इस विवाद की जड़ छह सात साल पहले पेश किए गए सेना के उस प्रस्ताव में स्थित है, जिसमें रक्षा मंत्रालय ने पेशकश की थी कि चीन और म्यान्मार से सटे सीमा की सुरक्षा का जिम्मा उसे ही दे दिया जाय। उसका कहना था कि इससे म्यान्मार और चीन की सीमा पर उसके आपरैशन में बेहतर समन्वय हो सकता है। सेना का कहना था कि चीन भारत की सीमा पर आपत्तिजनक गतिविधियां चलाया करता है और अरुणाचल प्रदेश पर उसकी नजर है, इसलिए उसके साथ जुड़ी सीमा की रखवाली करने का जिम्मा भी म्यान्मार सीमा की तरह उसे ही सौप दिया जाय।

सेना का वह प्रस्ताव गृह मंत्रालय को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि इंडो तिबतन बोर्डर पुलिस द्वारा उस सीमा की देखरेख का जिम्मा केन्द्र का यह मंत्रालय संभालता है। इसका कहना है कि उसके अधीन काम करने वाला वह बल अपना काम सही तरीके से कर रहा है और साढ़े 22 हजार की ऊंचाई तक के दुर्गम इलाके में उसके जबान लगातार निगेहबानी कर रहे हैं, इसलिए उनसे यह जिम्मा लेने की जरूरत नहीं है।

यही कारण है कि गृह मंत्रालय ने सेना के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। और अब यह अपनी तरफ से प्रस्ताव लेकर आया है कि म्यान्मार सीमा की निगेहवानी का काम भी उसे ही दे दिया जाय। चीन से लगी सीमा की निगेहबानी गृह मंत्रालय पहलंे ही इंडो तिबत बोर्डर पुलिस की मदद से कर रहा है, वह म्यान्मार की सीमा की निगेहबानी बीएसएफ की सहायता से करना चाहता है।

म्यान्मार के साथ भारत की सीमा 1643 किलोमीटर है। गृह मंत्रालय का कहना है कि सेना के अधीन काम कर रहा असम रायफलस सही ढंग से काम नहीं कर पा रहा है, यही कारण है कि उस इलाके में उग्रवादी गतिविधियों को लगाम नहीं लगाया जा रहा है। उसका कहना है कि असम रायफलस उग्रवादियों के सीमा से आने जाने पर रोक नहीं लगा सका है।

गृह मंत्रालय का कहना है कि असम रायफलस के ज्यादातर पोस्ट सीमा के बहुत भीतर अंदरूनी इलाके में हैं। रक्षा मंत्रालय से उसने आग्रह किया था कि असम रायफलस के जवानों की तैनाती ज्यादा से ज्यादा सीमा के पास की जानी चाहिए, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने उसके प्रस्ताव को नहीं माना। सेना कहना है कि असम रायफल्स के पास इतने संसाधन नहीं है कि वह सीमा पर भी पर्याप्त संख्या में असम रायफल्स के जवानों को तैनात कर सके। जब उसने ज्यादा संसाधन की मांग की थी, तो गृहमंत्रालय ने उसकी अनुमति उसे नहीं मिलने दी। (संवाद)