पर वह ऐसा नहीं कर रही है और इसका कारण यह है कि पार्टी अथवा सोनिया गांधी ने यह तय कर लिया है कि उनका उम्मीदवार राहुल गांधी होंगे। यदि पार्टी में ऐसे कुछ लोग हैं भी, जो यह मानते हैं कि राहुल अभी भी उस पद के लिए तैयार नहीं हैं और वे प्रधानमंत्री पद के काबिल भी नहीं हैं, तो वे चुपचाप बैठे हुए हैं।
एक परिवार से बंध कर रह जाने वाली पार्टी की यह समस्या है। इसलिए यह कहना बेमानी है कि पार्टी के अंदर वंशवाद नहीं है, क्योंकि परिवार के सदस्य को भी चुनकर आना होता है। मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के पीछे भी वंशवाद को सुरक्षित रखने की योजना थी। श्री सिंह एक आधारहीन और डरपोक किस्त के व्यक्ति हैं। इसलिए ही सोनिया गांधी ने उन्हें चुना, ताकि वे राहुल गांधी के तैयार होने तक सीट को गर्म रख सकें और वैसा करते समय कांग्रेस के वंशवाद पर कोई खतरा भी पैदा नहीं करें।
राहुल को भी पता है कि राजनीति में वंशवाद किस तरह काबिज हो गया है। उन्होंने खुद कहा है कि उनकी अपनी पार्टी सहित अन्य अनेक पार्टियां एक व्यक्ति की मर्जी से ही चलती हैं। समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह यादव की मर्जी से, राष्ट्रीय जनता दल लालू प्रसाद की मर्जी से, बहुजन समाज पार्टी मायावती की मर्जी से, डीएमके करुणानिधि की मर्जी से, एआईएडीएमके जयललिता की मर्जी से, तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी की मर्जी से, बीजू जनता दल नवीन पटनायक की मर्जी से, अकाली दल प्रकाश सिंह बादल की मर्जी से और जनता दल (यू) नीतीश कुमार की मर्जी से चलती है।
भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियां इसकी अपवाद हैं। हालांकि सीपीएम के बारे में कहा जाता है कि उसमें साहब (प्रकाश कारत), बीबी (बृंदा कारत) और गुलाम (रामचन्द्र पिल्लै) का निर्णय चलता है। कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर के आंतरिक मतभेद सामने नहीं आ पाते, जबकि भारतीय जनता पार्टी के अंदर का यह मतभेद सामने आते रहते हैं। पिछले दिनों हमने नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने को लेकर आडवाणी के विरोध को देखा।
कांग्रेस के अंदर भी एक जमाने मे जबर्दस्त सिर फुटव्वल का माहौल हुआ करता था। उस तरह की परिस्थितियां इन्दिरा गांधी ही पैदा किया करती थीं। मतभेद पैदा कर स्थानीय नेताओं को आपस में लड़ाया जाता था, ताकि वे कमजोर बने रहें। लेकिन अब वह स्थिति बदल गई है और किसी स्थानीय नेता से परिवार को कोई खतरा नहीं है, इसलिए सब राज्यों में शांति हैं। अब कांग्रेस के छोटे नेता राहुल की प्रशंसा करने में एक दूसरे को मात देने में लगे रहते हैं।
सामंतवाद कांग्रेस को किस हद तक नुकसान पहुंचा रहा है, इसका पता तो बाद में लगेगा, लेकिन यदि राहुल गांधी वास्तव में कांगेस को फिर से नया रूप देना चाहते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब फिलहाल त्याग देना चाहिए और किसी और व्यक्ति को इस पद पर लाने की खोज करनी चाहिए। यदि उन्होंने अपने आपको प्रधानमंत्री बनाने की दौड़ से बाहर कर लिया, तो वे अपने संगठन का भला करते दिखाई पड़ेंगे। उन्हें पार्टी के नेतृत्व से भी अपने को अलग कर लेना चाहिए।
हालांकि राहुल गांधी का वह निर्णय कांग्रेसजनों को पहले अखरेगा। उन्हें लगेगा कि वे अनाथ हो गए हैं। उनमें आत्मविश्वास की कमी भी दिखाई देगी। वे खुद निर्णय करने में भी अपने आपको असमर्थ पाएंगे, लेकिन धीरे धीरे सब ठीक होने लगेगा।
सवाल यह उठता है कि यदि राहुल ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी से इनकार कर दिया, तो उनकी जगह कौन लेगा? मनमोहन सिंह तो उनकी जगह नहीं ले सकते। इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि उनकी उम्र ज्यादा हो गई है, बल्कि इसका कारण यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में देश और सरकार का नेतृत्व करने की क्षमता ही उनमें नहीं है। वे अर्थशास्त्री हैं, लेकिन देश की आर्थिक समस्याओं को समझने और हल करने में भी वे नकारा साबित हुए हैं।
एक अन्य व्यक्ति जिनके बारे में प्रधानमंत्री पद के लिए सोचा जा सकता है, वे पी चिदंबरम हैं। आर्थिक चुनौतियों के इस दौर में वे सबसे समर्थ व्यक्ति दिखाई पड़ रहे हैं। वे आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं और सोनिया गांधी के कारण अर्थव्यवस्था में जो अफरातफरी का माहौल है, उसे वे ही दूर कर सकते हैं।
ए के एंटोनी का नाम भी लिया जा सकता है। वे भले आदमी हैं और ईमानदार भी हैं, लेकिन उनका ईसाई बैकग्राउंड उनके खिलाफ जाएगा। इसका कारण यह है कि सोनिया गांधी भी ईसाई हैं और कांग्रेस अध्यक्ष पद व प्रधानमंत्री पद दोनों ईसाई के पास रहना शायद देश में पसंद नहीं किया जाएगा।
यह सब कल्पना की बाते हैं। सच्चाई तो यह है कि सोनिया गांधी अपने बेटे राहुल के अलावा किसी को प्रधानमंत्री पद पर पसंद नहीं करने जा रही हैं। लेकिन ऐसा करने में कांग्रेस की लुटिया डूब जाने का ही खतरा पैदा हो गया है। (संवाद)
कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र नहीं
सोनिया का राहुल मोह पार्टी को ले डुबेगा
अमूल्य गांगुली - 2013-11-21 11:03
यदि कांग्रेस एक वंशवादी पार्टी, जो नेहरू गांधी परिवार पर पूरी तरह निर्भर है, नहीं होती, तो वह आगामी चुनाव के लिए अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार तय करने के लिए आंतरिक विचार विमर्श और खोज कर रही होती।