आखिर यह जीएसटी यानी वस्तु सेवा कर क्या है, जिसकी व्यवस्था लागू करने का इतना विरोध हो रहा है, पर जिसे साफ साफ खारिज करने के लिए भी कोई सामने नहीं आ रहा है? जीएसटी यानी वस्तु सेवा कर वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाने वाले अप्रत्यक्ष कर कर है। हमारे देश में वस्तुओं और सेवाओं पर पहले से ही कर लगाए जा रहे हैं, लेकिन जब हम जीएसटी की बात करते हैं तो इसका मतलब एक ऐसी नई व्यवस्था से है, जिसमें कराधान बहुत ही सरल हो जाता है, करों की दरें भी कम हो जाती हैं, कराधान के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोग आ जाते हैं, करों से प्राप्त होने वाला राजस्व कई गुना बढ़ जाता है। जाहिर है कर राजस्व की बढ़ोतरी की लालसा पालने वाली राज्य और केन्द्र सरकारों के लिए यह एक बेहतर विकल्प है, इसलिए वे इसे खारिज नहीं कर सकती। परंतु इस क्रांतिकारी व्यवस्था के लागू किए जाने के कारण पुरानी व्यवस्था उलट पुलट हो जाएगी और अनेक राज्य यह अनुमान लगाने में विफल हो रहे हैं कि इसके कारण कुछ मदों में उनको कितना नुकसान होगा। यही कारण है कि वे इसका विरोध कर रहे हैं।

जीएसटी को सबसे पहले फ्रांस में लागू किया गया था और अबतक दुनिया के 140 देश इसे लागू कर चुके हैं। जाहिर है, इसे लागू करने के मामले में भारत बहुत पीछे चल रहा है। इसका कारण भी है। भारत में एक संधीय व्यवस्था है, जहां कुछ मामलों मे केन्द्र सरकार को तो कुछ मामलों में राज्य सरकारों को कर लगाने और उगाहने का अधिकार है। उनके अधिकार संविधान द्वारा पारिभाषित हैं। यही कारण है कि यहां केन्द्र सरकार भी वस्तुओं पर कर लगाती है, तो राज्य सरकारें भी लगाती हैं। केन्द्र सरकार यदि उत्पाद और सीमा शुल्क लगाती हैं, तो राज्य सरकारें सेल्स टैक्स और अब वैट (वैल्यू ऐडेड टैक्स) लगाती हैं। इन सबके अलावा अनेक प्रकार के टैक्स केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाते हैं। ऑक्ट्राय टैक्स, एंट्री टैक्स, टर्न ओवर टैक्स, बाजार समिति टैक्स और अलग अलग नामों वाले अनेक सारे टैक्स। जब जीएसटी की नई व्यवस्था आएगी, तो अन्य सारे अप्रत्यक्ष टैक्स समाप्त कर दिए जाएंगे। बस दो ही टैक्स रह जाएंगे। एक टैक्स होगा वस्तु (गुड्स) पर लगाया जाने वाला टैक्स और दूसरा होगा सेवा (सर्विसेज) पर लगाए जाने वाला टैक्स। जाहिर है इसके कारण कराधान (टैक्सेशन) काफी सरल हो जाएगा। इसके प्रशासन की जटिलता भी समाप्त हो जाएगी। चूंकि सभी वस्तु और सेवाओं की करों की दर भी प्रायः समान ही रहेगी, इसलिए इसके बारे में भी किसी को भ्रम नहीं रहेगा।

