बाबा रामदेव के वक्तव्यों के तीन भाग थे। सबसे पहले उन्होंने 5 जून की पुलिस कार्रवाई तथा अपने भागने का विवरण दिया। दूसरे, उन्होेंने अपनी आलोचनाओं एव सरकार द्वारा लगाए आरोपों का जवाब देते हुए अपने रास्ते पर डटे रहने का ऐलान किया तथा तीसरे, भविष्य के आंदोलन की रूपरेखा रखी। तीनों पहलुओं का लुब्बोलुवाब यह था कि सरकार चाहे जो करे, वे भ्रष्टाचार, कालाधन, व्यवस्था परिवर्तन आदि पर अपने रास्ते से डिगने वाले नहीं हैं। उनके शब्द थे,‘ मैं भारत माता का बेटा हूं और मुझे इस राष्ट्र के लिए काम करने से कोई रोक नहीं सकता।’ 5 जून से एक बड़ा वर्ग यह कहकर रामदेव की आलोचना कर रहा था कि वे गिरफ्तार होने की बजाय भाग क्यों खड़े हुए? पुलिस की बर्बरता का तो विरोध एक स्वर से हुआ लेकिन उनके निकल भागने की खबर का अत्संत ही नकारात्मक संदेश गया और उनके समर्थकांे की संख्या मंे भी कमी आई। किंतु उनका कहना है कि 1 बजे रात्रि को पुलिस अत्याचार के बीच मंच से नीचे कूदकर उन्होंने अपने लोगों से केवल यह अपील की कि कोई हिंसा न करे, उसके बाद मंच पर आ गए तथा पुलिस से गिरफ्तार करने का आग्रह किया। लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने की बजाय जो रुप अपनाया उससे लगता था कि वह उन्हें खत्म करना चाहती थी। उनके इस स्पश्टीकरण पर मतभेद की गुंजाइष है, लेकिन पुलिस के रौद्र रुप के सामने खड़ा व्यक्ति उसके आगे के रुख के बारे में अपने अनुसार ही आकलन करता है। इससे उनके समर्थक संतुश्ट हुए या नहीं इसका पता भी आगे चलेगा, किंतु जो कुछ हुआ वह अतीत है। इस समय तो मूल प्रश्न यही है कि अब बाबा करेंगे क्या एवं उनके अभियान का स्वरुप क्या होगा?
इन दोनों प्रश्नों का जवाब उनके वक्तव्य के दूसरे एवं तीसरे भाग में मिल जाता है। सरकार की आलोचना का उनका स्वर बिल्कुल तीखा था। बाबा ने सरकार को एक चुनौती भी दी कि उनके पास यदि कालाधन है तो सरकार ढूंढे। अपने साथी बालकृश्ण को भी उन्होंने बेदाग तथा उनके पासपोर्ट को बिल्कुल दुरुस्त बताकर बाबा ने सरकार को झूठा साबित करने की कोशिश की। एक संन्यासी के पास उतनी संपत्ति होनी चाहिए या नहीं, यह प्रश्न निश्चित रुप से बना रहेगा, किंतु देश में कम ही लोग यह मानने को तैयार हैं कि उनके पास कालाधन है। लोग यही मान रहे हैं कि सरकार उनके आंदोलन का बर्बरतापूर्वक दमन के बाद उन्हेें एवं उनके सहयोगियों को बदनाम करने का कुचक्र रच रही है ताकि लोग उनसे अलग हों। उन्होंने यह कहकर कि अगर उनके पास कालाधन निकला तो वे उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोशित करने के लिए तैयार हैं, फिर से कालाधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग सामने ला दिया है। सरकार एवं कांग्रेस पार्टी आंदोलन कुचल डालने की तात्कालिक सफलता के कारण भले इसका उपहास उड़ाए, लेकिन रामदेव के समर्थक एवं विरोधी दोनों उनकी इस मांग से सहमत होंगे। हां, सरकार के लिए यह राहत की बात अवश्य है कि वे तत्काल कोई अनशन या धरना आदि नहीं देने वाले हैं। इसकी बजाय उन्होंने देश की दो लाख किलोमीटर की यात्रा कर जन जागरण करने तथा गांवों के स्वदेशी और स्वावलंबी विकास के लिए प्रत्येक जिले के एक-एक गांव को मॉडल के तौर पर विकसित करने का कार्यक्रम आरंभ करने की घोषणा की।
