नीतीश और उनके दल के आधिकारिक और अनाधिकारिक प्रवक्ताओं ने मोदी के खिलाफ बोल बोलकर उन्हें काफी लोकप्रिय बना रखा था। हमारे देश की राजनीति में जातिवाद के बाद यदि कोई सबसे ज्यादा प्रभावी वाद है, तो वह है नकारात्मकमतावाद और इसी के कारण नरेन्द्र मोदी बिहार के हीरो बन बैठे। बिहार के लोगों में लालू के खिलाफ नकारात्कता के साथ साथ नीतीश के खिलाफ भी नकारात्मकता पैदा हो रही थी। जो सत्ता में होता है, उसके खिलाफ ऐसा होना स्वाभाविक है। लालू के खिलाफ पैदा नकारात्कमता का लाभ नीतीश ने उठाया और उसके कारण ही वे आज बिहार के मुख्यमंत्री हैं। नीतीश के खिलाफ उपज रही नकारात्मकता का फायदा लालू को हो सकता था, लेकिन लालू के खिलाफ नकारात्मकता पहले से ही बहुत ज्यादा मौजूद थी। वैसी परिस्थिमि में नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोल बोलकर उन्हें इस योग्य बना दिया कि बिहार में लालू और नीतीश के खिलाफ पैदा नकारात्मकता का फायदा वे उठा लें। और वैसा ही हुआ।
नरेन्द्र मोदी बिहार के हीरो नहीं थे, लेकिन जब नीतीश कुमार ने उन्हें ’अछूत’ करार देते हुए 2010 के जून महीने में आयोजित भाजपा की पटना कार्यकारिणी की बैठकों के बीच दिए गए भोज में आने से मना कर दिया, तो उन लोगों की सहानुभूति नरेन्द्र मोदी के साथ होने लगी, जो नीतीश के विरोधी थे। सबसे पहले भाजपा के अंदर के नीतीश विरोधी नरेन्द्र मोदी के समर्थन में आ खड़े हुए। नरेन्द्र मोदी के कारण नीतीश ने ऐसा आपा खोया कि भाजपा के नेताओं को दी गई भोज पार्टी को ही कैंसिल कर दिया। इससे उनकी और भद्द पिटी, क्योंकि न्यौता देकर किसी को अपने घर आने से मना कर देना गलत माना जाता है। बात वहीं तक सीमित रह जाती, तो कोई बात नहीं थी। उन्होंने विनाशकारी बाड़ के समय गुजरात सरकार द्वारा दी गई बिहार को सहायता राशि को भी वापस कर दिया। इसका राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश की छवि पर खराब असर हुआ। किसी राज्य में आई प्राकृतिक विपदा में यदि कोई अन्य राज्य सरकार सहायता करे, तो उसे किसी व्यकित विशेष द्वारा दी गई सहायता नहीं मानी जाती है। वह एक प्रदेश के लोगों द्वारा दूसरे प्रदेश के लोगों द्वारा दिखाई गई सदाशयता ही माना जाता है। प्राकृतिक विपदा कहीं भी आ सकती है और दूसरे इलाके के लोग यदि उसमें आपदा से ग्रस्त लोगों की सहायता के लिए आगे बढ़ते हैं, तो उसे मना करना भी असभ्य समाज की निशानी होती है।
बहरहाल, अपना आपा खोते हुए नीतीश ने गुजरात सरकार को वह पैसा वापस कर दिया और कहा कि उस पैसे का उस समय तक इस्तेमाल नहीं किया गया था। बाड़ आई थी 2008 में और रुपया वापस किया गया 2010 में। जाहिर है, उस समय तक उस राशि का इस्तेमाल नहीं किया गया था। उसके कारण नीतीश सरकार की और भद्द पिटी और कहा गया कि विपत्ती से ग्रस्त लोगों को राहत दिलाने के लिए मिले पैसे का इस्तेमाल भी राज्य सरकार नहीं कर सकी, जबकि बाढ़ पीडि़तों को उस सहायता की भारी जरूरत थी।
