कर्नाटक की सरकार भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण भारत में पहली बार वहां पार्टी सत्ता में आई है। विधानसभा का वह चुनाव भाजपा ने येदुरप्पा के नेत्त्व में ही लड़ा था और जीत हासिल करने में सफलता पाई थी। हालांकि विधानसभा चुनाव में उसे पूर्ण बहुमत तब भी नहीं मिला था, पर बहुमत के काफी नजदीक पहुंचने के कारण वह जोड़ तोड़ की नीति और निर्दलीयों की सहायता से सरकार बनाने में सफल हुई। अपनी इस सफलता को उसने दक्षिण के अन्य राज्यों में भी अपनी पैठ जमाने की कुंजी के रूप में देखा। यही कारण है कि भाजपा दक्षिण के इस राज्य को खोना नहीं चाहती और न ही येदुरप्पा को खोना चाहती है।

लेकिन अब येदुरप्पा को अपने पद पर बैठाए रखना भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। भाजपा किसी एक राज्य की पार्टी नहीं है। वह एक राष्ट्रीय पार्टी है और देश के अनेक राज्यों में उसकी सरकार है। अनेक राज्यों में वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में भी है। उसे देश भर में चुनाव लड़ने होते हैं और लोगों के सामने अपनी कामयाबियों और अपनी नाकामियों के लिए जवाबदेह होना होता है। इसलिए उसे सिर्फ कर्नाटक के बारे में नहीं सोचना चाहिए।

पिछले एक डेढ़ साल से भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। केन्द्र की यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के किस्से रोज के रोज सुनने को मिलते हैं। देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण भाजपा का यह राजनैतिक कर्तव्य बनता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का वे नेतृत्व करे। पर उसके अपने मुख्यमंत्री पर ही भ्रष्टाचार के दाग लगे हुए हों, तो वह किस नैतिक बल से भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनैतिक लड़ाई लड़ सकती है? कांग्रेस उसकी इस कमजोरी को समझती है और मौके बेमौके कनार्टक के मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की चर्चा करके अपने नेताओं के खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को कमजोर करने की कोशिश करती है।

कांग्रेस ने अपने कुछ नेताओं को भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बाद हटा भी दिए। यूपीए सरकार के एक अन्य घटक दल डीएमके के दो मंत्रियों को भी उनके पदों से हटाया गया और उनमें से एक तो अभी भी जेल में है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चौहान को भी उनके पद से हटा दिया गया था। हालांकि कांग्रेस मंें अभी भी भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित शुंगलू कमिटी ने उनका ,खुलासा भी किया है। पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। खुद प्रधानमंत्री कार्यालय पर अनेक भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। भाजपा इन सब पर अपनी आवाज भी मुखर करती है, लेकिन जब खुद उसके सभी नेता पाक साफ नहीं हों, तो फिर कांग्रेस के उसके विरोध में नैतिकता का बल नहीं रह जाता है।

यही कारण है कि भाजपा को येदुरप्पा से छुटकारा बहुत पहले पा लेना चाहिए था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री के कारण देश की इस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा कोई भी अभियान सफल नहीं हो पा रहा है। आज यदि देश के राजनैतिक माहौल में भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश लगातार बना हुआ है, तो उसका कारण भाजपा की भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई गई मुहिम नहीं है, बल्कि अन्ना हजारे और रामदेव द्वारा चलाए गए अभियान हैं। इसके अलावा इसमें मीडिया ने भी बड़ी भूमिका निभाई और बीच बीच में सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी देश के लोगों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ जली आग को जलाए रखने में सहायक साबित हो रहे हैं। दूसरी और भाजपा नकारा साबित हो रही है, क्योंकि उसका खुद का एक मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में घिरने के बाद भी मुख्यमंत्री के पद पर बना हुआ है और पार्टी उसे हटा नहीं पा रही है।

मुख्यमंत्री के रूप में येदुरप्पा का कार्यकाल उनके लिए कांटों का ताज रहा है। अनेक संकटों से सरकार घिरती रही है और गिरते गिरते बचती रही है। पहले बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के कारण सरकार गिर रही थी। सुषमा स्वराज ने हस्तक्षेप करके उसे बचाया। मुख्यमंत्री को अनेक समझौते करने पड़े, जिसमें खनन माफिया के सामने नतमस्तक होना भी शामिल था। दूसरा बड़ा संकट उस समय आया, जब समर्थन कर रहे निर्दलीय विधायकों और कुछ पार्टी के विधायकों ने ही सरकार से बगावत कर दी। स्पीकर की सहायता पार्टी के काम आई। बागी विधायकों की सदस्यता ही समाप्त कर दी गई और सरकार बच गई। बाद मे ंसुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर के उस निर्णय को पलट कर उन विधायकों की सदस्यता बहाल कर दी, पर तब तक वे विधायक पटा लिए गए थे। और सरकार बची रही।

पर येदुरप्पा सरकार पर नैतिकता का संकट लगातार मंडराता रहा। खुद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा था कि येदुरप्पा ने जो किया वह नैतिक रूप से गलत था, हालांकि उन पर किसी गैर कानूनी काम में हिस्सा लेने की बात से गडकरी इनकार करते रहे। अब लोकायुक्त की रिपार्ट आने के बाद गडकरी यह भी नहीं कह सकते कि मुख्यमंत्री ने वहां कोई कानूनी अनियमितता नहीं की थी।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री अब चारों तरफ से घिर चुके हैं। राज्यपाल ने उनके खिलाफ मुकदमे की इजाजत दे दी है। अदालत ने उस इजाजत पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सच तो यह है कि अदालत ने अपनी तरफ से भी जांच की सिफारिश कर दी है। लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने भी मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त पाया है। अब इतना सारा हो जाने के बाद भी भाजपा उन्हें अपने पद पर कैसे बने रहने दे सकती है, यह किसी भी की समझ के परे है।

यह सच है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री के भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और वेंकैया नायडू से संबंध कर्नाटक के मुख्यमंत्री और वहां के खान माफिया के रूप में ख्याति प्राप्त कुछ मंत्रियों से बहुत अच्छे रहे हैं। पर राजनीति चाहत और अनचाहत से नहीं चलती। जब स्थितियां बहुत ही विपरीत हों, तो राजनीति में चाहत को भी ताखे पर रखना होता है। आज वह समय आ गया है, जब भाजपा को कर्नाटक राज्य का मोह त्याग देना चाहिए। यदि येदुरप्पा को हटाने से उसकी वहां की सरकार चली जाती है, तो उस स्थिति के लिए भी उसे तैयार रहना होगा। सच तो यह है कि उसे वहां विधानसभा चुनाव करवाने की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए। (संवाद)