कैग ने अपनी रिपोर्ट में कोई ऐसी बात नहीं की है, जो लोगों से छिपी हुई थी। दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के नाम पर खुली लूट हो रही थी और वह सभी को दिखाई भी पड़ रही थी। जो लोग दिल्ली में रहते हैं, वे उस लूट का उस समय भी शिकार हो रहे थे, जब वह लूट अपने चरमात्कर्ष पर थी और उस लूट के बाद भी उसके शिकार हुए हैं, क्योंकि उस लूट ने यहां के लोगों का खर्च बढ़ा दिया है। बसो की यात्रा कई गुणा महंगी हो गई है। आवास कर बढ़ा दिए गए हैं। सर्किल रेट भी बढ़ा दी गई है। बिजली महंगी हो गई है। पानी भी महंगा किया जा रहा है। आवास कर को और भी बढ़ाने की बात की जा रही है। बिजली को और भी महंगा करने की बात की जा रही है। पार्किंग शुल्क भी बढ़ा दिया गया है। यह तो खेलों के दौरान हुई लूट का दिल्ली वासियों पर पड़ रहा असर है, जब वह लूट हो रही थी, तब दिल्ली पूरी तरह से एक कंस्ट्रक्शन साइट में तब्दील हो गई थी। पूरी दिल्ली खुदी हुई थी। अच्छे निर्माणों को घ्वस्त करके उसके ऊपर घटिया निर्माण का लेप चढ़ाया जा रहा था। निर्माण कार्यों से पूरी दिल्ली जाम हो गई थी।
वह सब किया जा रहा था राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर। कहा जा रहा था कि दिल्ली को संुदर बनाया जा रहा है, ताकि खेलों के दौरान जब विदेशी दिल्ली को देखें तो देखते रह जाएं। दिल्ली वाले देख रहे थे कि जो काम हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश को खेल शुरू होने तक पूरे भी नहीं होंगे। सच तो यह है कि जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल के खेल शुरू हुए थे, उस समय दिल्ली पहले से भी भद्दी हो चुकी थी। जितना तोड़फोड़ किया गया था, उन सारी जगहों पर निर्माण हो ही नहीं सका था। राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दिल्ली को सुेदर बनाने की जो कवायद शुरू हुई थी, वह खेलों के समाप्त होने के बाद भी जारी रही। सच तो यह है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अनेक परियोजनाओं पर काम अब तक भी समाप्त नहीं हो पाया है।
राष्ट्रमंडल खेलों का दिल्ली में आयोजन दिल्ली के लिए एक बड़ा दर्द बनकर उभरा। इसने यहां के लोगों को तो सताया ही, दुनिया भर में देश और दिल्ली को बदनाम करने का काम किया। खेलों के लिए जरूरी काम भी समय पर नहीं हो पाए थे। इसके कारण दुनिया भर में देश की जगहंसाई हुई। खेल शुरू होने के पहले दुनिया भर में भारत की जो दुर्दशा हो रही थी, वह सब हम देख रहे थे। उस दुर्दशा के पीछे सिर्फ और सिर्फ लोभ था। राष्ट्रमंडल खेलों में देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, इसलिए खजाने को पूरी तरह से खोल दिया गया था, ताकि तैयारियों में कोई कमी न रहे। खुले हुए खजाने तैयारियों को अंजाम कम दे रहे थे, लूट को बढ़ावा ज्यादा दे रहे थे।
दिल्ली सरकार ने जानबूझकर उतने सारे कामों को मंजूरी दे दी, जितने काम तय समय में कराए ही नहीं जा सकते थे। मंजूरी देने के बाद जानबूझकर और विलंब कर दिया गया, ताकि लूट के लिए मौका मिल जाए और खर्च पर अंकुश लगाने अथवा हिसाब किताब की देखभाल करने वाला तंत्र पंगु हो जाए और उसे यह कहकर शांत कर दिया जाए कि देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, पैसे के खर्च को मत देखो।