सहयोग राशि लौटाने के बाद तो नीतीश और उनके लोगांे ने नरेन्द्र मोदी को इस कदर अपना निशाना बनाना जारी रखा कि मोदी लगातार बिहार में लोकप्रियता हासिल करते रहे। बिहार के लोग उन्हें इसलिए पसंद नहीं कर रहे थे कि उन्होंने गुजरात का विकास कर दिया था, बल्कि वे नीतीश की आंखों मे किरकिरी थे और लालू की आंखों को भी नहीं सुहाते थे, इसलिए जो लोग नीतीश के खिलाफ हो रहे थे और लालू के समर्थक भी नहीं हो सकते थे, नरेन्द्र मोदी को ही अपना नेता मानने लगे। इस तरह नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को बिहार में अपना और लालू का विकल्प बना दिया। भारतीय जनता पाटी्र ने सुशील कुमार मोदी को नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया था। उसे उम्मीद थी कि जब कभी नीतीश से उसका गठबंधन टूटेगा, सुशील कुमार मोदी को उनके विकल्प के रूप में खड़ा किया जाएगा, लेकिन नीतीश के खिलाफ बिहार के नहीं, बल्कि गुजरात के मोदी आ खड़े हुए हैं।
गुजरात के मोदी के खिलाफ नीतीश जितना मुह खोलते हैं, वे अपने आपको उतनी ही फजीहत में डाल देते हैं। हुंकार रैली के बाद उन्होंने कहा कि गांधी मैदान मे भाषण के दौरान उन्हें पसीने आ रहे थे और उन्हें बार बार पानी पीना पड़ रहा था। इस तरह मोदी का मजाक उड़ाना शायद ही कोई पसंद करेगा, क्योंकि हुकार रैली के दौरान बमों के धमाके हो रहे थे। मोदी के भाषण के पहले ही गांधी मैदान में अनेक धमाके हो चुके थे और पटना जंक्शन से गिरफ्तार एक आतंकवादी ने पुलिस को बता दिया था कि रैली मे फोड़ने के लिए कुल 18 बम लाए गए थे। उसकी जानकारी बिहार पुलिस ने नरेन्द्र मोदी को जरूर दी होगी। रैली रद्द करने की सलाह भी दी गई थी। गांधी मैदान में बम होने का हवाला देकर रैली रद्द करने से मैदान में भगदड़ मचती और हजारों लोग मारे जा सकते थे। इसलिए उसे रद्द नहीं किया जा सकता था, क्योंकि वहां लाखों लोग तो पहंुचे हुए थे। सब मोदी का इंतजार कर रहे थे, इसलिए उनको वहां जाना ही था और भाषण करना ही था।
अब यदि ऐसे माहौल में किसी को पसीना आता हो, तो यह तो स्वाभाविक ही है। लेकिन नीतीश कुमार ने उस पसीने का भी मजाक उड़ाया। बिहार के मुख्यमंत्री होने के नाते हो रहे बम धमाकों और के कारण पसीना तो खुद नीतीश कुमार को भी आना चाहिए था, क्योंकि पुलिस ने उन्हें भी बता दिया होगा कि जिस गांधी मैदान में लाखों लोग मोदी का भाषण सुनने के लिए इकट्ठे हैं, उनमें बम रखे हुए हैं। लेकिन इतने बड़े खतरे के बावजूद नीतीश कुमार मोदी का भाषण सुन रहे थे और उनका पसीना उन्हें दिखाई दे रहा था।
सवाल उठता है कि मोदी को लेकर आखिर नीतीश इतना ज्यादा उत्तेजित क्यों हो जाते हैं कि उन्हें अपना आपा खोना पड़ता है? अपना आपा खोते हुए उन्होंने मोदी को कचरा और बाहरी तक कह दिया। जो व्यक्ति खुद प्रधानमंत्री बनने का सपना देखता हो, वह दुसरे प्रदेश के व्यक्ति को बाहरी कैसे कह सकता है? यह भाषा तो राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की है, जिसका नीतीश खुद विरोध करते हैं। लेकिन वे गुजरात के एक व्यक्ति को बिहार में बाहरी मानते हैं। तब तो उन्हें मानना पडेगा कि बिहार के लिए महात्मा गांधी भी बाहरी हैं और सरदार बल्लभ भाई पटेल भी। क्या नीतीश उन दोनों को बाहरी कहने की हिम्मत जुटा सकते हैं? (संवाद)
आपा क्यों खोते हैं बिहार के मुख्यमंत्री?
अपने ही बयान में फंसे नीतीश
उपेन्द्र प्रसाद - 2013-11-09 11:24
जब जब नरेन्द्र मोदी का चेहरा सामने होता है, बिहार के मुख्यमंत्री अपना आपा खो देते हैं और कुछ ऐसा कर या कह देते हैं, जिससे उनके भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। 27 अक्टूबर को पटना में हुई नरेन्द्र मोदी की हुंकार रैली की भारी सफलता के बाद नीतीश पर एक बार फिर नरेन्द्र मोदी का बुखार चढ़ा। रैली का बिहार पर असर होना ही था।