दिग्विजय सिंह ने बाटला हाउस पुलिस मुठभेड़ पर सवाल उठाए थे। उन्होंने हिन्दु आतंकवाद पर बयानबाजी की थी और इस आतंकवाद को आरएसएस के साथ जोड़ा था। बुराड़ी कांग्रेस अधिवेशन में उनका वह बयान पार्टी का प्रस्ताव ही बन गया था। उन्होंने इस लाइन पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को भी तैयार कर लिया था। इसका पता उस समय चला जब विकीलीक्स ने राहुल गांधी की उस राय को सार्वजनिक किया।

श्री सिंह ने आतंकवादी घटनाओं में आरएसएस को बार बार घसीटा है। 2008 के मुंबई हमले में मारे गए पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की मौत के पीछे भी उन्होंन आएसएस के हाथ होने की बात तक कह डाली और कहा कि मौत के कुछ पहले करकरे ने उन्हें संघ परिवार के लोगों से जान पर खतरा होने की बात फोन पर बताई थी और उन्होंने फोन के डिटेल भी जारी कर दिए थे। उन्होंने योग गुरू रामदेव का ठग तक कह डाला और अन्ना हजारे की आलोचना तक कर डाली।

12 जुलाई के आतंकी हमले के बाद उन्होंने फिर आरएसएस पर संदेह करना शुरू कर दिया है और कह रहे हैं उसकी संलिप्तता की भी जांच की जानी चाहिए। उन्होंने दावे के साथ कहा कि संघ परिवार देश में बमों के कारखाने बनवा रहा है। इसके कारण आरएसएस के लोग एक बार फिर उनके खिलाफ उबल रहे हैं।

दिग्विजय का राजनीति में उत्थान बहुत ही दिलचस्प है। वीपी सिंह की तरह वे भी अकेला चलो की नीति में विश्वास करते रहे हैं। 1993 में वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। 1998 में वे दोबार चुनाव जीतकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उस समय कांग्रेस केन्द्र में विपक्ष में थी। 2003 में उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपना 10 साल पूरा किया। उस साल हार के बाद उन्होंने 10 सालों तक चुनाव नहीं लड़ने की प्रतिज्ञा तक कर डाली और केन्द्र की राजनीति में आ गए।

सवाल उठता है कि दिग्विजय सिंह विवादास्पद बयान क्यों दे रहे हैं? उन्होंने यह सीख प्राप्त की है कि यदि राजनीति में सफल होना है तो गांधी परिवार की भक्ति करनी होगी और उसके साथ चिपका दिखाई देना होगा। इसके अलावा वीपी सिंह की तरह उनकी नजर मुसलमानों के मसीहा बनने पर भी है। इस तरीके से वे राष्ट्र की राजनीति में अपनी जगह पक्की कर लेना चाहते हैं। इसके कारण ही एक के बाद एक वे विवादास्पद बयान देते हैं और देश के मीडिया की सुर्खियां बटोरते हैं।

वे अपने मेंटर अर्जुन सिंह की तरह अपने को कुछ अलग दिखाना चाहते हैं। वे दोनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अर्जुन सिंह ने भी अपनी छवि मुसलमानों के हितैषी की बना रखी थी। वही काम दिग्विजय सिंह कर रहे हैं। कांग्रेस की राजनीति पर नजर रखने वाले बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी श्री सिंह की नजर है। वहां कुछ महीनों के बाद विधानसभा के आमचुनाव होने वाले हैं, जो राहुल गांधी के लिए प्रतिष्ठा के विषय हैं। श्री सिंह उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव हैं। उन्हें पता है कि मुसलमान प्रदेश की जनसंख्या के साढ़े 18 फीसदी हैं। प्रदेश की 100 सीटों पर उनकी भूमिका निर्णायक होती है। कांग्रेस की सफलता के लिए उन्हें पार्टी से जोड़ना बेहद जरूरी है। इसलिए वे ऐसे बयान देते हैं जिसे मुसलमान पसंद करें। अपनी इस राजनीति में श्री सिंह सफल भी हो रहे हैं। मुसलमानों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ भी रही है। लेकिन इसके साथ कांग्रेस के एक वगै का डर है कि श्री सिंह के वे बयान कहीं बहुसंख्यक हिंदुओं को पूरी तरह भाजपा के पाले में धकेल न दें और यदि ऐसा होता है, तो इसका चुनावी फायदा भाजपा को होगा, कांग्रेस को नहीं।

दिग्विजय सिंह की कांग्रेस के अंदर कितनी धाक है, इसका पता इससे चलता है कि वे गृहमंत्री पी चिदंबरम को भी लताड़ लगा देते हैं। वे चार मंत्रियों के प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में हवाई अड्डे पर रामदेव से मिलने की घटना की जमकर खिंचाई करते है, लेकिन उन पर कांग्रेस नेतृत्व की ओर से कोई अंकुश नहीं लगाया जाता।

श्री सिंह बेहद महत्वाकांक्षी हैं। वे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नंबर दो स्थान पाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। यदि भाग्य ने उनका साथ दिया तो वे राहुल गांधी की पसंद के रूप में प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देख सकते हैं और शायद इसमें सफल भी हो सकते हैं। (संवाद)