भट्टा पारसौल की भावना को जीवित रखते हुए राहुल गांधी ने पिछले 5 मई से उसी गांव से किसान संदेश यात्रा की शुरुआत की है, जिसका समापन अलीगढ़ में होना है। इस यात्रा के दौरान राजीव गांधी को अपार सफलता मिल रही है। इसके कारण कांगेस को उत्तर प्रदेश की इस जाटभूमि में अपना आधार फैलाने में सहायता मिल रही है।
यह इलाका अजित सिंह के गढ़ के रूप में जाना जाता है। भाजपा का भी वहां मजबूत आधार रहा है, लेकिन कांग्रेस की स्थिति यहां बहुत ही कमजोर रही है। राहुल गांधी की यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया कि इस इलाके में पिछले 30 सालों से किसी कांग्रेसी नेता का आगमन नहीं हुआ था।
अपनी यात्रा के दौरान राहुल गांधी स्थानीय किसानों के घर जाते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं। किसान जमीन अधिग्रहण से पैदा हुई अपनी समस्याओं का जिक्र उनसे करते हैं। वे राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था का भी उनसे वर्णन करते हैं। राहुल भी उन्हें बताते हैं कि उनकी समस्या से वे केन्द्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अवगत कराएंगे। उनकी यह यात्रा कांग्रेस को इन इलाकों में अपनी स्थिति बेहतर करने में मददगार साबित हो सकती है।
अपनी यात्रा के दौरान राहुल गांधी लोगों को यह संदेश देने की कोशिश भी करते हैं कि कांग्रेस यहां अकेले चुनाव लड़ेगी और अजित सिंह की पार्टी के साथ उसका कोई तालमेल नहीं होगा। दूसरी तरफ अजित सिंह को लगता है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उनकी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ेगी, इसलिए वे राहुल गांधी की यात्रा के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं।
दूसरी तरफ अन्य पार्टियां राहुल गांधी की इस यात्रा से परेशान हो गई हैं। खासकर भाजपा की परेशानी की कोई सीमा नहीं दिखाई पड़ रही। राजनाथ सिंह से लेकर उमा भारती तक राहुल गांधी की इस पदयात्रा को तमाशा और नौटंकी करार दे रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी ने इस यात्रा के पहले अच्छा होमवर्क किया था। उन्होंने फॉर्म भरवाकर लोगों की समस्याएं उन्हीं से जानने की कोशिश की थी। उनकी जानकारी के बाद ही उन्होंने अपनी यह पदयात्रा शुरू की।
गौरतलब है कि राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस के वाराणसी सत्र में घोषणा की थी कि विधानसभा चुनाव के पहले राज्य के प्रत्येक गांव का दौरा करेंगे। राहुल गांधी ने यह भी साफ कर दिया है कि वे चुनाव के पहले अथवा चुनाव के बाद भाजपा, बसपा और सपा के साथ कोई समझौता अथवा तालमेल नहीं करेंगे।
सोनिया गांधी ने भी वाराणसी के बेनियाबाग मे सभा की थी और वहां मुसलमानों का समर्थन हासिल करने का प्रयास किया था। वह इलाका मुस्लिम बहुल है। उन्होंने वहां कहा था कि बुनकरों के लिए केन्द्र ने 20 अरब रुपए की सहायता राशि राज्य सरकार को उपलब्ध करवाई है, लेकिन राज्य सरकार उसका लाभ बुनकरों तक नहीं पहुंचा पा रही है।
छोटी पार्टियों के साथ कांग्रेस के गठबंधन के फैसले को राहुल गांधी के ऊपर छोड़ दिया गया है। राहुल को यह अधिकार लखनऊ में हुई पार्टी की एक बैठक में दिया गया। बैठक में यह भी फैसला किया गया कि पार्टी अपने उम्मीदवारों की घोषणा जल्द से जल्द कर देगी।
एक रणनीति के तहत पार्टी नेताओं ने कार्यकर्त्ताओं से कहा है कि वे लोगों को केन्द्रीय योजनाआंे के बारे में सजग बनाएं और उन्हें बताएं कि राज्य सरकार की अक्षमता के कारण उन योजनाओं को अमल में नहीं लाया जा रहा है।
वरिष्ठ राजनैतिक टिप्पणीकार सुरेन्द्र राजपूत का कहना है कि राहुल गांधी की इस यात्रा से लोगों मंे कांग्रेस के प्रति जो सद्भाव पैदा हो रहा है, उसका राजनैतिक फायदा चुनाव में उठाने के लिए कांग्रेस को अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा। श्री राजपूत कहना है कि कांग्रेस संगठन के पास लड़ने की भावना का अभाव है। प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के अलावा पार्टी का कोई भी प्रदेश नेता राजनैतिक रूप से जूझता नहीं दिखाई पड़ता।
श्री राजपूत का कहना है कि जाति का संतुलन बनाने में भी कांग्रेस विफल रही है। पार्टी संगठन के 80 फीसदी पदों पर अगड़ी जातियों का कब्जा है, जबकि शेष 20 फीसदी पर दलित, मुस्लिम और पिछड़े वर्गो के लोग हैं, जबकि उनकी सम्मिलित आबादी 80 फीसदी है। उनका मानना है कि राज्य की 80 फीसदी आबादी वाले इन तबकों को पार्टी संगठन में 80 फीसदी जगह देकर ही कांग्रेस अपनी स्थिति चुनावों में बेहतर कर सकती है।
परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन आज के दिन में राज्य में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्त्ताओं के हौसले बहुत ही ऊंचे हैं। ( संवाद )
राहुल का उत्तर प्रदेश अभियान
दिनों दिन मजबूत हो रही है कांग्रेस
प्रदीप कपूर - 2011-07-15 08:47
लखनऊः कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के अभियान के कारण दिनोंदिन कांग्रेस की स्थिति उत्तर प्रदेश में बेहतर होती जा रही है। श्री गांधी ने ताजा अभियान पिछले मई महीने में भट्टा पारसौल से शुरू किया था, जिसका उद्देश्य 2012 में अपने बूते पर प्रदेश में पार्टी की सरकार बनानी है। गौरतलब है कि भट्टा पारसौल में मई में 4 लोग मारे गए थे। उस समय किसान अपनी जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ वहां आंदोलन कर रहे थे।