खासकर बिहार सरकार द्वारा विधायक निधि खत्म करने के बाद कई सांसदों ने मुखर होकर सांसद विकास निधि को भी खत्म करने की मांग की थी। समाचार यह भी आ रहा था कि स्वयं प्रधानमंत्री इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने तो खुलकर इसके विरुद्ध बयान दिया था। किंतु राशि में वृद्धि के बाद सांसदों की ओर से इसकी मुखालफत नहीं होने का अर्थ है कि ज्यादादर इसके पक्ष में हैं।
वृद्धि की घोषणा करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने लागत मूल्यों में वृद्धि होने की जो बात की उससे हर कोई सहमत होगा। निश्चय ही वस्तुओं एवं सेवाओं के दामों में वृद्धि के बाद इसे दो करोड़ तक सीमित रखने का अर्थ होता काम की गुणवत्ता के साथ समझौता या फिर आंशिक काम करना। योजना जारी रखनी है तो बढ़ोत्तरी होनी ही चाहिए थी। आखिर उद्देश्य तो सार्वजनिक महत्व का टिकाऊ निर्माण करना ही है। बतौर सोनी इसमंें पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य की योजनाओं को प्राथमिकता देना है। लोकसभा सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में निर्माण कराएं, या राज्य सभा सदस्य अपने राज्य के जिलों में, अंततः सारे कार्य जनहित में ही तो होंगे। जबसे सांसद विकास निधि आरंभ हुई, तब से 31 मार्च 2011 तक सांसदों द्वारा 13.87 लाख कार्यों की अनुशंसा की गई जिनमें जिला अधिकरण ने 12.30 लाख कार्य को मंजूरी दी तथा आंकड़ा अनुसार 11.24 लाख काम पूरा भी हुआ। इन 18 वर्षों में 22 हजार 490 करोड़ रुपया निर्गत किया गया जिनमें से 20 हजार 454 करोड़ रुपया खर्च हो चुका है। अगर धरातल पर ये कार्य हुए हैं तो वृद्धि से प्रतिवर्ष देश के खजाने पर 2370 करोड़ रुपया बढ़ने वाले भार को ढोने में कोई आपत्ति नहीं है।
23 दिसंबर 1993 को जब यह योजना आरंभ हुई प्रति सांसद प्रतिवर्ष 50 लाख रुपया निर्धारित किया गया। 1994-95 में बढ़ाकर एक करोड़ एवं 1998-99 में दो करोड़ किया गया। सांसद विकास निधि संबंधी संसदीय समिति की दिसंबर 2001 में आई नौवीं रिपोर्ट में सामानों के दामों में भारी वृद्धि को आधार बनाते हुए कम से कम वार्षिक राशि 5 करोड़ रुपया करने की अनुशंसा की गई थी। इस परिप्रेक्ष्य में विचार करें तो वर्तमान वृद्धि अनुशंसा के करीब 10 वर्ष बाद हुई है। यानी यह विलंबित वृद्धि है। अगर तब यह सिफारिश मान ली गई होती तो आज शायद पांच करोड़ रुपया से ज्यादा बढ़ाया जाता। किंतु इस योजना की पृष्ठभूमि एवं आरंभ होने के बाद आने वाली शिकायतें, उठने वाले प्रश्नों ने तत्काल इसमें वृद्धि पर ब्रेक लगा दिया था।
इसमें दो राय नहीं कि सांसद क्षेत्र विकास निधि योजना के आरंभ होने में लगभग पूरे संसद की सहमति थी। तब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे एवं उनकी सरकार को लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं था। विरोधियों का आरोप है कि राव मंत्रिमंडल द्वारा इस येाजना को हरी झंडी दिया जाना उनके बहुमत जुटाने के प्रयास का अंग था। हालांकि सांसदों की आम शिकायत थी कि क्षेत्र के लोग उनसे कुछ कार्य कराने की मांग करते हैं, जबकि उनके हाथ में कुछ नहीं है। यह सोचा गया कि कुछ राशि सांसदों को क्षेत्रों में विकास कार्य के लिए आबंटित किया जाना चाहिए। इसमें तब कोई वैधानिक समस्या नहीं देखी गई। इसके लिए संसद की संयुक्त समिति गठित हुई। इसके पक्ष में वातावरण इतना प्रबल हो चुका था कि समिति ने 23 दिसंबर 1993 को करीब चार बजे सिफारिश की और सरकार ने उसी दिन छः बजे इसे स्वीकार करने की घोषणा कर दी। आरंभ के दिनों से ही इस योजना पर अनेक प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न इसकी संाविधानिकता का था। कहा गया कि इससे राज्यों के स्थानीय एवं स्वायत्तशासी कार्यो में हस्तक्षेप होगा तथा संघवाद की अवधारणा को भी आघात पहुंचेगा। संविधानविदों के साथ कालांतर में योजना आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी इन प्रश्नों को अपनी आवाज दी। अंततः उच्चतम न्यायालय में इसकी संवैधानिकता को चुनौती दी गई। 6 मई 2010 को उच्चतम न्यायालय ने फैसले में स्पष्ट कर दिया कि इसमें संविधान का कहीं अतिक्रमण नहीं होता है। इस फैसले के बाद केन्द्र सरकार के सामने इसे जारी रखने में कोई समस्या नहीं थी।
