अब चूंकि लगभग सभी मतदान पूर्व सर्वेक्षणों में हिंदी के 4 प्रदेशों में हो रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति पतली दिखाई पड़ रही है। इसके कारण कांग्रेस द्वारा किए जा रहे विरोध को राजनैतिक चश्मे से देखा जा रहा है और आरोप लगाया जा रहा है कि कांग्रेस इस प्रकार के सर्वे से डर गई है और इसके कारण ही वह इस पर रोक लगाने की मांग कर रही है। इस आरोप में सच्चाई भी हो सकती है, क्योंिक वास्तव में ये सर्वेक्षण और उनके नतीजे कांग्रेस के कार्यकत्र्ताओं के हौसले पस्त कर रहे होंगे।
दरअसल मतदान पूर्व सर्वेक्षणों के नतीजों के प्रकाशन और प्रसारण के इस मसले को निर्वाचन आयोग ने उठाया है। निर्वाचन आयोग पिछले 15 सालों से कोशिश कर रहा है कि इस तरह के सर्वेक्षणों को रोका जाय, क्योंकि इनके कारण मतदाता प्रभावित होते हैं और चुनाव भी प्रभावित होता है। कहने का मतलब कि मतदान पूर्व सर्वेक्षणों के कारण निर्वाचन आयोग स्वच्छ चुनाव करवाने के अपने दायित्व का पूरी तरह पालन नहीं कर पाता। सबसे पहले 1998 में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एम एस गिल ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे निर्वाचन आयोग के अधिकार के बाहर का मामला बताया। एक्जिट पोल नतीजों के प्रकाशन प्रसारण को मतदान के अंतिम दौर तक रोके रखने में तो निर्वाचन आयोग सफल हो गया, लेकिन उस दौरान होने वाले मतदान पूर्व सर्वेक्षणों पर वह रोक नहीं लगा सका, क्योंकि उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया कि ऐसा करने में सक्षम नहीं है।
जाहिर है कि संसद द्वारा कानून बनाकर ही इस तरह के सर्वेक्षणों को रोका जा सकता है, लेकिन राजनैतिक पार्टियों ने इस मसले को लटकाए रखा और अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस मसले पर अधिकतर पार्टियां क्या चाहती हैं? निर्वाचन आयोग ने इस पर पार्टियों की राय मांगी और कांग्रेस ने इस बार राय दी है किइस पर रोक लगाई जानी चाहिएए लेकिन मुख्य विपक्षी भाजपा के नेता कांग्रेस की राय का विरोध कर रहे हैं। और इस विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि चूंकि कांग्रेस इन सर्वेक्षणों के नतीजों के अुनसार हिंदी के चारों प्रदेशों में हारती दिखाई दे रही है, इसलिए वह इसका विरोध कर रही है।
इसके कारण इससे संबंधित मूल समस्या पर विचार ही नहीं हो पा रहा है। मूल प्रश्न यह है कि क्या ये सर्वेक्षण चुनाव नतीजों को गलत तरीके से प्रभावित करते हैं? यदि गलत तरीके से प्रभावित करते हैं, तो इस पर रोक लगाने का तर्क बनता है। सवाल उठता है कि यह किसी तरह से चुनाव को प्रभावित करते हैं। तो इसके बारे में यह कहा जाता है कि मतदाताओं का एक वर्ग अंतिम समय तक यह परखने की कोशिश करता है कि जीत किसकी हो रही है और वह जीतने वाले के साथ चले जाते हैं। इस तरह से यह उनके लिए वरदान हो जाता है, जिनके बारे में अधिकांश सर्वे जीत की भविष्यवाणी करते हैं।
