मोर्चेबंदी के लिए हुई बैठक के मुख्य आकर्षण बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। उन्होंने बैठक में स्पष्ट कर दिया कि इस समय किसी प्रकार का मोर्चा बनना संभव नहीं है और करने का उनका इरादा भी नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मोर्चे का गठन किए बिना ही आज जरूरत साम्प्रदायिकता, आतंकवाद और फासीवाद के खिलाफ मिलकर संघर्ष करने की है।
राजनैतिक विश्लेषक तीसरे मोर्चे के इस विचार का मजाक उड़ा रहे हैं। यह विचार बिना किसी इंजीनियर और आर्किटेक्ट के एक बहुमंजिली इमारत बनाने जैसा है। यह एक ऐसा मकान बनाने का प्रयास है, जिसमें काई भी नेता उसका स्तंभ बनने को तैयार नहीं है, बल्कि सबसे ऊपर वाली छत पर बैठने को उतावला है। क्या कोई सोच सकता है कि जयललिता किसी पिछली सीट पर बैठ सकती है? क्या वह नीतीश कुमार अथवा नवीन पटनायक के हाथ में मोर्चे का हैंडिल देने को तैयार होंगी? वह तो यहां तक कह चुकी हैं कि नरेन्द्र मोदी उनकी निजी दोस्त हैं।
उस बैठक में तेलुगू देशम को भी आतंत्रित किया गया था, लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। उसी तरह तृणमूल कांग्रेस ओर बहुजन समाज पार्टी का भी कोई प्रतिनिधित्व वहां नहीं था। ममता बनर्जी वामपंथी दलों के साथ मंच साझा नहीं कर सकतीं और उसी तरह मायावती कभी भी मुलायम के साथ नहीं बैठ सकतीं। उस बैठक में छोटी छोटी पार्टियों ने शिरकत की।
वामपंथी दल और समाजवादी पार्टी के नेताओं को यह उम्मीद नहीं के बराबर है कि चुनाव के पहले भी तीसरे मोर्चे का गठन किया जा सकता है। लेकिन उसके बावजूद भी कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर संभावनाओं को जिंदा बनाए रखा जा सकता है।
सीपीएम के नेता प्रकाश करात को भी नहीं लगता कि किसी तीसरे मोर्चे का गठन संभव है। उन्होंने कहा कि 30 अक्टूबर को संपन्न सांप्रदायिकता विरोधी बैठक किसी तीसरे मोर्चे के गठन के लिए नहीं था। उन्होंने कहा कि उसका एकमात्र उद्देश्य गैर कांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष दलों को एकत्र करना था, ताकि हम मिलजुलकर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ अपना मत व्यक्त कर सकें। उन्होंने कहा कि यह बैठक इसलिए प्रासंगिक थी, क्योंकि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया है और हमें उस निर्णय का विरोध करना था।
कहने का मतलब कि तीसरे मोर्चे के गठन की सभावना नही है और यदि ऐसा किया भी गया, तो उसका कोई भविष्य नहीं होगा। सभी चुनाव तीेसरे मोर्चे की चर्चा के साथ शुरू होता है और उसके साथ ही समाप्त भी हो जाता है, लेकिन इस बार तो शुरूआत में ही इसकी संभावना की मौत हो चुकी है।
वामपंथी दल गठबंधन बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। वे परस्पर विरोधी दलों और नेताओं को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन कोई भी पार्टी चुनाव के पहले किसी दूसरे का हाथ पकड़ने को तैयार नहीं हैं। कोई सीटों के गठबंधन करने को तैयार नही हैं। अपने अपने मजबूत गढ़ो की रक्षा करने मे सभी नेता इस कदर लगे हुए हैं कि वे उसमें दूसरे किसी दल को प्रवेश करते नहीं देखना चाहते।
सांप्रदायिकता विरोधी मंच सांप्रदायिक हिंसा की हाल में हुई घटनाओं के बावजूद लोकसभा चुनाव के पहले चुनावी तालमेल को तैयार नहीं है। आखिर 1996 में हुए तीसरे मोर्चे के परीक्षण मे क्या खामिया थीं कि आज उस तरह के मोर्चे की कोई संभावना दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है?
सच तो यह है कि तीसरा मोर्चा एक मिथ है, जो कभी वास्तविकता बना ही नहीं। सच कहा जाय, तो यह दूसरा मोर्चा हुआ करता था, जो कभी भाजपा विरोध में कांग्रेस के साथ मिलकर बनाया जाता था और कभी कांग्रेस विरोध में भाजपा के साथ मिलकर बनाया जाता था। आज यदि भाजपा को रोकना है तो फिर इन दलों को कांग्रेस के साथ मिलकर मोर्चा बनाना होगा। (संवाद)
चल नहीं सकती तीसरे मोर्चे की राजनीति
कांग्रेस के बिना धर्मनिरपेक्ष गठबंधन संभव ही नहीं है
हरिहर स्वरूप - 2013-11-05 11:38
क्या कांग्रेस के बिना कोई धर्मनिरपेक्ष गठबंधन हो भी सकता है? हरगिज नहीं। उसी तरह कांग्रेस विरोधी ताकतों का बिना भाजपा को साथ लिया एक होना कोई मायने नहीं रखता। यही कारण है कि पिछले दिनों साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ने के लिए गैर कांग्रेस गैर भाजपा दलों द्वारा मोर्चाबंदी करने की कोशिश एक व्यर्थ की कसरत थी।