प्रधानमंत्री ने कानून मंत्री वीरप्पा मोइली को अब कंपनी मामलों का मंत्री बना दिया है। जाहिर है एक ज्यादा महत्वपूर्ण मंत्रालय से हटाकर उन्हें एक कम महत्व का मंत्रालय दे दिया गया है। श्री मोइली सुधारों के लिए जाने जाते हैं। वे प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और प्रशासन में सुधार की उन्होंने लंबी चौड़ी सिफारिशें भी दे रखी हैं, जिन्हे यदि अमल में लाया जाए, तो प्रशासन निश्चय ही पहले से बेहतर हो जाएगा। सरकार उनकी सिफारिशों पर आगे की कोई कार्रवाई तो कर नहीं रही है, पर श्री मोइली अपने मंत्रालय में अपने स्तर से सुधार के काम कर रहे थे।
देश का कानूनी ढांचा बेहद ही त्रुटिपूर्ण है, जिसके कारण न्याय मिलने में वर्षो या दशकों लग जाते हैं। यह व्यवस्था इतनी डरावनी है कि अधिकांश लोग तो अन्याय सहकर रह जाना स्वीकार कर लेते हैं, पर अन्याय पाने के लिए न्याय व्यवस्था की शरण में नहीं जाते। यह व्यवस्था बहुत ही महंगी और समय लेने वाली है। जो अनचाहे कोर्ट कचहरी के चक्कर में फंस जाते हैं, वे तो जीते जी बर्बाद हो जाते हैं। करोड़ों मामले देश की अदालतों में लंबित हैं। लाखों निर्दोष जेल के अंदर हैं। लाखों दोषी जेल के बाहर हैं। न्याय व्यवस्था के त्रुटिपूर्ण होने के कारण भ्रष्टाचार और अपराध के मामले बेतहाशा बढ़ते जो रहे हैं। अपराधियों को कानून का डर नहीं, इसलिए वे बेझिझक अपराध करते हैं। जिनके साथ अन्याय होता है, उनमें से अनेक तो अपने साथ हुए अन्याय का बदला कोर्ट में जाने की बजाय खुद करते हैं और कानून तोड़ते हैं।
वीरप्पा मोइली इसी कानून व्यवस्था में बदलाव की कोशिश कर रहे थे। वर्तमान न्याय व्यवस्था को बनाए रखने में अनेक लोगों का निहित स्वार्थ हो गया है। जाहिर है वे बदलाव का विरोध कर रहे थे और श्री मोइली को मंत्रालय से हटाने की कोशिश कर रहे थे। आखिरकार वे सफल भी हो गए। उनके कानून मंत्रालय से हटने के बाद उन सुधारों पर सवालिया निशान लग गए हैं, जिनके लिए श्री मोइली प्रयासरत थे।
सुधार विरोधियों को सुप्रीम कोटे में हो रही सरकार की फजीहत से श्री मोइली को हटाने का मौका मिल गया। काले धन और 2 जी स्पेक्ट्रम मामलों में केन्द्र सरकार की काफी फजीहत हो रही थी। उसका ठीकरा श्री मोइली के सिर पर फोड़ दिया गया। काला धन और भ्रष्टाचार के मामले से मोइली को कुछ भी लेना देना नहीं रहा है, फिर भी यह माना गया कि यदि कानून मंत्रालय सतर्क रहता, तो वैसा नहीं होता। हालांकि यह फिजूल की बात है। इस तरह की सोच रखने वाले यह मानते हैं कि कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को प्रभावित कर सकता है। यह सोच ही अवमाननापूर्ण है और यदि इस सोच के साथ श्री मोइली को कानून मंत्रालय से हटाया गया है, तो फिर सरकार की छवि को नुकसान पहुंचना स्वाभाविक है, क्योंकि आज भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ देश व्यापी रोष है और जो भी इनके पक्ष में खड़ा दिखाई देगा, उसे लोग कतई नहीं सराह सकते।
मनमोहन सिंह ने जयराम रमेश का मंत्रालय भी बदल दिया, हालांकि उन्हें राज्य मंत्री के स्वतंत्र प्रभार से प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बना दिया है। कैबिनेट मंत्री बनना जयराम रमेश की अपनी उपलब्धि होगी, लेकिन उनके मंत्रालय बदल दिए जाने से प्रधानमंत्री के प्रति एक गलत संदेश लोगों के बीच गया है। पर्यावरण मंत्री के रूप में जयराम रमेश बहुत अच्छा काम कर रहे थे। अंधाधु्रध विकास के बीच पर्यावरण की रक्षा करना एक बेहद ही चुनौती भरा काम है। विकास के नाम पर निजी हित साधने के लिए पर्यावरण का नाश करने वाले धनपशुओं के दबाव का सामना किसी भी पर्यावरण