निस्संदेह, उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद सांसद निधि के संवैधानिक औचित्य की बहस पर तत्काल पूर्ण विराम लग गया। किंतु इसमें भ्रष्टाचार सहित अन्य प्रकार की अनियमिततायें एवं गड़बड़ियों की शिकायतें और प्रमाण मिल रहे हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख है। कुछ बातें तो व्यावहारिक समस्याआंे से संबंधित हैं। मसलन, कार्य पूरा होने में विलंब होना, निर्धारित समय पर कार्य आरंभ नहीं होना, जितना खर्च होना चाहिए उतना नहीं होना, आवंटित राशि खर्च नहीं होना आदि। ये बातें हर योजना में लागू होतीं हैं। ये कमजोरियां दूर हों, इसके उपाय तो किए जा सकते हैं, पर इसके आधार पर योजना रद्द नहीं की जा सकती। कोई यह कहे कि सांसद विकास निधि में निर्गत समस्त राशि व्यर्थ चली गई तो यह भी ठीक नहीं। इस निधि के तहत हुए कार्यों को देखा जा सकता है। संभव है कि कोई कार्य मार्गनिर्देशिका से बाहर का हो, किसी की गुणवत्ता निर्धारित मापदंड से कमजोर हो, कोई अधूरा रह गया हो, पर काम हुए हैं। लेकिन यह भी सच है सांसद एवं विधायक निधि भ्रष्टाचार में वृद्धि करने का कारण बना है। मार्ग निर्देशिका के अनुसार सांसद जिला कलक्टर या आयुक्त को कार्य की अनुशंसा करेंगे, जो राज्य सरकार की संबंधित एजेंसी के माध्यम से इस कार्य को पूरा करेंगे। लेकिन सामान्यतः सांसदों/ विधायकों द्वारा निर्धारित ठेकेदारों के हाथों काम संपन्न करने की परंपरा बन चुकी है। आम धारणा है और यह दिखता भी हैं कि इसमें कमीशन चाहने वाले सांसद/विधायक महोदय का हिस्सा निश्चित है। कई ईमानदार सांसद एवं विधायक स्वीकार करते हैं कि इस योजना के बाद ऐसे लोग उनके पास आते हैं जो कमीशन के अग्रीम भुगतान का प्रस्ताव देते हैं।
तो इसका सबसे बुरा असर हमारे जन प्रतिनिधियों की छवि पर हुआ है। आम धारणा यह बनी है कि सभी सांसद एवं विधायक कमीशनखोर हैं। जिनके हाथों देश के लिए विधान बनाने का दायित्व है, उनकी छवि पूरी तरह कलंकित हो जाए तो आम राष्ट्रीय मनोविज्ञान कैसा बनेगा इसका हम अनुमान भी लगा सकते हैं और इसे साक्षात महसूस भी कर सकते हैं। क्षेत्र विकास निधि से सांसदों विधायकों को जनता की मांग के अनुसार काम कराकर जनाधार बनाने मंे तो सहायता मिलती है, पर इसने उनके प्रति सम्मान भाव को धूल में मिला दिया है। सांसदों-विधायकों का सम्मान मिटने का अर्थ संसद एवं राज्य विधायिकाओं का सम्मान नष्ट होना है। यह इस योजना की सबसे भयावह मनोवैज्ञानिक परिणति है। इससे किसी के ईमानदार एवं नैतिक होने की प्रेरणा नष्ट हो रही है। कुल मिलाकर इससे राष्ट्रीय चरित्र को क्षति पहुंची है। यह ऐसी क्षति है जिसकी पूर्ति संभव ही नहीं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक इसके अंकेक्षण एवं मौनिटरिंग की अनुपयुक्तता को रेखांकित कर चुका है। स्वतंत्र एजेंसियों ने भी इसे उजागर किया है। सरकार ने जिलों या राज्यों को कुल निधि का दो प्रतिशत योजनाओं के समुचित क्रियान्वयन एवं मॉनिटरिंग के लिए आवंटित कर दिया है। स्वतंत्र एजेंसी से मॉनिटर कराने के लिए सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय का वार्षिक बजट पांच करोड़ रुपया बढ़ा दिया है। किंतु शायद ही कोई यह उम्मीद कर रहा होगा कि इससे विशेष अंतर आएगा। थोड़ा अंतर आ भी जाए तो इससे संासदो-विधायकों की जैसी शर्मनाक छवि बनी है उसमें परिवर्तन नहीं आ सकता। जाहिर है, इससे राष्ट्रीय चरित्र को जितनी क्षति पहुंच रही है उसकी भरपाई संभव नहीं। (संवाद)
सांसद विकास निधि में बढ़ोत्तरी
इस योजना ने सांसदों की छवि कलंकित की है
अवधेश कुमार - 2011-07-27 09:09
सांसद विकास निधि में सरकार ने आरंभिक हिचकिचाहट प्रदर्शित करने के बाद एकमुश्त तीन करोड़ रुपए की वद्धि कर दी है। अब सांसदों को विकास के लिए प्रतिवर्ष दो करोड़ की बजाय पांच करोड़ रुपया मिला करेगा। इस वृद्धि के साथ सांसद विकास निधि का कुल वार्षिक खर्च 1580 करोड़ की जगह 3950 करोड़ रुपया हो जाएगा। यह ऊपरी तौर पर दिखाई पड़ रहे उस माहौल के विपरीत है जिसमें लग रहा था कि सांसदों का बहुमत इस योजना को बनाए रखने के पक्ष में नहीं है।