ये सर्वे अनेक बार गलत साबित हो चुके है। सच कहा जाय, तो पिछले 23 सालों में कराए गए अधिकांश सर्वे गलत ही साबित हुए हैं। इसके बावजूद भी इसका असर मतदाताओं पर पड़े बिना नहीं रह सकता, क्योंकि हो सकता है इन सर्वेक्षणों की अनुपस्थिति में नजीजे कुछ और भी हो सकते थे। उदाहरण के लिए 2004 के लोकसभा चुनाव में लगभग सभी सर्वे के नतीजों के अनुसार एनडीए की सरकार बन रही थी। पर एनडीए पराजित हुई और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी। अब कहा जा सकता है कि यदि सर्वे के नतीजे गलत साबित हो रहे हैं, तो फिर यह मतदान को कैसे प्रभावित कर रहे? तो सीधा जवाब यही है कि इन सर्वेक्षणों के अभाव में शायद एनडीए की स्थिति और भी खराब रहती। उस समय एनडीए सरकार द्वारा इंडिया शाइनिंग का अभियान चल रहा था और मीडिया को सरकार की ओर से बहुत पैसे विज्ञापन के रुप में मिल रहे थे। सर्वे के नतीजे दिखाने वाले लोगों पर आरोप लगा कि यह एक प्रकार का पेड न्यूज था, जिसके लिए उन्हें पैसे मिले। इस तरह के आरोप निश्चय ही बहुत ही गंभीर हैं, हालांकि इसकी सच्चाई का पता लगाना लगभग असंभव है।
इसका विरोध करते हुए कहा जा रहा है कि यह मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला है। पर सवाल उठता है कि वाकई यह मीडिया की आजादी पर हमला है? मीडिया की आजादी का मतलब मीडिया संस्थानों में काम कर रहे पत्रकारों की आजादी से है। प्रश्न यह है कि क्या इस तरह के सर्वेक्षणों से क्या पत्रकारो का कुछ लेना देना भी है या नहीं? तो इसका जवाब यह है कि इन सर्वेक्षणों को न तो पत्रकारों से कुछ भी लेना देना है और न ही पत्रकारिता से। सर्वे पत्रकार नहीं करते, बल्कि मार्केटिंग रिसर्च कंपनियां करती हैं। नतीजे भी वही निकालती हैं और पत्रकारों का काम सिर्फ उसे प्रकाशित और प्रसारित करना भर रह जाता है। जाहिर है ये सर्वे पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है। इसलिए इसका बचाव पत्रकारिता का हवाला देकर करना गलत है।
सच कहा जाय, तो ये सर्वे पत्रकारिता पर ही हमला है। पिछले दो दशकों के दौरान पत्रकारों के सामने एक समस्या खड़ी हुई है तो यह मार्केट रिसर्च कंपनियों द्वारा किया गया यह सर्वे भी एक है। इसके कारण पत्रकारों पर बहुत दबाव पड़ता है और मार्केट कंपनियों द्वारा निकाले गए नतीजों के मकड़जाल से उनका निकलना मुश्किल हो जाता है। इसके कारण उसकी पत्रकारिता प्रभावित होती है और वह निष्पक्ष पत्रकारिता करने में कठिनाई महसूस करता है। इसलिए निष्पक्ष और स्वच्छ चुनाव के लिए ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए भी इस तरह के सर्वेक्षणों पर रोक लगाई जानी चाहिए।
पर इस पर कोई कानून बनाने का यह समय गलत है। जब चुनाव प्रक्रिया जारी हो और आने वाले कुछ महीनों के भीतर लोकसभा के चुनाव भी होने वाले हों, वैसे गर्म माहौल में इस विषय पर स्वस्थ और सकारात्मक चर्चा नहीं हो सकती। इसके लिए सही समय वह है, जब राजनीति पर चुनावी माहौल हावी न रहे और इसके सभी पहलुओं पर शांत दिमाग से चर्चा हो सके। (संवाद)
क्या मतदान पूर्व चुनावी सर्वे पर रोक उचित होगा
पर यह मामला गलत समय पर उठाया जा रहा है
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-11-06 11:07
चुनावों के दौरान होने वाले मतदान पूर्व सर्वेक्षण एक बार फिर बहस का विषय बन गया है। पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से इस पर चर्चा होती रही है और इस पर रोक लगाने की मांग भी होती रही है। इस मांग का प्रबल विरोध भी होता रहा है, पर इस बहस को समाप्त करने की कभी कोशिश नहीं की गई। इस पर न तो रोक लगाई गई और न ही इस पर रोक लगाने की मांग को अंतिम रूप से हमारे शासको द्वारा मना कर दिया गया। एक बार फिर इसकी मांग हो रही है और सत्तारूढ़ कांग्रेस इस बार इस पर रोक लगाने की पैरवी कर रही है।