत किसे मिलेगा – सपा को या बसपा को ? राज्य में अगला मुख्यमंत्री कौन होंगे – मुलायम सिंह या मायावती ? उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़े और भी अनेक सवाल हैं जो आज राजनीतिज्ञों और राजनीति में रुचि रखने वालों में ही नहीं बल्कि आम लोगों में भी चर्चा के केन्द्र में हैं। सवाल तो और भी हैं। मसलन, क्या कांग्रेस राज्य की राजनीति में पुनः जीवंत हो सकेगी ? भाजपा का क्या हश्र होगा ? ऐसे सभी सवालों पर अटकलें लगायी जा रही हैं और राजनीतिक पर्यवेक्षक अपने-अपने आकलन पेश कर रहे हैं। लेकिन राज्य की जनता एक सप्ताह के अंदर अपने मूड का खुलासा कर देगी कि वे क्या चाहते हैं।

राज्य की पंचायतों और स्थानीय निकायों के तीन चरणों में होने वाले चुनाव आगामी तीन नवंबर तक समाप्त हो जायेंगे और चुनाव परिणाम आते ही एक ऐसी खिड़की खुल जायेगी जिसमें से झांककर देखने का मौका मिल जायेगा और तब पता लग जायेगा कि राज्य में कौन सी राजनीतिक पार्टी कितने पानी में है। ध्यान रहे कि पहले और दूसरे चरण के चुनावों की तिथियां 28 और 31 अक्तूबर हैं। हालांकि पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव पार्टी उम्मीदवारों के बीच नहीं लड़े जाते, सच तो यह है कि पार्टियों का समर्थन उम्मीदवार विशेष को हासिल होता है, जिनकी जीत और हार के आधार पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियां जनता के मिजाज का पता लगा लेते हैं।

ऐसी स्थिति में राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए स्थिति जटिल हो जाती है क्योंकि आधिकारिक तौर पर पार्टी उम्मीदवारों की घोषणा न होने के कारण उनके समर्थित उम्मीदवारों की गिनती में गड़बड़ी हो जाती है।

राजनीतिक पार्टियों के नेता पूरे राज्य में अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में जोरदार चुनावी अभियान चला रहे हैं क्योंकि पंचायती राज और स्थानीय निकायों के हो रहे इन चुनावों में उनका काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। इसे एक तरह से आने वाले राज्य विधान सभा के चुनावों के लिए सेमीफाइनल के रुप में देखा जा रहा है। इनके परिणामों में विधान सभा चुनाव के परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता है क्योंकि कुछ ही माह बाद विधान सभा के भी चुनाव होंगे। कहना न होगा, जिस पार्टी के समर्थित उम्मीदवारों की जीत सबसे ज्याद होगी उसका हौसला सबसे ज्यादा बुलंद रहेगा और जिनके जितने समर्थित उम्मीदवार हारेंगे उतना ही उनका हौसला पस्त रहेगा। इसका असर चुनाव अभियानों पर पड़ेगा और प्रकारांतर से विधान सभा चुनाव परिणामों पर भी।

यही कारण है कि सभी राजनीतिक पार्टियों के चोटी के नेता भी इन पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव अभियानों में भाग लेते रहे हैं। राज्य की सत्तारुढ़ मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न बन गया है और राज्य के विभिन्न विधान सभाओं के विधायकों के लिए भी। यही कारण है कि चुनाव आयोग को मंत्रियों, विधायकों और सांसदों की संबद्ध निर्वाचन तिथियों में क्षेत्र विशेष में उपस्थिति और आवाजाही को नियंत्रित रखने के आदेश देने पड़े।

पहले से ही राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति बदतर होते जाने के कारण लगभग पूरा राज्य तबाह था। पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनावों के आ जाने के कारण राजनीति और अपराध जगत खुलकर सामने आ गया है। अपराधकर्मियों के मामले में सराकरी तंत्र ने कितनी ढील दे रखी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार को जिंदा और मरे हुए अपराधियों की संख्या तक नहीं मालूम। पुलिस ने चुनावों के मद्देनजर अपराधियों पर कार्रवाई की जो सूची चुनाव आयोग को सौंपी उसमें 10,909 अपराधियों के नाम हैं, और उनमें से 137 कब के मर चुके हैं।

अपराध की दुनिया से आये नेताओं के प्रति मुलायम सिंह का प्रेम तो जगजाहिर है। लेकिन क्या स्थिति हो गयी है इस बात की कल्पना जया प्रदा जैसे व्यक्तित्वों के यह सार्वजनिक बयान देने से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि राजा भैया का विरोध वे लोग कर रहे हैं जो उनके द्वारा किये जा रहे विकास और कल्याणकारी कार्यों से स्वयं की राजनीतिक जड़ें उखड़ी हुई महसूस कर रहे हैं।

स्थिति की गंभीरता का एक और मानदंड हो सकता है। पहले चरण के ही चुनावों में, राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, 3274 मतदान केन्द्रों में से 1465 कानून और व्यवस्था के दृष्टिकोण से अतिसंवेदनशील और 1136 संवेदनशील घोषित किये गये हैं।

स्वाभाविक तौर पर राज्य की पुलिस पर चुनाव आयोग भरोसा नहीं कर सकता थी और इसलिए केन्द्र से उसने अर्धसैनिक बल मांगे। केन्द्र ने भी पांच बटालियन अर्धसैनिक बल भेजने पर अपनी रजामंदी दे दी है ताकि ये चुनाव स्वच्छ और निष्पक्ष ढंग से कराये जा सकें। इन सुरक्षा बलों को जिला दंडाधिकारियों के साथ सलाह मशविरा कर तैनात किया जा रहा है।

पंचायत चुनाव के मुद्दे निहायत स्थानीय मुद्दे होते हैं। फिर भी सत्तारूढ समाजवदी पार्टी के समर्थित उम्मीदवारों की जीत और हार इस बात के संकेत देंगे कि मुलायम सिंह की सपा का कितना जनाधार है, और उसके आधार पर वह फिर से मुख्यमंत्री बन पायेंगे या नहीं।

उधर बहुजन समाजवादी पार्टी की नेता मायादती ने भी अपने जनाधार को विस्तार देने का अभियान चला रखा है। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक, जो उनके अगले मुख्य मंत्री बनने की भविष्यवाणी कर रहे हैं, की बातों में कितना दम है इसका भी खुलासा ये चुनाव कर देंगे, क्योंकि बसपा के जनाधार का भी तब पता चल जायेगा।

कांग्रेस और भाजपा अभी राज्य में कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं हैं। फिर भी उनकी भावी रणनीति के लिए ये चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण होंगे। #