वर्तमान व्यवस्था में एक ही वस्तु पर अनेक बार टैक्स लग जाता है। नई व्यवस्था में टैक्स एक ही बार और एक ही दर से लगेगा। जाहिर है, टैक्स देने वालों का काम भी आसान हो जाएगा। जो ईमानदार टैक्स दाता हैं, उन्हें फायदा होगा। जटिलता कम होने के कारण कर प्रशासन भी चुस्त और दूरुस्त हो जाएगा। उसमें पारदर्शिता भी आ जाएगी। इसकी वजह से जो टैक्स नहीं दे रहे हैं, वे भी आसानी से इसके दायरे में लाए जा सकेंगे। वतैमान व्यवस्था ईमानदार कर दाताओं को देडित करने वाली और बेइमान कर वंचकों को पुरस्कृत करने वाली साबित हो रही है। इसके कारण काले धन का बड़़े पैमाने पर सृजन हो रहा है और एक समानांतर काली अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आ गई है। जीएसटी की नई व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं, सेवाओं और उद्यमियों को करांे के दायरों में लाकर काले धन की समस्या को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

सेवाओं का उदाहरण लें। देश की राष्ट्रीय आय मे सेवा सेक्टर का योगदान 60 फीसदी है, लेकिन सेवाओं से प्राप्त होने वाला कर राजस्च कुल अप्रत्यक्ष कर राजस्व का मात्र 10 फीसदी ही है। जाहिर है इस सेक्टर से कर राजस्व बहुत ही कम हो रहा है। यह स्थिति नई व्यवस्था में बदल जाएगी। अभी सिर्फ केन्द्र सरकार ही सेवाओं पर कर वसूलती है, राज्य सरकारें इस क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं कर पाई हैं। नई व्यवस्था में राज्य सरकारें ेभी सेवाओं पर कर वसूली कर सकेंगी।

भारतीय संविधान संघीय व्यवस्था के तहत केन्द्र और राज्यों को अलग अलग वित्तीय अधिकार देता है। जीएसटी लागू करने के पहले इन अधिकारों को फिर से पारिभाषित करना होगा। राज्यों को अपने अनेक वित्तीय अधिकार सरेंडर करने होंगे, तो केन्द्र सरकार को भी अनेक वित्तीय अधिकार सरेंडर करने होंगे। राज्यों के बीच जिच इन्हीें कारणों से बनी हुई है। नई व्यवस्था में केन्द्र और राज्य सरकारें ज्यादा हासिल करना और कम खोना चाहती हैं। जीएसटी को लेकर एक संविधान संशोधन विधेयक वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले 22 मार्च को लोकसभा मे पेश भी कर दिया है। वे विधेयक वित्त मंत्रालय की स्थाई समिति के विचाराधीन है और उस पर समिति के सांसदों के बीच मंथन चल रहा है। इस संविधान संशोधन विधेयक के संसद द्वारा पारित होने के बाद ही जीएसटी का भारतीय स्वरूप हमारे सामने आ सकेगा और हम देख सकेंगे कि इसमें किसने क्या खोया और किसने क्या पाया। संविधान संशोधन विधेयक पारित होने के लिए संसद के दो तिहाई सदस्यों द्वारा इसके पक्ष मे मतदान जरूरी है। इसके अलावा देश के आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा भी इसे पारित किया जाना होगा।

जीएसटी की एक खासियत यह होगी कि इसमें कर उपभोक्ता के बिंदु पर लगेंगे, उत्पादन के बिंदु पर नहीं। यही कारण है कि गुजरात जैसे उत्पादक राज्य इसको लेकर सशंकित हैं। इसकी दूसरी विशेषता होगी कि वस्तु सेवा कर (जीएसटी) भी दो प्रकार की होगी, क्योंकि संघीय व्यवस्था होने के कारण यहां राज्य सरकारों को भी कर चाहिए और केन्द्र सरकार को भी। एक राज्य वस्तु सेवा कर होगा और दूसरा केन्द्र वस्तु सेवा कर। पहले वस्तु सेवा कर की दर का निर्धारण किया जाएगा और उसके बाद तय होगा कि उसमें कितना हिस्सा केन्द्र जीएसटी का रखा जाय और कितना राज्य जीएसटी। राज्यों के बीच अथवा किसी राज्य और केन्द्र के बीच होने वाले विवाद को हल करने की एक संस्थागत व्यवस्था भी बनानी पड़ेगी। (संवाद)