बदलाव के लिए केवल संघर्ष की चाहत रखने वालों को उनके बयान से निराशा होगी एवं वे इसे पलायन भी कह सकते हैं। यह साफ है कि अगले कुछ दिनों या महीनों में वे किसी प्रकार का विरोधी अदंोलन नहीं करने वाले। इसका सामान्य विश्लेषण तो यही होगा कि बाबा के लिए सीधे सरकार विरोधी आंदोलन का अनुभव अच्छा नहीं रहा। निस्संदेह, उन्होंने 13 दिनों के अपने मौन के दौरान इस पर आत्ममंथन किया है और संभवतः उन्हें ऐसा लगा है कि जितने लोगों तक पहुंचना चाहिए था उतने लोगों तक नहीं पहुंचे। यानी जितना जन जागरण होना चाहिए था नहीं हुआ। दूसरे, उनके समर्थकों का एक वर्ग भी मानने लगा था कि आंदोलन का समय सही नहीं चुुना गया। अन्ना हजारे के अनशन के बाद बने माहौल में अनशन करने का निर्णय बहुत सही नहीं था। उस आंदोलन का परिणाम देखकर फैसला करना ज्यादा उपयुक्त होता। फिर सरकार द्वारा कुछ मांगे माने जाने के बावजूद अनशन पर अड़े रहना अंादोलन की उपयुक्त रणनीति नहीं थी। वैसे रामदेव जो मुद्दे उठा रहे थे उसके बारे में तो यह कल्पना ही अव्यावहारिक है कि कोई सरकार उसे पूरी तरह मान लेगी और वह भी एक बार किए गए कुछ दिनों के अनशन के दबाव में। यद्यपि रामदेव ने इसे रणनीतिक भूल नहीं माना, पर यह आंदोलन का अनुभव का अभाव, ज्यादातर भावुक लोगों के बीच रहने एवं उन्हीं से विचार-विमर्श करके फैसला करने की परिणति थी। बिल्कुल उल्टी दिशा में चले गए देश को पीछे मोड़ने का कार्य ऐसे संपन्न नहीं हो सकता। रामदेव जी के इरादे पर कोई संदेह नहीं है, पर विदेशी बैंकों में जमा काले धन, भारत के प्राकृतिक संसाधनों आदि के बारे में उनकी राय वास्तविकता और व्यावहारिकता से परे है। उनके आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी पर्याप्त पूर्व तैयारी न होनी थी। अपनेे इस दूसरे हुंकार में भी उन्होंने इसकी कोई चर्चा नहीं की।
लेकिन वे जिस जन जागरण अभियान पर निकलने वाले हैं वह भी आंदोलन का ही भाग होगा। उनके हुंकार मंे ऊपर से जान तो दिख रही थी, पर उसे समर्थन कितना मिलता है यह देखना होगा। सरकार की बर्बरता के विरुद्ध तो लोग हैं लेकिन अब पहले की तरह तुरत उन्हें समर्थन मिलेगा इसमें संदेह है। संभव है जन जागरण अभियान में भी उन्हें कुछ जगह कांग्रेस का विरोध झेलना पड़े, सरकारी मशीनरी भी उन्हें बाधा पहुंचाए। यानी पहले वे जिस एक लाख किलोमीटर की यात्रा करने का दावा करते हैं उसमें उनको प्रशासन का भी सहयोग मिलता था, अब वैसी स्थिति नहीं होगी। क्या बाबा एवं उनके रणनीतिकारों ने उन स्थितियों से निपटने के प्रश्न पर पूरा विचार किया है? दूसरे, ग्राम विकास की प्रक्रिया में उद्योगों या कारोबार के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में वही गांव आ गया जिसे वे स्वादेशी विकास का मॉडल बनाना चाहते हैं तो क्या करेंगे? आज देश जिन विकट परिस्थितियों में धंसता जा रहा है उसमें सीधे आंदोलन की मोर्चाबंदी से आप बच नहीं सकते। किसी न किसी मोड़ पर प्रशासन और सरकार के खिलाफ आंदोलन पर उतरना ही होगा। (संवाद)
रामदेव की नई हुंकार
सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करनी ही होगी
अवधेश कुमार - 2011-07-02 06:58
स्वामी रामदेव ने फिर से हुंकार भर दिया है। निश्चय ही 21 दिनों बाद राजधानी दिल्ली मंे उनके वक्तव्य एवं तेवर देखकर उनके समर्थकों में फिर से आत्मविश्वास वापस आना आरंभ हुआ होगा। 4- 5 जून की रात्रि में हुई पुलिस कार्रवाई का उच्चतम न्यायालय द्वारा लिए गए संज्ञान के बाद सरकार के पास भी उनको स्वतंत्र छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। पुलिस की कार्रवाई तथा 15 दिनों के लिए दिल्ली प्रवेश पर प्रतिबंध को ध्यान में रखें तो उन्हंे किसी प्रकार बाधित न करने का पुलिस का रवैया समर्थकों को राहत पहुंचाने वाला था। उन्होंने जिस आक्रामक अंदाज में सरकार पर हमला किया एवं अपना संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया उसकी आवश्यकता उनके समर्थक महसूस कर रहे थे। पूरा देश इस बीच उठ रहे प्रश्नों, लगाए जा रहे आरोपों के उत्तर के साथ यह भी जानना चाहता था कि वे अब आगे क्या करने वाले हैं। यह मानने मंे कोई हर्ज नहीं है कि उन्होंने सारे प्रश्नों का बड़ी बेवाकी से जवाब दिया तथा अपनी भावी कार्ययोजना भी रखी।