ऐसा सोचते समय केन्द्र सरकार भूल कर रही है, क्योंकि अन्ना हजारे रामदेव नहीं हैं। रामदेव ने पिछले 8 सालों में हजारों करोड़ की संपत्ति अर्जित कर ली है और वे उसे बचाने के लिए सरकार के सामने झुक सकते हैं अथवा मैदान छोड़कर भाग सकते हैं, लेकिन अन्ना के पास वैसी कोई संपत्ति नहीं है। रामदेव का अन्याय के खिलाफ लड़ने का कोई इतिहास नहीं रहा है। योग शिविरों में योग सीखने आए लोगों के सामने राजनैतिक बातें कर और बात में उन भाषणों को टीवी चैनलों पर दिखाकर रामदेव ने अपने आपको भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा किया, पर वे कभी भी भ्रष्टाचार, अन्याय, दमन, शोषण अथवा किसी सामाजिक कुरीति का एक कार्यकर्त्ता के रूप में कभी भी विरोध नहीं किया। सच कहा जाए तो इन मामलों पर संधर्ष का उनका कोई इतिहास ही नहीं रहा है।
पर अन्ना तो लगातार लड़ते रहे हैं। उन्होंने नखाखोरी जैसी समस्या के खिलाफ लड़ाई लड़ी और उसमें सफल भी रहे। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ वे पहले भी लड़ते रहे हैं। अनेक बार उन्होंने अनशन किया है। उनके जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा ही सार्वजनिक जीवन में गलत चीजों का विरोध करते हुए उन्होंने बिताया है। उनमें उन्हें अनेक बार सफलता भी मिली और विफलता भी मिली होगी। वे गांधीवादी हैं और गांधीवाद का मतलब भी समझते हैं। दूसरी तरफ बाबा रामदेव ने अपनी पहचान शायद ही कभी गांधीवादी के रूप में करवाई होगी। यही कारण है कि जब उन्होंने सत्याग्रह का गांधीवादी तरीका रामलीला मैदान में अपनाया, तो सरकारी कार्रवाई के सामने उन्हें मैदान छोड़कर भागना पड़ा।
जाहिर है ताकत के बल पर अन्ना के आंदोलन को दबाने का सरकार का कोई भी निर्णय उसके खिलाफ जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में जबर्दस्त माहौल बना हुआ है। सरकार इस माहौल को और लंबा खींचने का काम कर रही है। मीडिया में भ्रष्टाचार और अनियमितता के रोज नए नए मामले सामने आ रहे हैं। यदि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, तब भी इसके खिलाफ बना यह माहौल पुख्ता होता है और जब कार्रवाई नहीं होती है, तब भी यह माहौल और गरम होता है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा को उनके पद से हटाने के भाजपा के निर्णय के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में शामिल लोगों के उत्साह और बढ़े ही हैं और पी चिदंबरम के सरकार में बने रहने के कारण केन्द्र सरकार के खिलाफ गुस्सा और भी बढ़ा है।
केन्द्र सरकार ने जो लोकपाल के विधेयक का मसौदा पेश किया है, उसमें ज्यादा बात इस पर चल रही है कि प्रधानमंत्री को इस कानून के दायरे से बाहर क्यों रखा जा रहा है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि इस कानून के दायरे से प्रथम श्रेणी के सरकारी अधिकारियों के अलावा अन्य सबको बाहर क्यों रखा गया है। देश की जनता इस कानून से न सिर्फ ऊंचे पदों पर हो रहे भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मजबूत तंत्र देखना चाहती है, बल्कि स्वयं भी भ्रष्टाचार से राहत चाहती है। केन्द्र सरकार अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। उनमें अरबों और खरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन वे सभी के सभी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं। उनमें हो रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने या कम करने के लिए सरकार को एक तंत्र विकसित करना चाहिए। अन्ना हजारे की टीम द्वारा तैयार मसौदे में उसका प्रावधान है, लेकिन सरकार ने जो लोकपाल कानून तैयार किया है, उसमें वैसा कुछ भी नहीं है। यदि पंचायत में केन्द्रीय राशि का दुरूपयोग होता है और वह भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ जाती है, तो फिर उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आज कोई पुख्ता तंत्र नहीं है।
