बैठक के दौरान जो कुछ कहा गया, वह अप्रत्याशित भी नहीं था। देश का एक औसत नागरिक देश के एक औसत राजनेता के भ्रष्टाचार के बारे में क्या राय रखता है, यह सबको पता है। जब भ्रष्टाचार के खिलाफ देश मंे आंदोलन होता हो, तो वे किस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, यह भी सबको पता है। इसके खिलाफ लंबे चौड़े भाषण व बयानबाजी में वे एक दूसरे से प्रतियोगिता करते नजर आते हैं। जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाना होता है, तो उनकी प्रतिक्रया कुछ और होती है। सर्वदलीय बैठक में यही तो हुआ।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी सरकार मजबूत लोकपाल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वह लोकपाल उच्च पदों पर हो रहे भ्रष्टाचार तक ही सीमित रहेगा। सवाल उठता है कि देश की आम जनता प्रशासन के निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार से सीधे रूप मे ंपरेशान रहता है, तो फिर लोकपाल के दायरे में निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को क्यों नहीं लाया जाना चाहिए?
अभी कुछ दिन पहले ही पटना से खबर आई थी कि हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की पत्नी के पासपोर्ट के लिए वेरिफिकेशन के समय उनसे एक महिला पुलिस थानेदार ने 2 हजार रुपए की घूस मांगी थी। जब जज की उक्त पत्नी ने दो सौ रुपए देकर रिपोर्ट लिखने का आग्रह किया तो उस महिला थानेदार ने कहा कि पासपोर्ट के लिए पुलिस वेरिफिकेशन की फीस (यानी घूस) की रेट 2000 रुपए है, इसलिए वे 200 रुपए में अपनी वेरिफिकेशन रिपोर्ट नहीं दे सकती। दिलचस्प बात यह है कि वह महिला थानेदार अभी प्रोबेशन पर ही थी। अब चूंकि मामला हाई कोर्ट के जज की पत्नी का था, तो उन्होंने बिहार के पुलिस महानिदेशक को फोन करके उस महिला थानेदार की शिकायत कर दी। वह थानेदार निलंबित भी हो गई, लेकिन जिसके फोन पर राज्य के पुलिस महानिदेशक बात करने नहीं आ सकते, उनके पास थानेदार को 2 हजार रुपए की घूस देने के अलावा और क्या चारा रहता? यह घटना उस बिहार की है, जिसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनेक कदम उठाने के लिए अन्ना हजारे की बाहबाही भी बटोरी है।
जब भ्रष्टाचार सर्वव्यापी हो, तो फिर लोकपाल के दायरे में सिर्फ संयुक्त सचिव से ऊपर के पद पर बैठे व्यक्ति को ही लाने का क्या मतलब? और यदि उच्च पदों पर हो रहे भ्रष्टाचार के लिए ही लोकपाल का निर्माण करना है, तो फिर उसके दायरे से प्रधानमंत्री को क्यों अलग रखा जाए? आज तक देश में कोई भी ऐसा कानून नहीं है, जो प्रधानमंत्री पर लागू नहीं होता है। संविधान की व्यवस्था के अनुसार कानून की नजर में सभी बराबर है और राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति को ही इसका अपवाद बनाया गया है। तो फिर प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने का क्या मतलब है? प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि लोकपाल संविधान के दायरे में ही बनाया जाएगा। उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि संविधान भी प्रधानमंत्री को कानून के सामने उतना ही बड़ा मानता है, जितना एक आम नागरिक अथवा कोई मंत्री। फिर मंत्री को लोकपाल के दायरे में रखकर प्रधानमंत्री को उसके बाहर रखने का क्या मतलब हो सकता है?
