शुक्रवार, 3 नवंबर, 2006

औरतों की सुरक्षा की राजनीति

सिर्फ नया कानून से काम नहीं चलेगा

ज्ञान पाठक

घरेलू हिंसा से औरतों की सुरक्षा के लिए भारत में अंततः गत 16 अक्तूबर से एक कानून लागू हो गया है। इसे महिलाओं के मामलों में भारत में चलने वाली राजनीति मेहरबानी ही कहिए, वरना घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा विधेयक 2005 इतनी जल्दी न तो संसद में पारित हो पाता और न ही इतनी जल्दी उसे अधिसूचित कर उसे लागू करने से संबद्ध नियम ही बनाये जाते। वर्षों से महिला विधेयक को रोककर रखने वाले हमारे नेताओं को आखिर दिखाना था कि दे औरतों के लिए कितना काम कर रहे हैं और उनकी समस्याओं के प्रति वे कितने गंभीर हैं।

इससे तो इस सत्य का खुलासा हो जाता है कि औरतों को अबला से सबला बनाने में हमारे नेताओं कि उतनी रुचि नहीं जितनी की उन्हें थोड़ी सी सुविधाएं देकर अपनी ओर आकर्षित करने का है। वास्तव में औरतों को इस समय सबला बनाने के लिए जो जरुरतें हैं उनसे काफी कम उन्हें दिया जा रहा है, और घरेलू हिंसा से रक्षा के मामले में भी यह कानून अपर्याप्त और उलझा हुआ है।

इस बार लाये गये औरतों के लिए कानून में “घरेलू हिंसा” पर ज्यादा जोर है और इसलिए इसकी परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। इसमें सिर्फ पत्नियों या पुरुषों के साथ जीवनसाथी के रुप में रहने वाली अविवाहित औरतों को ही नहीं बल्कि माताओं, बहनों और विधावाओं को भी शामिल किया गया है। इतना ही नहीं, औरतों के साथ होने वाले शारीरिक, यौन, मौखिक, संवेदनात्मक और आर्थिक अपराधों को भी घरेलू हिंसा की परिभाषा में लाया गया है। इतना ही नहीं यदि औरतों को इनमें से किसी भी प्रकार की हिंसा करने की धमकी भी दी जाये तो उसे दंडनीय अपराध माना जायेगा। यदि हमारे घरों में कोई औरत विपरीत परिस्थितियों में फंस गयी तो कानूनी तौर पर उसे सुरक्षा अधिकारी का संरक्षण हासिल करने का हक होगा और वे सलाहकारों या अन्य सेवाएं हासिर करने की हकदार होगी, जिसके लिए भी नियमों की अधिसूचना जारी की जा चुकी है।

यदि सरसरी तौर पर सोचें तो सारे प्रावधान बड़े आकर्षक हैं। लगता है कि सब कुछ इसमें शामिल कर दिया गया है। और संभवतः कानून बनाने वालों की इसी कोशिश के कारण पूरा कानून वास्तविकता में उलझा हुआ है। कहना न होगा कि इस कानून को लागू करने में काफी समस्याएं आयेंगी, तथा अनेक मामलों में स्पष्टता के अभाव का खामियाजा भुक्तभोगियों को उठाना पड़ेगा जबकि हिंसा करने वालों को बचकर निकल जाने की ज्यादा गुंजाइश होगी। यह पढ़ने में भी कानूनी दस्तावेज कम और राजनीतिक ज्यादा लगता है। पहले से भी औरतों की सुरक्षा के अनेक कानून हैं और दोषियों को बचाने के लिए अलग-अलग कानूनों को विकल्प के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस कानून के साथ भी कोई अलग नहीं होने वाला है।

उदाहरण के लिए, घरेलू झगड़ों को दहेज विरोधी कानून के दायरे में भी लाया जा सकता है और घरेलू हिंसा के भी। सवाल सिर्फ नीयत का होगा।

किसी भी कानून की सफलता और प्रभावशालिता इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितना स्पष्ट और उसके दुरुपयोग की संभावना, बचाव और आरोपी, दोनों पक्षों द्वारा कितनी है। इस कानून के प्रवाधान इस मामले में काफी कमजोर हैं। भुक्तभोगियों कि तुलना में बदमाश औरतों या बचाव पक्ष को ही इसकी त्रुटियों का लाभ मिलेगा। किसी भी मामले में सर्वांगीण विचार कर लेने के पहले ही कानून लाने का यही फल होता है।

संवेदनाओं को आहत करना और मानसिक कष्ट देना भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में है। लेकिन सवाल है कि कौन यह निर्णय करेगा कि किसे कितने हिंसा का शिकार होना पड़ा है ! अभी तो ऐसा कोई उपाय मानव सभ्यता को हासिल नहीं हुआ है जिससे संवेदनात्मक क्षति के स्तर को सही-सही आंका जा सके। फिर यदि क्षति के स्तर को आंकना संभव नहीं होगा तो दंड कितना हो इसका निर्णय कैसे होगा! एक मां, पत्नी, बिना विवाह के साथ रहने वाली औरत, बहनें और विधवाएं सभी दावा कर सकती हैं कि वे मानसिक और संवेदना के स्तर पर आहत हैं। स्वाभाविक रुप से इस कानून को लागू करना मुश्किल हो जायेगा। कई बार तो परिवारों में चल रहे शीत-युद्ध प्रत्यक्ष हिंसा से ज्यादा हिंसात्मक साबित होते हैं। उन मामलों में भी कानून का दखल हो सकेगा, गुणवत्ता चाहे जो भी हो।

भारत में विधवाओं की समस्या को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया है। मर्द अपनी उम्र से काफी कम उम्र की औरतों से शादी रचाने की फिराक में रहते हैं और ऐसी परंपरा भी है। यही कारण है कि 90 प्रतिशत औरतों को अपने जीवनकाल में पांच से 15 या उससे भी अधिक वर्षों तक विधवा बनकर जीने का दुख झेलना पड़ता है। सवाल उठता है कि मर्दों के इस स्वार्थीपन से क्या औरतों को मानसिक दुख नहीं होता है ? वास्तव में यही तो वैधव्य का बज्रपात है। समस्या का समाधान पुरुष और स्त्री की आयु में अंतर को कम करने में है। लेकिन इसे व्यक्तिगत मामला समझा जाता है। फिर भी यह एक अच्छी पहल है कि विधवाओं को भी संरक्षण कानून में शामिल किया गया है।

कानून की सबसे अच्छी बात यह है कि औरतों के आवास के अधिकार को इसके तहत स्वीकार किया गया है, चाहे किसी भी सम्पत्ति का स्वामित्व उसके नाम हो या नहीं। इसलिए उम्मीद की जाये कि सभी औरतों को कम से कम एक छत देने की व्यवस्था यह समाज और कानून करेगा। #