मंत्री को करना पड़ता है। इस तरह का दबाव उन पर भी पड़ रहा था और उसका वे सफलता पूर्वक सामना कर रहे थे। इसके कारण धनपशुओं की आंखों का वे कांटा बने हुए थे। दिल्ली में यमुना नदी के खादर में अक्षरधाम मंदिर और खेलगांव बनाने तक का उन्होंने विरोध किया था। मुम्बई की आदर्श सोसायटी को ढहाने का आदेश भी उन्होंने जारी करवा दिया था। और भी अनेक विकास परियोजानाएं, जो पर्यावरण का नाश कर रही थीं वे कानून सम्मत नहीं थीं, जयराम रमेश का निशाना बन रही थीं। श्री रमेश को पर्यावरण मंत्रालय से हटाने का यही संदेश गया है कि प्रधानमंत्री को पर्यावरण की चिंता नहीं है।
पिछले दिनों केन्द्र सरकार के तीन मंत्री भ्रष्टाचार के मामले में साफ फंसते दिखाई पड़़े थे। गृहमंत्री पी चिदंबरम केजी गैस बेसीन घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला और राष्ट्रमंडल खेल घोटालों में फंसे दिखाई पड़़े थे। इन तीनों घोटालों में अरबों खरबों रुपए का नुकसान हुआ है। केजी गैस बेसिन में तो अभी तक हुए नुकसान का अंदाज भी नहीं लगाया गया है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जबकि राष्ट्रमंडल खेल के घोटालों में भी हजारों करोड़ रुपए का घपला हुआ है। इन तीनों घपलों में पी चिदंबरम वित्त मंत्री की हैसियत से शामिल पाए गए हैं। राष्ट्रमंडल खेल के घोटाले में तो एक समय खेल मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर ने ही उन पर अनियमितता का आरोप लगा दिया है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में तो उनकी छवि ए राजा से भी खराब बन रही है, क्योंकि वह घोटाला उनके द्वारा 2 जी स्पेक्ट्रम को 2001 की दर पर बेचने की सहमति देने के बाद ही हुआ था। इतना ही नहीं, राडिया टेप में ए राजा राडिया को यह कहते सुनाई पड़ते हैं कि पी चिदंबरम ने भी 2 जी स्पेक्ट्रम की बिक्री में बहुत पैसे खाए हैं। उसी बातचीत में गैस और खनन के क्षेत्र में भी पी चिदंबरम द्वारा पैसा खाने की बात की गई है। बाद मंे कैग ने पाया है कि केजी गैस बेसिन में भारी लूट हुई और वित्त मंत्री के रूप में उस लूट में पी चिदंबरम के शामिल होने के आरोप लग रहे हैं।
पी चिदंबरम के अलावा कपिल सिब्बल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। अपने एक निर्णय से उन्होंने अनिल अंबानी को 650 करोड़ रुपए का फायदा पहुंचा दिया और सरकारी खजाने को नुकसान पहुचा दिया। यह घोटाला संचार मंत्रालय मंे हुआ है। श्री सिब्बल को मंत्री पद से तो हटाया नहीं ही गया है, प्रधानमंत्री ने संचार मंत्रालय को उनसे लेने की जरूरत भी महसूस नहीं की। केजी बेसिन घोटाले में मुरली देवड़ा का नाम आ रहा था। वे खुद मंत्रिमंडल से हट गए और अपने बेटे को मंत्रिपरिषद में शामिल करवा दिया। यानी उन्हें भी प्रधानमंत्री ने पुरस्कृत ही किया है। सवाल उठता है कि ए राजा को भ्रष्टाचार के आरोप के बाद भी मंत्रिमंडल में बनाए रखना प्रधानमंत्री के लिए गठबंधन की मजबूरी थी, तो चिदंबरम और सिब्बल को मंत्रिमंडल में बनाए रखना प्रधानमंत्री के लिए किस प्रकार की मजबूरी है? (संवाद)
मनमोहन मंत्रिमंडल में फेरबदल
सरकार की छवि और खराब हुई
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-07-15 09:10
मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में फेरबदल के पहले लग रहा था कि सरकार अपनी छवि को बेहतर करने की कोशिश करेगी और जिन मंत्रियों के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएगी, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। अव्वल तो बड़े पैमाने पर कोई फेरबदल हुआ ही नहीं और जो थोड़े बहुत हुआ, उससे सरकार की साख और गिर गई है।