यह सब दिल्ली के लोग जानते हैं। यह सब खुलेआम हुआ है। दिल्ली के लोग यह भी जानते हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों में सरकारी खजाने की लूट का नेतृत्व सुरेश कलमाड़ी ने नहीं, बल्कि शीला दीक्षित ने किया। सुरेश कलमाड़ी को शीला दीक्षित के बाद दूसरे स्थान पर ही रखा जा सकता है, पहले स्थान पर नहीं। पर आज सुरेश कलमाड़ी जेल में हैं और शीला दीक्षित दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद पर।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रमंडल खेलों में हुई अनियमितता की जांच के लिए शंुंगलू कमिटी बनाई थी। उस कमिटी ने भी शीला दीक्षित की ओर अंगुली उठाई थी। हालांकि उस कमिटी ने सिर्फ मुख्यमंत्री की ओर इशारा ही किया था, पर कैग ने तो साफ साफ बता दिया है कि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के इस खेल में किस तरह से शामिल थीं। अब इतना साफ साफ आरोप लग जाने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद पर शीला दीक्षित को बनाए रखना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
कैग ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भी घेरे मंे लिया है। उस पर आरोप है कि उसने सुरेश कलमाड़ी को खेल मंत्री और मंत्रियों के समूह की आपत्ति के बावजूद आयोजन समिति का अध्यक्ष बना दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय पर अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए गलत व्यक्ति को आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाने का आरोप है, लेकिन उस पर भ्रष्ठाचार का कोई सीधा आरोप नहीं है। इसके बावजूद विपक्ष प्रधानमंत्री से स्पष्टकरण मांग रहा है। जाहिर है दबाव प्रधानमंत्री पर भी होगा। शीला दीक्षित का तो इस्तीफा ही मांगा जा रहा है।
शीला दीक्षित अपने पद पर रहें या नहीं, इसका फैसला तो सोनिया गाध्ंाी करेंगी। फैसला लेते समय उन्हें इस बात का ख्याल रखना होगा कि दिल्ली देश की राजधानी है और जब यदुरप्पा का अपने पद पर बने रहना एक राष्ट्रीय मुद्दा हो सकता है, तो शीला दीक्षित का भी अपने पद पर बना रहना एक ऐसा राष्ट्रीय मुद्दा हो सकता है, जिससे कांग्रेस को अगले साल होने वाले चुनावों में नुकसान होगा। खुद दिल्ली में भी नगर निगम के चुनाव होने हैं। निगम पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है। भाजपा शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री बने रहने के खिलाफ अपनी आक्रामकता लगातार बढ़ा रही है और यदि सुश्री दीक्षित अपने पद पर बनी रहती हैं, तो इससे नगर निगम के चुनाव में भाजपा को ही फायदा होगा, क्योंकि दिल्ली में माहौल पूरी तरह से शीला के खिलाफ हो गया है। (संवाद)
शीला दीक्षित की कुर्सी कितनी सलामत?
सारा दारोमदार सोनिया गांधी पर
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-08-06 18:05
कैग की ताजा रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का अपने पद पर बने रहना मुश्किल हो गया है। दिल्ली में मुख्य विपक्ष भारतीय जनता पार्टी है और उसने कर्नाटक में यदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाकर अपने को नैतिकता के उस धरातल पर खड़ा कर दिया है, जहां से वह शीला दीक्षित पर गंभीर चोट कर सकती है। भाजपा की यह चोट न केवल शीला दीक्षित पर होगी, बल्कि इसके दायरे मंे कांग्रेस भी होगी। अगले साल दिल्ली में नगर निगम का चुनाव भी होना है। इस चुनाव का सामना कांग्रेस यदि शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री बनाकर करती है, तो उसके लिए आक्रामक भाजपा का सामना करना लगभग असंभव होगा। यही कारण है कि इस बार शीला दीक्षित की कुर्सी पर खतरा वास्तविक हो गया है।