अनेक राजनैतिक पंडितों और विश्लेषकों की फौज खड़ी हो गई है और ये फौज उन दोनों पार्टियों से ताल्लुकात रखती है। कुछ कांग्रेस के साथ हैं, तो कुछ भाजपा के साथ। हां, उनका उन दोनों पार्टियों से संबंध बहुत पारदर्शी नहीं है। ये अपने को थिंक टैंक कहते हैं। इनमें से किसी भी टैंक में एक छोटा से छेद करके देखिए आपको पता चलेगा कि उनके अंदर का पानी कितनी तेजी से निकलता है। वे यह कहते नहीं थकते कि देश की नीतियां राष्ट्रीय पार्टियों के हाथों में ही होनी चाहिए। उनका कहना है कि देश के लोगों के पास दो ही विकल्प हैं। एक विकल्प कांग्रेस है और दूसरा विकल्प भारतीय जनता पार्टी। इन दोनों के बाहर उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है।
टीवी चैनलों पर दिखाई पड़ने वाले इन विचारकों में नीतियों सुझाने वाले, मीडिया वाले, शिक्षाविद्, हथियारों के सौदागर और उनके दलाल शामिल रहते हैं। वे सभी दिल्ली से आपरेट करते हैं। इन सभी वर्गों के लोग अपने अपने स्वार्थ के कारण अपनी अपनी राग अलापते हैं, लेकिन उन सबका मिला जुला कोरस भयावह दृश्य पैदा करता है। उनके विचारो का असर लोगों पर भी पड़ता है। जब चुनाव का समय नजदीक आता है, तो फिर उनकी आवाज तो और भी तेज हो जाती है।
अब इन राष्ट्रीय पार्टियों के गुणगान पर जरा नजर दौड़ाए। उसके साथ साथ भारत की स्थिति के बारे में सोंचें तो पता चलेगा कि तस्वीर कुछ और है। सबसे पहले तो भारतीय राज्य के बारे में सोंचें। भारत एक संघ है, जिसमें केन्द्र सरकार के साथ साथ प्रान्तीय सरकारें भी होती हैं। पर आजादी के बाद के दशकों में केन्द्र लगातार राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है। विभाजन ने इस प्रवृति को बढ़ाया ही है, क्योंकि विभाजन के बाद कांग्रेस ही देश की एकमात्र बड़ी पार्टी रह गई थी और केन्द्र में उसका लंबे समय तक शासन रहा। अनेक राज्यों में भी उसके शासन रहे और इस बीच दिल्ली राज्यांे के ऊपर हावी होती रही।
बाद के दिनों मंे जब कांग्रेस कमजोर हुई, तो देश की एक अन्य पार्टी के साथ मिलकर उसने यह काम जारी रखा। सत्ता का केन्द्रीकरण होता रहा है और इसके कारण संघीय सरकार अब कम लोकतांत्रिक हो गई है। कम लोकतांत्रिक होने के साथ साथ एक और समस्या खड़ी हो गई है। वह यह है कि जो सत्ता में बैठे हुए हैं, उन्हें वहां से हटाना और भी मुश्किल हो गया है। उनके बीच में आपसी सांठगांठ बनी हुई है और वे एक दूसरे को बचाते हैं।
लेकिन इससे यह तथ्य छिप नहीं जाता कि अनेक क्षेत्रीय दल ऐसे हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और वे ऐसा कर भी रहे हैं। नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के गठन पर इन क्षेत्रीय दलों ने केन्द्र सरकार की एक नहीं चलने दी। एक समय था, जब केन्द्र अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे तब संविधान की धारा 356 का इस्तेमाल करता था, लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत के कारण अब केन्द्र के लिए यह संभव नहीं रह गया है कि वह अपनी मर्ज से जब चाहे तब किसी राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकता है।
दो पार्टियों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर हम देश की राजनैतिक वास्तविकता से अपनी आंखे मूंद रहे हैं। सच तो यह है कि पिछले 5 लोकसभा चुनावो मे ंसे तीन में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का कुल मत प्रतिशत 50 फीसदी से भी कम रहा है। 1985 के बाद किसी दल को केन्द्र में बहुमत नहीं निल पाया है। 1989 से ही देश में गठबंधन का दौर चल रहा है। टीवी चैनलों के विचारक चाहे जो कहते रहे, लेकिन क्षेत्रीय दलों से देश को छुटकारा नहीं मिलने वाला है और द्विदलीय व्यवस्था भारत के लिए एक मिथ है। (संवाद)
क्षेत्रीयतावाद से छुटकारा नहीं
दो राष्ट्रीय पार्टियों का विचार एक मिथ है
गर्गा चटर्जी - 2013-11-26 10:21
अगर आप उन लोगों में से एक हैं, जो समझते हैं कि दिल्ली और आसपास के शहरों में स्थित न्यूज चैनल भारतीय उपमहाद्वीप की सही तस्वीर पेश करते हैं, तो आप अपने इस विश्वास पर दुबारा विचार करें। इस तरह के चैनल आपको विश्वास दिला रहे हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच हो रहे हैं। वे नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच चुनावी बाॅक्सिंग दिखाने में व्यस्त हैं। ये दोनों पार्टियां देश की अन्य पार्टियों से इसलिए अलग दिखाई पड़ रही हैं, क्योंकि उन चैनलों की नीतियां और उनके काम करने के तरीके वैसा प्रोजेक्ट करने की कोशिश करते हैं।