पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे को नाम का बहुमत हासिल हुआ है। इसके कारण उसकी स्थिरता पर सवालिया निशान शुरू से ही लगाया जा रहा है। मंत्रिमंडल के गठन के बाद कांग्रेसी विधायकों में उपजे असंतोष और सहयोगी पार्टियों की नाराजगी के कारण सरकार के लिए स्थिति और भी डरावनी बनी हुई हैं।

सरकार के कभी भी गिर जाने का डर उस समय सही साबित हो गया, जब वोटिंग के समय सभी सत्ताघारी विधायक सदन मे मौजूद नहीं थे। उस समय एक वित्तीय विधेयक पर मतदान होना था। वित्तीय विधेयक का सदन मे गिरने का मतलब होता है सरकार का ही गिर जाना। जो विधायक उस समय सदन में अनुपस्थित थे, उन्हें पता था कि उनके अनुपस्थित होने का मतलब क्या है। इसके बावजूद वे समय पर वहां नहीं थे, तो इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। सच कहा जाय, तो वे केरल की यूडीएफ सरकार को अपनी ताकत का अहसास करा देना चाहते थे।

दिलचस्प तथ्य है कि उस समय अनुपस्थित रहने वाले सभी विधायक कांग्रेस के थे। वैसे असंतोष तो सहयोगी दलों में भी है, पर अपने असंतोष को कम से कम सदन के कामकाज के दौरान आवाज देना सहयोगी दलों ने २ाुरू नहीं किया है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग कांग्रेस के बाद मोर्चे में सबसे ज्यादा विधायक वाली पार्टी है। वह एक और मंत्री सरकार में चाहती है, लेकिन मुख्यमंत्री इसके लिए तैयार नहीं है। उसकी नाराजगी की एक वजह केन्द्र में हुआ मंख्मिंडल में फेरबदल भी है। उसके एक मंत्री ई अहमद केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री हैं। लीग को उम्मीद थी कि फेरबदल में श्री अहमद को राज्य मंत्री के रूप में स्वतंत्र प्रभार मिल जाएगा। पर वैसा कुछ हुआ नहीं। इसके कारण लीग के नेताओं के बीच का असंतोष और भी बढ़ गया है। इसका असर राज्य सरकार की स्थिरता पर पड़ सकता है।

फिलहाल लीग के असंतोष का असर विधानसभा में दिखाई देना अभी बाकी है। सरकार पर संकट कांग्रेसी विधायकों के कारण ही पैदा हुआ था। जब विधान सभा में वह वित्तीय विधेयक पारित किया जाना था, तो उस समय 4 विधायकों की कमी थी। कम विधायकों की संख्या को देखकर विधानसभा के स्पीकर ने मतदान में ही विलंब करवा दिया। विपक्ष ने स्पीकर के उस निर्णय का विरोध किया। उनका कहना था कि स्पीकर विलंब करवाकर सत्ता पक्ष का साथ दे रहे हैं। स्पीकर ने मतदान में आधे घंटे का विलंब करवा दिया और इस तरह से विधायकों को सदन में जुटाने के लिए सरकार को समय मिल गया।

विपक्ष ने स्पीका के उस कदम का विरोध किया। उसने मतदान के समय सदन का बहिष्कार भी किया। बाद में राज्यपाल को स्पीकर के खिलाफ ज्ञापन दिया और उनसे अनुरोध किया कि वे उस विधेयक को मंजूरी नहीं दें। (संवाद)