भारी दबाव में आकर केन्द्र सरकार पहले ही एक बार गलती कर चुकी है। उसने अन्ना के अनशन के दबाव में आकर सिविल सोसायटी के 5 सदस्यों को लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति का सदस्य बना दिया था। उस मांग को स्वीकारने के साथ उसने टीम अन्ना की जीत स्वीकार कर ली थी। वह दौर अन्ना के पक्ष में गया था, लेकिन बाद में जब बैठकें हुईं, तो केन्द्र सरकार के सदस्यों ने अन्ना टीम के दबाव में आने से इनकार कर दिया। उनकी कुछ मांगे तो उन्होंने मान लीं, लेकिन अधिकांश महत्वपूर्ण मांगों को मानने से इनकार कर दिया।
अन्ना प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहते थे, लेकिन प्रस्तावित विधेयक में सरकार ने ऐसा नहीं किया है। अन्ना की टीम पूरी नौकरशाही को ही लोकपाल के दायरे में लाना चाहती थी, लेकिन इसके लिए भी सरकार तैयार नहीं हुई। अन्ना की न्यायपालिका को इसके दायरे मं लाने की मांग को भी सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है। सिविल सोसायटी के सदस्य चाहते थे कि मुख्य सतर्कता आयुक्त को लोकपाल के अधीन कर दिया जाए और सीबीआई की अपराध निरोधक शाखा को भी लोकपाल के मातहत कर दिया जाए। सरकार इसके लिए भी तैयार नहीं हुई। इसके अलावा टीम अन्ना चाहती थी कि लोकपाल को व्यापक अधिकार मिले और वह भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम हो, लेकिन केन्द्र सरकार लोकपाल को सिर्फ एक एडवाइजरी बॉडी बनाकर रखना चाहती है।
जाहिर है केन्द्र सरकार द्वारा तैयार किए गए विधेयक और अन्ना द्वारा तैयार किए गए जन लोकपाल विधेयक में आसमान जमीन का अंतर है। इसके कारण अन्ना टीम के लोग सरकारी लोकपाल विधेयक के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं और उस विधेयक की प्रतियों को जला भी रहे हैं। अन्ना 16 जून से अनशन करने की अपनी घोषणा पर भी अड़े हुए हैं।
पर सरकार उनकी बात मानने के मूड में नहीं है। सरकार कह रही है कि संसद सर्वोपरि है और जो संसद चाहेगी, वही होगी। अन्ना टीम के लोग लोकमत की दुहाई दे रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके लोकपाल विधेयक के समर्थन में देश का बहुत बड़ा हिस्सा उनके साथ है। कपिल सिब्बल के लोकसभा क्षेत्र दिल्ली के चांदनी चौक में अन्ना टीम के लोगों ने एक जनमत संग्रह भी कराया है और उनका निष्कर्ष है कि चांदनी चौक के 83 फीसदी से भी ज्यादा मतदाता प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के खिलाफ हैं। सवाल उठता है कि क्या सरकार उस तरह के जनमत संग्रह के आधार पर अपना निर्णय लेगी?
संसद का सत्र चल रहा है। अन्ना कह रहे हैं कि वे प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के खिलाफ 16 अगस्त से अपना आमरण अनशन शुरू कर देंगे और अपनी जान तक कुर्बान करने में नहीं हिचकिचाएंगे। अन्ना ने अपने अनशन के लिए समय भी बहुत गलत चुना है। वे 16 अगस्त से अनशन करने की बात कर रहे हैं, जबकि उस समय संसद का सत्र चल रहा होगा। संसद में विधेयक के पारित होने की अपनी एक प्रक्रिया होती है। विधेयक पेश होने के बाद विवादास्पद होने पर मंत्रालय की प्रवर समिति के पास चला जाता है, जहां उस पर विचार होता है। उस समय उसमें फेरबदल की गुंजायश होती है और सभी पार्टियों के सांसद अपनी अपनी पार्टी की राय रखते हैं।
जिस समय अन्ना अनशन पर बैठे होेगे, उस समय बहुत संभव है कि वह विधेयक प्रवर समिति के पास होगी। विधेयक पर प्रवर समिति देश ने लोगो की राय भी आमंत्रित करती है। कानून निर्माण की तया प्रक्रिया के तहत उस समय अन्ना को सभी पार्टी के और खासकर विपक्षी पार्टी के सांसदों की राय को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी चाहिए। इसका कारण यह है कि वैसा करके भी टीम अन्ना फेरबदल को संभव बना सकती है। पर सांसदों से बातचीत करके प्रवर समिति में विधेयक में संशोधन को संभव बनाने के बदले अन्ना सीधे अनशन के द्वारा केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर चल रहे हैं, जिसका असर उलटा भी हो सकता है। (संवाद)
अन्ना टीम और केन्द्र सरकार का टकराव
इस बार अनशन उलटा असर कर सकता है
कल्याणी शंकर - 2011-08-05 19:18
अन्ना के नेतृत्व वाला सिविल सोसायटी सरकार द्वारा पेश किए गए लोकपाल विधेयक का विरोध कर रहा है। इस टकराव का आखिर क्या नतीजा होगा? क्या सरकार अन्ना की मांग के सामने झुक जाएगी और उसके अनुसार विधेयक के प्रावधानों में बदलाव कर देगी? यदि वह ऐसा करती है, तो फिर अन्य विवादास्पद विधेयकों का भविष्य क्या होगा?