हालांकि विधानसभा के चुनाव मई के मध्य तक करवाए जा सकते हैं, लेकिन जिस तरह की राजनैतिक गतिविधियां चल रही हैं, उनसे तो यही लगता है कि चुनाव समय से पहले भी करवाए जा सकते हैं।

भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस वाई कुरैशी का पिछले दिनों लखनऊ में दौरा हुआ था। उस दौरे के दौरान श्री कुरैशी ने कहा था कि चुनाव फरवरी और मार्च महीने में करवाए जा सकते हैं।

पत्रकारों से बात करते हुए भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा था कि राज्य की सभी मुख्य पार्टियों ने कहा है कि चुनाव फरवरी और मार्च के महीनों में ही करवाए जान चाहिएं, क्योंकि उसके बाद छात्रों की बोर्ड परीक्षाएं होती हैं और फसलों की कटनी भी शुरू हो जाती हैं।

श्री कुरैशी ने कहा कि निर्वाचन आयोग पहले उन सभी पांचों राज्यों का दौरा करेगा, जहां आगामी साल के शुरुआती महीनों में चुनाव होने वाले हैं। दौरों मंे उन राज्यों का जायजा लिया जाएगा और उसके बाद ही चुनाव की तिथियों के बारे में कोई निर्णय लिया जाएगा।

चुनाव की आहटों के बीच राजनीतिज्ञों का एक पार्टी से दूसरी पार्टी मंे कूद कर जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। जीतने वाली सीटों की तलाश मे लोग एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जा रहे हैं। इसके कारण राज्य में राजनैतिक भ्रम और भी फैल रहा है।

सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी और मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी एक दूसरे के विधायकों को अपनी ओर खींचने में लगे हुए हैं और इस तरह वे मनोवैज्ञानिक युद्ध में अभी से लगे हुए हैं। समाजवादी पार्टी ने जिन विधायकों के टिकट काट दिए हैं, वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो रहे हैं और बसपा के जिन विधायकों को पार्टी टिकट मिलने की कोई गुंजायश नहीं दिख रही, वे सपा का दामन थाम रहे हैं।

इस बीच समाजवादी पार्टी लोगों के बीच यह संदेश देने में सफल हो रही है कि सत्तारूढ़ बसपा को पराजित करने की क्षमता उसी में है, क्योंकि बसपा को छोड़ने वाले विधायक उसी की शरण में जा रहे हैं।

राजनैतिक पंडितों का कहना है कि जिस तरह से मायावती सरकार के निर्णयों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के फैसले आ रहे हैं, उनके कारण मायावती को एक के बाद एक झटका लग रहा है। उनके खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने का मुकदमा भी कोर्ट में चल रहा है और जमीन अधिग्रहण का मामला भी उनके खिलाफ जा रहा है। नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में हुए भ्रष्टाचार और उस मिशन से जुड़े डॉक्टरों की हत्या के मामलों ने भी माया सरकार को सांसत में डाल दिया है।

आने वाले दिनों मंे इन मामलों पर आए फैसले और उन पर हुई आगे की कार्रवाई से मायावती सरकार की हालत और भी खराब होगी और सत्तारूढ़ पार्टी की छवि को और भी धक्का लगेगा। इन सबके कारण फिजा बसपा के खिलाफ होती जाएगी, जिसका असर बसपा के उम्मीदवार की जीत की संभावना पर भी पड़ सकता है।

इसके अलावा बसपा के अनेक विधायक समाजवादी पार्टी से टिकट लेने के लिए कतार में खड़े हैं। इसके कारण मायावती की चिंता और भी बढ़ती जा रही है। इसके कारण मायावती को यह बार बार कहन पड़ रहा है कि वे सभी विधायकों को फिर से टिकट दे देंगी और यदि किसी को टिकट नहीं भी मिला, तो उसे फिर कहीं एडजस्ट कर दिया जाएगा।

पर बसपा के विधायकों को मलाल इस बात का है कि उनमें से अधिकांश पिछले साढ़े 4 सालों के दौरान मुख्यमंत्री मायावती से मिलने का समय तक नहीं पा सके थे। उन्हें अपने क्षेत्र मे काम कराने मे न तो मुख्यमंत्री का सहयोग मिला और न ही अधिकारियों का। इसलिए उन्हें लगता है कि बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए वे मतदाताओं का सामना नहीं कर पाएंगे।

ऐसी परिस्थिति में यह संभव है कि मुख्यमंत्री विधानसभा को भंग करवा दें और अपने आपको काम चलाऊ मुख्यमंत्री की भूमिका में लाकर विधानसभा का समय से पहले ही चुनाव करवा दें। 11 अगस्त को विधानसभा का मानसून सत्र समाप्त हो रहा है। उसके बाद बसपा विधायकों की बैठक होगी। उस बैठक पर लोगों की नजर टिकी हुई है। (संवाद)