इसलिए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाय या नहीं, केन्द्र सरकार के सारे कर्मचारियों और केन्द्र सरकार की योजनाओं के अमल में लगे सभी लोगों को लोकपाल कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए और देश के सभी जिलों में लोकपाल के दफ्तर और अफसर होने चाहिएं। तभी देश का आम व्यक्ति अपने आपको भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ सुरक्षित होने का अहसास कर सकेगा और नीचले स्तर पर भ्रष्टाचार को कम किया जा सकेगा।
सवाल उठता है कि सरकार ऐसा करना क्यों नहीं चाहती है? प्रधानमंत्री के बारे में तो वह कह सकती है कि प्रधानमंत्री को लोकसभा के प्रति ही जवाबदेह रहने देना चाहिए, लेकिन प्रथम श्रेणी से नीचे के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को वह लोकपाल कानून के दायरे मे क्यों नही लाचा चाहती? यह सच है कि उस स्तर के कर्मचाकरियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत करने का पहले से ही प्रावधान है, लेकिन वे प्रावधान नकारा हैं। उनसे कोई फायदा नहीं हो रहा है। इसलिए लोकपाल कानून के अंदर उन्हें भी लाया जाना चाहिए और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मुकम्मल व्यवस्था होनी चाहिए।
अब जब अन्ना अनशन पर बैठेंगे, तो उनसे निब्टने की जिम्मेदारी होगी दिल्ली पुलिस की, तो केन्द्र के गृहमंत्रालय के अंदर काम करती है और आज गृहमंत्री हैं पी चिदंबरम, जिन पर खुद भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। जाहिर है एक तरफ होंगे अन्ना और दूसरी तरफ होंगे चिदंबरम। फिर भ्रष्टाचार की लड़ाई का क्या रूप होगा, इसे कोई भी समझ सकता है।
सरकार को संसद से बाहर अन्ना का सामना ही नहीं करना है, बल्कि अंदर विपक्षी हमलों का भी सामना करना होगा। भाजपा कर्नाटक के मुख्यमंत्री से इस्तीफा दिलानें के बाद संसद में अपनी आक्रामकता की चरम पर होगी और उसके मुख्य निशाने पर खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पी चिदंबरम होंगे। यह सच है कि केन्द्र सरकार अन्ना के खिलाफ अन्य राजनैतिक दलों का भी इस्तेमाल करना चाह रही है, लेकिन सभी राजनैतिक दलों के अपने अपने राजनैतिक हित होते हैं और वे सभी उसको घ्यान में रखकर अन्ना से संबंधित अपनी नीति तैयार करेंगे।
बाबा रामदेव को शंांत करके केन्द्र सरकार समझ रही है कि वह अन्ना और उनके समर्थकों को भी शांत कर देगी। यही कारण है कि वह अभी से धारा 144 लगा रही है और अन्ना के आंदोलन को शर्तां के दायरे में ला रही हैं। पर रामदेव की तरह अन्ना का आंदोलन एक व्यक्ति का खेल नहीं हैं। उनके साथ काफी अनुभव रखने वाले लोग हैं और अन्ना को खुद आंदोलनों का काफी अनुभव है। इसलिए अच्छा यही रहेगा कि सरकार अभी भी समझदारी से काम ले और अन्ना टीम द्वारा तैयार मसौदे के ज्यादा से ज्यादा प्रावधानों को प्रस्तावित कानून का हिस्सा बनाए।
(संवाद)
लोकपाल कानून पर छिड़ा संग्राम
अन्ना को रामदेव समझने की भूल नहीं करे सरकार
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-07-31 05:37
लोकपाल कानून के मसले पर देश में बन रहा तनाव दुर्भाग्यपूर्ण है। एक तरफ अन्ना हजारे केन्द्र सरकार द्वारा तैयार किए गए विधेयक के मसौदे से असंतुष्ट होकर 16 अगस्त से आमरण अनशन पर जाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ केन्द्र सरकार उनके साथ उसी तरह का सलूक करने की सोच रही है, जैसा उसने स्वामी रामदेव के साथ किया।