यदि ऐसा हुआ है भी तो देश में एक मजबूत मांग उठी कि सबसे पहले ध्यानचंद को यह सम्मान मिलना चाहिए। लोगों की मांग पर खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद को भारत रत्न देने की सिफारिश कर रखी थी और माना जा रहा था कि पहले ध्यानचंद को ही यह सम्मान मिलेगा और उसके बाद ही सचिन अथवा किसी खिलाड़ी को यह सम्मान मिलेगा। पर केन्द्र सरकार ने सचिन के रिटायर होने के दिन हड़बड़ी दिखाते हुए उन्हें इस सम्मान से नवाजने की घोषणा कर डाली। इस हड़बड़ी की क्या जरूरत थी, इसे तो सही तरीके से वही समझा सकते हैं, जिन्होंने वैसा करने का निर्णय किया, लेकिन ध्यानचंद के प्रशंसकों में इससे भारी निराशा हुई है। वे केन्द्र सरकार के इस निर्णय से आहत महसूस कर रहे हैं।

जिस तरह से सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा की गई, उससे तो यही लगता है कि उनको यह सम्मान देने को बेकरार लोगों को लग रहा था कि यदि इस समय उन्हें भारत रत्न नहीं दिया गया, तो आगे कभी दिया ही नहीं जा सकता है। उनके ऐसा सोचने में सच्चाई हो सकती है, क्योंकि सचिन ने अपने खेल से लोगों के दिल में वैसी जगह नहीं बनाई है, जैसी ध्यानचंद ने बना रखी है। ध्यानचंद इस दुनिया में नहीं हैं। वे हाॅकी में भारत के लिए उस समय खेलते थे, जब भारत आजांद भी नहीं हुआ था। तब भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई अच्छी पहचान भी नहीं थी। वैसे समय में ध्यानचंद ने भारत के लोगों का सिर दुनिया भर में ऊंचा किया। ओलंपिक खेलों में उन्होंने तीन बार भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। उन्होंने विरोधी टीमों पर सर्वाधिक गोल दागने का विश्व कीर्तिमान बनाया। भारत उस समय गुलाम था और उसका अपना राष्ट्रीय झंडा भी नहीं था। उस समय कांग्रेस के तिरंगे को उन्होंने बर्लिन ओलंपियाड के दौरान फहराया था। ब्रिटिश सेना में होते हुए, उसके खिलाफ चल रहे आंदोलन का झंडा फहराने का दमखम ध्यानचंद और उनकी टीम के लोग ही रख सकते थे। अपनी आजादी की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे भारतीयों का मनोबल ध्यानचंद की जीत और उनके राष्ट्रवाद के कारण कितना बढ़ा होगा, इसका हम आज अंदाजा ही लगा सकते हैं।

जाहिर है, ध्यानचंद भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। उन्हें भारत रत्न देने के लिए खेल को पात्रता सूची में शामिल करने की जरूरत भी नहीं थी। संस्कृति और कला से जुड़े लोग तो यह सम्मान पाने के हकदार शुरू से ही रहे हैं। ध्यानचंद तो हमारी सांस्कृतिक पहचान बन गए हैं। इसलिए भारत के एक संस्कृति पुरुष के रूप में भी उनको यह सम्मान दिया जा सकता था।

पर केन्द्र सरकार ने ध्यानचंद का नाम बढ़ाकर सचिन को भारत रत्न दे डाला। इस तरह से उसने निश्चय ही ध्यानचंद का अपमान किया है। इसके कारण उनके प्रशंसक आहत महसूस कर रहे हैं। यह सच है कि ध्यानचंद उस ऊंचाई पर विराजमान हैं, जहां से देखने पर उन्हें यह भारत रत्न भी छोटा लगेगा। ध्यानचंद हमारे देश के लोगो ंके लिए भारत रत्न से ज्यादा प्रतिष्ठा रखते हैं। यदि उन्हें भारत रत्न दिया जाता, तो इससे उस भारत रत्न की ही प्रतिष्ठा बढ़ती। लेकिन नाम बढ़ाकर किसी और को वह सम्मान दे देना निश्चय ही उनका अपमान है। केन्द्र सरकार मे बैठे लोग यदि ध्यानचंद का सम्मान नहीं कर सकते, तो फिर उन्हें उनका अपमान करने का क्या अधिकार है? अच्छा होता कि वे किसी स्तर पर ध्यानचंद का नाम इस सम्मान पाने वालों में कभी शामिल ही नहीं करते।

भारत रत्न मिलने के बाद जो तीव्र प्रतिक्रिया सामने आ रही है, उससे सचिन का गौरव निश्चय ही कम हो रहा है। राज्य सभा के सांसद शिवानंद तिवारी ने खेल से हजारों करोड़ रुपया कमाने वाले सचिन की भारत रत्न पाने की पात्रता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उनका कहना है कि भारत रत्न उसे मिलना ही नहीं चाहिए, जिसने खेल को व्यापार बना रखा है और उससे गाढ़ी कमाई करता है। श्री तिवारी ने तो भारत रत्न सम्मान को ही समाप्त कर देने की मांग कर दी है। वैसा सोचने वाले वे अकेले इंसान नहीं है।

सचित तेंदुलकर का कच्चा चिट्ठा जिस तरह सोशल मीडिया में पेश किया जा रहा है, इससे उनकी छवि और भी खराब हो रही है। उन पर कर वंचना और कर चोरी का आरोप लगाया जा रहा है। कानून तोड़कर पैसा कमाने का आरोप भी उनपर लग रहा है। उनकी एक कार का जिक्र हो रहा है, जिसे उन्होंन कस्टम शुल्क बचाकर आयात किया और फिर किसी दूसरे को बेच दिया। उनके कारनामें की चर्चा इतनी हो रही है और वे सफाई भी दे पाने की स्थिति में नहीं हैं। कहा जा रहा है कि जिस व्यक्ति पर राष्ट्रीय झंडा और राष्ट्रीय गान को अपमानित करने का आरोप लगा हो, उस व्यक्ति को भारत रत्न कैसे कहा जा सकता है?

सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोध उनके विज्ञापन करने के कारण भी हो रहा है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या भारत रत्न बनने के बाद भी क्या सचिन देशी और विदेशी उत्पादों का विज्ञापन करते रहेंगे़? भारत रत्न यदि कंपिनयों का सेल्समैन के रूप में दिखाई देगा, तो देश के लोग कैसे महसूस करेंगे? और फिर कोई कंपनी अपने उत्पाद को भारत रत्न की पसंद कहकर प्रचारित करे और सचिन उस प्रचार के साथ दिखाई दे, तो क्या संदेश जाएगा?

जाहिर है, सचिन को भारत रत्न देकर केन्द्र सरकार ने ऐसे विवाद खड़े कर दिए हैं, जिनके बारे में न तो वह खुद कोई जवाब दे पा रही है और न ही सचिन के पास उसका कोई जवाब है। (संवाद)