यह पैनल कांग्रेस कार्यसमिति से ऊपर बना दिया गया है। वैसे कांग्रेस के संविधान में कांग्रेस कार्य समिति सबसे ताकतवर समिति है, लेकिन अपनी अनुपस्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी जगह काम करने के लिए सुश्री गांधी ने 4 सदस्यों वाला यह पैनल बना दिया है, जिसमें राहुल गांधी को जगह दे दी गई है।
यह पैनल एक तरह से इस बात की घोषणा है कि राहुल गांधी जल्द ही पार्टी के अंदर ज्यादा जिम्मेदारियां उठाने जा रहे हैं। पहले ही उन्हें कहा जा रहा है कि 2014 के चुनाव के बाद वे कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री के दावेदार होगे। इस पैनल के निर्माण के द्वारा उन्हें औपचारिक रूप से कांग्रेस का भावी सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया गया है।
चार सदस्यों वाले इस पैनल में राहुल गांधी का आयु सबसे कम है। वे अभी कुछ दिन पहले ही 41 साल के हुए हैं। उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें पैनल में सबसे ऊपर नहीं रखा गया है। पैनल में सबसे पहला नाम ए के एंटोनी का है, जो उम्र और तजुर्बे में राहुल से बहुत ही बड़े हैं। लेकिन उनके नाम के बाद ही राहुल का नाम पैनल में रखा गया है, जबकि अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी भी राहुल से उम्र में बड़े हैं। पैनल में नाम जहां भी हो, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि राहुल गांधी को सोनिया गांधी ने अपनी अनुपस्थिति में पार्टी को संभालने का जिम्मा घोषित रूप से दे दिया है। इसके बाद राहुल गांधी की पार्टी के अंदर और भी पूछ बढ़ जाएगी और निर्णयों पर उनका प्रभाव पड़ जाएगा।
सोनिया गांधी स्वास्थ्य कारणों से देश में अनुपस्थित है और यदि वह देश में आ भी गई, तो कुछ और समय के लिए पार्टी के लिए समय नहीं दे पाएंगी। इस बीच यह पैनल उनकी जगह काम करेगा। सवाल उठता है कि क्या यह पैनल स्थाई रूप से काम करेगा अथवा सोनिया गांधी के स्वास्थ्य लाभ के बाद यह भंग कर दिया जाएगा? ज्यादा उम्मीद तो यही है कि यह बाद में भंग कर दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद राहुल गांधी पार्टी के अंदर अपनी भूमिका को और भी बढ़ा हुआ देखेंगे।
कांग्रेस में राहुल की बढ़ी भूमिका के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनकी विचारधारा क्या है? अब तक तो लोग यह मान रहे हैं कि श्री गांधी केन्द्र से थोड़ा बाम की ओर झुकाव रखते हैं। उनके इस झुकाव को देखकर ही दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश जैसे उनके अनुयायी वाम रुझान की अभिव्यक्ति देते रहते हैं। लेकिन राहुल के इस झुकाव के बारे में कोई दावे से कुछ भी नहीं कह सकता। इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भारत अमेरिकी परमाणु करार पर जब सोनिया गांधी भी नर्म पड़ रही थीं, तो राहुल ने उस समय प्रधानमंत्री का जमकर पक्ष लिया था और करार पर काम आगे बढ़ पाया था।
अगर कोई यह महसूस करता भी हो कि वामपंक राहुल का वैचारिक झुकाव नहीं, बल्कि गरीबों के प्रति अपनी लोकप्रियतावादी चिंता दिखाने का उनका दिखावा मात्र है, तब भी यह कहा जा सकता है कि वे न तो दृढ़ मार्क्सवादी हैं और न ही द्ढ़ बाजारवादी। आदिवासियों और किसानों के प्रति दिखाया गई उनकी चिंता को उनकी विचारधारा से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
यदि नया पैनल काम करना शुरू करता है, तो राहुल गांधी की विचारधारा को लेकर पैदा हो रहा भ्रम समाप्त या कम हो सकता है। अभी तक तो यही माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्ववाली सरकार वामपंथी रुझान रखती है, जबकि मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली सरकार का रुझान दक्षिणपंथी है। यह भी माना जा रहा है कि कांग्रेस अब बाजारवादी नीतियों से ऊबने लगी है। यदि कांग्रेस को पूरी आजादी मिले तो वह 1970 के दशक के दौर में फिर से देश की अर्थव्यवस्था को वापस ले जा सकती है।
यदि कांग्रेस का यह पैनल काम करना शुरू कर दे और सरकारी नीतियों से संबंधित अपनी राय जाहिर करनी शुरू कर दे, तो विचारधारा को लेकर जो भ्रम बना हुआ है, वह बहुत कम होगा। सच तो यह है कि आज कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा की विचारधारा भी डगमगाने लगी है। वह एक तरफ तो अपनी सांप्रदायिक राजनीति से अलग नहीं हो रही है और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ परमाणु करार और कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ वामपंथी दलों के साथ खड़ी दिखाई देती है। (संवाद)
राहुल गांधी अब एक बड़ी भूमिका में
उनकी विचाराधारा को लेकर अभी भी है भ्रम
अमूल्य गांगुली - 2011-08-10 12:21
राष्ट्रीय सलाहकार समिति का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद आज इसका अस्तित्व है और सोनिया गांधी इस समिति की अध्यक्ष हैं। इसी तर्ज पर सुश्री गांधी ने कांग्रेस के अंदर एक 4 सदस्यों का पैनल बना दिया हे, जिसका कांग्रेस के संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। इस पैनल में उनके पुत्र राहुल गांधी के अतिरिक्त ए के एंटोनी, अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी शामिल हैं।