कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा मनमोहन सिंह को अपने विचार बदलने के लिए बाध्य करने के पीछे का वही कारण है, जो उनके द्वारा ए राजा को हटाने से रोकने का था। गौरतलब है कि मनमोहन सिंह ने राजा को उस समय तक मंत्री पद पर बने रहने दिया, जबतक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जेल भेजने का इंतजाम नहीं कर दिया था।
उसके पहले प्रधानमंत्री उन्हें अपने मंत्रिमंडल से इसलिए नहीं हटा पा रहे थे, क्योंकि उन्हें और सोनिया गांधी को डर लग रहा था कि कहीं डीएमके उनकी सरकार से समर्थन वापस न ले ले और उनकी सरकार गिर न जाय।
सोनिया गांधी चाहती थीं कि किसी तरह यह सरकार चलती रहे, भले इसके लिए राजा को मंत्री के पद पर बनाए रखा ही न जाय और भले ही इसके कारण प्रधानमंत्री की अपनी प्रतिष्ठा धूमिल होती रहे। लेकिन उसके कारण मनमोहन सिंह और उनकी सरकार का भारी नुकसान हुआ। अनेक घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम पहला घोटाला था, जिसके कारण मनमोहन सिंह की प्रतिष्ठा तार तार हो गई थी। इसके कारण ही तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस गठबंधन की शर्मनाक हार हुई थी।
सोनिया गांधी सत्ता के कारण अभी भी वही पुरानी नीति को अपना रही है, जिसके तहत डीएमके जैसे अपने सहयोगी को खुश रखने का प्रयास किया जाता है। अभी कांग्रेस के सामने खतरा यह नहीं है कि डीएमके असहयोग के कारण उसकी सरकार गिर जाएगी, पर असल बात यह है कि सोनिया गांधी की नजर 2014 लोकसभा चुनाव के बाद के संभावी दृश्य पर है। वह चाहती हैं कि उस चुनाव के बाद ज्यादा से ज्यादा दलों का उसे समर्थन मिले।
इसके कारण ही लालू यादव को बचाने के लिए एक अध्यादेश लाया गया था, जिसके तहत उनकी लोकसभा सदस्यता को बचाने का प्रावधान था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी कर कहा था कि जिस विधायक अथवा सांसद को 2 साल से ज्यादा की सजा मिलती हो, उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएगी। चारा घोटाले के एक मामले का फैसला जल्द ही आने वाला था, जिसमें लालू को सजा होने की पूरी संभावना थी। उसी संभावना को ध्यान में रखकर वह अध्यादेश लाया गया था, लेकिन उसका विरोध होने और राहुल द्वारा भी उसके खिलाफ बोले जाने के कारण उस अध्यादेश को वापस ले लिया गया था।
सच तो यह है कि सोनिया गांधी को लग रहा है कि हो सकता है इस बार कांग्रेस को भाजपा से कम लोकसभा सीटें मिले। वैसी हालत मे उन्हें लालू और करुणानिधि जैसे नेताओं के सहयोग और समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी और वह उन्हें नाराज नहीं करना चाहतीं।
अपनी पार्टी के हित से सोनिया गांधी इतना बंधी हुई है कि वह राजनय की बारीकियों की परवाह नहीं करती। करुणानिधि को खुश करने के लिए वह अपने पड़ोसी देश श्रीलंका को भी नाराज करने से नहीं झिझक रही हैं, जबकि श्रीलंका से रिश्ते खराब होने के कारण भारत को भारी फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। इसके कारण श्रीलंका पाकिस्तान और चीन से ज्यादा नजदीकी प्राप्त कर सकता है, जो भारत के हित के खिलाफ भी जा सकता है।
दरअसल सोनिया की नजर वर्तमान पर है और वह भविष्य को नहीं देखना चाहतीं। खाद्य सुरक्षा कानून बनाते समय भी उन्होंने यही किया था। सरकार के पास पैसे नहीं है कि वह इस कानून को अमल में ला सके। उन्होंने खुद अपने भाषण मे कहा था कि इसके लिए संसाधन किसी तरह जुटा लिए जाएंगे। अर्थशास्त्र का उनका अधूरा ज्ञान उन्हें अपनी नीति तैयार करने में सहायक होता है।
सोनिया गांधी के आदेश के बाद मनमोहन सिंह के पास कोई विकल्प ही नहीं रह गया था। वे वही करते हैं, जो सोनिया गांधी उनसे करने के लिए कहती हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया और कोलंबो में होने वाले राष्ट्रमंडल के शिखर सम्मेलन में गैरहाजिर होने का फैसला कर लिया। (संवाद)
सोनिया एक बार फिर डीएमके के सामने झुकी
चुनाव की चिता पर राजनय की बलि
अमूल्य गांगुली - 2013-11-13 10:36
राष्ट्रमंडल के कोलंबो शिखर सम्मेलन से अलग रहने का मनमोहन सिंह का निर्णय उनका अपना नहीं हो सकता। उन्होंने यह निर्णय सोनिया गांधी के कहने पर ही किया होगा। अन्य अनेक मौके पर भी मनमोहन सिंह ने वही किया है, जो उन्होंने सोनिया गांधी द्वारा करने के लिए कहा गया होगा।