सरकार भले दावा कर ले कि उसने जाति जनगणना शुरू कर दी है और इसका काम इस साल के अंत में समाप्त हो जाएगा, लेकिन इस प्रकार की जनगणना की मांग करने वाले कार्यकर्त्ता यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि सरकार जो करवा रही है, वह जाति जनगणना है। उनका कहना है कि सरकार बीपीएल सर्वै करवा रही है और उसके साथ ही जाति की भी गिनती की जा रही है, लेकिन इस प्रकार की गिनती से वे संतुष्ट नहीं हैं।
जाति जनगणना की पैरवी कर रहे पूर्व जनगणना आयुक्त डॉक्टर विजयन उन्नी का कहना है कि बीपीएल सर्वे को किसी प्रकार से जाति जनगणना नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह जनगणना अधिनियम 1948 के तहत नहीं करवाया जा रहा है। श्री उन्नी भारत के रजिस्ट्रार जनरल भी रह चुके हैं और 2001 में हुई जनगणना की तैयारियों से वे जनगणना आयुक्त के रूप में जुड़े हुए थे। उनका कहना है कि जनगणना अधिनियम के तहत जनगणना की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होती है और सारा काम जनगणना आयुक्त की निगरानी में होता है।
पर अभी जो बीपीएल सर्वे और उसके साथ कथित जनगणना हो रही है, वह केन्द्र के ग्रामीण विकास मंत्री और शहरी विकास मंत्री की निगरानी में राज्य सरकारों के द्वारा करवाई जा रही है। श्री उन्नी का कहना है कि राज्य की सरकारें जनगणना करवाने में सक्षम नहीं होतीं। उनके पास वह सुविधाएं तथा अनुभव नहीं होते, जो जनगणना आयुक्त और उनके मातहत अधिकारियों और कार्यालयों के पास होते हैं। पूर्व जनगणना आयुक्त चल रहे बीपीएल सर्वे के साथ जाति जनगणना को अविलंब रोकने की मांग कर रहे हैं।
संसद का सत्र आगामी 1 अगस्त से शुरू होने वाला है। भ्रष्टाचार, काला धन, मुंबई हमला, कैश फॉर वोट, जमीन अधिग्रहण कानून जैसे अनेक मसलों के कारण संसद का यह सत्र काफी हंगामापूर्ण होगा। उन हंगामों के बीच जाति जनगणना के मसले पर भी काफी हंगामे के आसार हैं।
जाति की गणना कराने का फैसला केन्द्र सरकार ने संसद के दबाव में ही लिया था। जब 2011 की आम जनगणना का पहला दौर चल रहा था, उसी समय लोकसभा में यह मांग उठी थी कि इसमें जाति को भी शामिल किया जाए। उस समय सभी गैर कांग्रेसी पार्टियों ने लोकसभा में इस मांग का समर्थन किया था। यूपीए की गैर कांग्रेसी पार्टियां भी इसके पक्ष में थी। वाम दलों ने भी इसका समर्थन किया था और राजग के घटक दल भी जाति जनगणना के पक्ष में थे।
लोकसभा में इस प्रकार की बनी सहमति के बाद केन्द्र की सरकार जनगणना में जाति को शामिल करने के लिए तैयार हो गई थी। पर बाद में सरकार ने इस पर ढुलमुल नीति अख्तियार करना शुरू कर दिया। सरकार के कुछ मंत्री इसके खिलाफ थे और जनगणना में जाति को शामिल करना का विरोध सरकार के अंदर से ही शुरू हो गया।
उस विरोध का असर यह हुआ कि 2011 के फरवरी में हुई जनगणना के अंतिम दौर में जाति को शामिल नहीं किया गया और इसके लिए अलग से जनगणना की घोषणा कर दी गई। केन्द्र सरकार ने संसद में कहा कि जून महीने से जाति के लिए अलग से जणगणना का काम किया जाएगा। बाद में विपक्षी सांसदों ने सिर्फ जाति की संख्या गिने जाने का विरोध किया और कहा कि इसके साथ सभी जातियों के सामाजिक और आर्थिक हैसियत का पता लगाने के लिए आंकड़े भी इकटठे हों। उनकी मांग को मानते हुए केन्द्र सरकार बीपीएल सर्वे के साथ जाति जनगणना के काम को नत्थी कर दिया, क्योंकि बीपीएल सर्वे के तहत लोगों की आर्थिक हैसियत का पता लगाया जाना ही है इसके साथ जाति की जानकारी को भी जोड़ देने से लोगों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत का भी पता चल जाता है।
लंेकिन सरकार ने जाति जनगणना के तोर तरीके और इससे संबंधित प्राप्त किए जाने वाले आंकड़ों के बारे में लोगों को जानकारियां उपलब्ध नही कराई है, जिसके कारण बहुत भ्रम पैदा हो गया है। लगता है कि अब संसद में ही सरकार इस जाति जनगणना पर छाए भ्रम के बादल को हटा पाएगी। (संवाद)
संसद में फिर होगा हंगामा
जाति जनगणना पर फिर छिड़ी बहस
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-07-27 09:00
नई दिल्लीः यदि केन्द्र सरकार की मानें तो देश में जाति जनगणना शुरू हो चुकी है। इसकी शुरुआत 29 जून को त्रिपुरा में हुई। केन्द्र सरकार ने संसद में यह आश्वासन दिया था कि जाति जनगणना जून महीने में शुरू हो जाएगी। यह आश्वासन उस समय दिया गया था, जब विपक्ष फरवरी महीने में हो रही जनगणना में ही जाति को गिनने की मांग कर रहे थे।