प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का जो रवैया रहा, वह भी बहुत ही निराशाजनक रहा। लोकपाल के प्रावधानों के बारे में उन्होंने कोई राय ही जाहिर नहीं की और फिर एक मजबूत लोकपाल की मांग सरकार से कर दी। वे कहती हैं कि सरकार जब संसद में विधेयक पेश करेगी और उसके बाद जब वह विधेयक स्थाई समिति में जाएगी, तब फिर उनकी पार्टी देखेगी कि उसे प्रावधानों पर क्या करना है। इस तरह की बयानबाजी कर सुषमा स्वराज ने सरकार का काम आसान कर दिया है। सरकार ने प्रतिबद्धता जताई थी कि लोकपाल विधेयक को मानसून सत्र के दौरान संसद से पारित करा दिया जाएगा। जब सरकार यह प्रतिबद्धता व्यक्त कर रही थी, उस समय भाजपा की ओर से भी कहा गया था कि वह मानसून सत्र में ही विधेयक को संसद से पारित करने में सरकार की सहायता करेगी। अब सुषमा स्वराज कह रही है कि पहले विधेयक स्थाई समिति में जाएगा और फिर वहां उनकी पार्टी अपनी राय जाहिर करेगी। इसका मतलब है कि मानसून सत्र मे ंलोकपाल का विधेयक पारित हो ही नहीं पाएगा, क्योंकि स्थाई समिति इस पर अपनी राय कायम करने में समय लेगी। स्थाई समिति में किसी विधेयक का जाना एक स्थापित प्रक्रिया है, हालांकि वहां किसी विधेयक को भेजना अनिवार्य नहीं है। अधिकांश विधेयक बिना स्थाई समिति में गए ही पािरत होते रहे हैं। लेकिन सुषमा स्वराज अब स्थाई समिति का नाम लेकर सरकार को लोकपाल कानून में विलंब करने का बहाना उपलब्ध करा रही है। सवाल उठता है कि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का संघर्ष चरम पर था, तो भाजपा ने यह क्यों कहा था कि वे मानसून सत्र में ही लोकपाल विधेयक को संसद से पाहरत कराने में सहयोग करेगी?
जाहिर है भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बनाने के मसले पर कांग्रेस के नेताओं का जो रवैया है, उससे अलग रवैया भाजपा नेताओं का नहीं है। प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में रहे यह नहीं, लोकपाल के दायरे में पूरा प्रशासनिक तंत्र हो या नहीं, सीबीआई की अपराध निरोधक शाखा लोकपाल के मातहत हो या नहीं, विभागीय निगरानी शाखा लोकपाल के अधीन हो या नहीं- इन सबपर अपनी राय देने के लिए भाजपा को स्थाई समिति की ही जरूरत क्यों पड़ गई? क्या स्थाई समिति या संसद के बाहर पार्टियों के नेता प्रमुख मसलों पर अपनी राय नहीं देते? क्या सुश्री स्वराज अथवा उनकी भाजपा ने स्थाई समिति में किसी विधेयक के जाने के पहले उस पर अपनी राय कभी नहीं रखी है?
जिस उद्देश्य से सरकार ने सर्वलीय बैठक बुलाई थी, उसका वह उद्देश्य पूरा हो गया है। उसने अपने इस कदम से अन्ना को बता डाला है कि मानसून सत्र में किसी प्रकार का लोकपाल विधेयक पारित नहीं होने वाला है। सरकार ने यह भी बताने मे ंसफलता पाई है कि देश का एक बड़ा राजनैतिक वर्ग भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त लोकपाल तंत्र विकसित करने में दिलचस्पी नहीं रखता। इन साफ संकेतों के बाद यह अन्ना और देश के लोगों के पास क्या विकल्प रह जाता है? कहने की जरूरत नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में एक बहुत बड़े आंदोलन की जरूरत है। (संवाद)
लोकपाल पर सर्वदलीय बैठक
क्या टकराव की ओर बढ़ रहा है राजनैतिक वर्ग?
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-07-04 05:16
लोकपाल के मसले पर प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक अनेक मामलों ेमें निराशाजनक रही। इस बैठक के अंत में एक मजबूत लोकपाल के निर्माण का संकल्प लिया गया, लेकिन यह संकल्प कितना सच्चा और कितना झूठा है, इसका पता तो बैठक में नेताओं के दिए गए भाषणों से लगता है। और यदि नेताओं के भाषण से कोई संकेत निकलता है, तो वह यही है कि वे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी मजबूत तंत्र के निर्माण को संभव नहीं होने देने के लिए संकल्पबद्ध हैं।