शुक्रवार, 20 अप्रैल 2007

एशिया प्रशांत के देशों पर मंडराते खतरे

2007 में धीमी हो जायेगी विकास दर

ज्ञान पाठक

नई दिल्ली: एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देश अनिश्चितता के दौर में फंसे हैं। संयुक्त राष्ट्र के इस क्षेत्र के लिए गठित आर्थिक और सामाजिक आयोग ने अपनी ताजा रपट में कहा है कि जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। वर्ष 2007 के लिए उसने भविष्यवाणी की है कि 2006 की तुलना में इस क्षेत्र की विकास दर धीमी हो जायेगी।

ध्यान रहे कि 2006 में इस क्षेत्र की विकास दर 7.9 प्रति शत थी। लेकिन 2007 के लिए किये गये आकलन में रपट में कहा गया है कि यह घटकर 7.4 प्रति शत हो जायेगी। इसका मुख्य कारण बताया गया कि अन्य क्षेत्रों के देशों की आर्थिक स्थिति में मंदी आने के कारण निर्यात घट जायेगा और यहां के देशों को नुकसान होगा। दुनिया का आर्थिक इंजन समझे जाने वाले अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मंदी के आने की संभावना के कारण ऐसा होना तय माना जा रहा है। दुनिया भर में इलेक्ट्रानिक्स की मांग में काफी कमी आने की संभावना व्यक्त की जा रही है और कहा गया कि इससे एशिया प्रशांत के क्षेत्रों को भारी क्षति होगी। लेकिन खनिज तेल समेत अन्य जिन्सों की कीमतों में कमी होने की संभावना को थोड़ी राहत का कारण बताया गया है।

दुनिया भर में आर्थिक हालात बदतर होने की भविष्यवाणी करते हुए कहा गया कि यदि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों में कोई उम्मीद हो तो वह भारत, चीन और जापान की अर्थव्यवस्थाओं से है जो काफी हद तक इस विपरीत स्थिति में भी मोर्चा थामे रहेंगे।

मुद्रास्फीति कोई खास समस्या नहीं होगी क्योंकि आयोग की रपट के अनुसार यह 2006 के 4.3 प्रति शत से घटकर 3.8 प्रति शत तक हो जायेगी। खनिज तेल की कीमतों में कमी आने से भी कुछ राहत मिलेगी और सख्त मुद्रा नीतियों के अपनाये जाने के कारण भी। मुद्रा विनिमय दरों में तेजी आने की संभावना है, जो मुद्रस्फीति पर रोक बनाये रखेंगी।

एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के चालू खातों में अतिरिक्त धन की चर्चा करते हुए रपट में बताया गया कि 2007 में इसमें थोड़ी कमी आयेगी। बताया गया कि सूचना प्रौद्योगिकी के उपकरणों और इलेक्ट्रानिक्स की विश्वव्यापी और घरेलू मांग में कमी आने से ऐसा हो सकता है।

सबसे खतरनाक स्थिति, रपट के अनुसार, मुद्रा की मूल्यवृद्धि होगी। इसके कारण इस क्षेत्र के देशों में मुद्रा नीति, जो एक लंबे समय से सख्त की जाती रही है, और भी सख्त करनी पड़ सकती है और किसी भी देश के मुद्रा नीति निर्धारकों के लिए एक स्वतंत्र नीति अपनाना और भी मुश्किल हो जायेगा। ज्यादा खुला पूंजीगत खाता वाली पृष्ठभूमि में नीति निर्धारकों के लिए विकल्प सीमित रह जायेंगे। रपट का कहना है कि नीति निर्धारकों को तीन विकल्पों में से सिर्फ दो चुनने के लिए विवश होना पड़ेगा और वे किसी भी तरह से तीनों उपलब्ध विकल्पों का चयन नहीं कर सकेंगे। ये तीन विकल्प होंगे – मौद्रिक स्वायत्तता, मुद्रा विनिमय दर का लक्ष्य बनाना, और पूंजीगत खाते में परिवर्तनीयता।

उसने कहा कि मुद्रा विनिमद दरों में ज्यादा लोच लाना एक समाधान हो सकता है। इससे “एकतरफा बोली” पर कुछ हद तक नियंत्रण हो सकता है क्योंकि तब निवेशकों को आशंका रहेगी कि मुद्रा विनिमय दरें किसी भी तरफ बढ़ सकती हैं। यह अलग बात है कि एकतरफा बोली से निवेशकों को ज्यादा लाभ मिलने के कारण विदेशी मुद्रा का इन देशों में आप्रवाह काफी बढ़ जाता है।

आयोग ने इस पूरे क्षेत्र के लिए सलाह दी है कि विकास में गिरावट की संभावनाओं को हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए।

जहां तक भारत का सवाल है, रपट ने कहा कि यहां आर्थिक विकास मूलत: उद्योग और सेवा क्षेत्र में विकास के कारण हो रहा है। यह अलग बात है कि रपट में नोट किया गया कि कृषि क्षेत्र में विकास दर गिर रही है। इस स्थिति में भारत सरकार द्वारा व्यापक पैमाने पर अवसंरचनात्मक विकास परियोजनाएं चलाने पर ज्यादा जोर देने की प्रशंसा की गयी है ताकि वर्तमान विकास दर कायम रखी जा सके। रपट ने कहा कि भारत में ग्रामीण अवसंरचना एक प्रमुख मुद्दा है। उसने कहा कि भारत में तेजगति आर्थिक विकास निजी क्षेत्र की परिवहन, संचार, वित्तीय सेवा और व्यापारिक गतिविधियों की बढ़ी हुई मांग के कारण हो रहा है। कहा गया कि सरकार द्वारा सार्वजनिक प्रशासन, सामाजिक सेवाओं, ग्रामीण विस्तार सेवाओं और रक्षा में खर्च बढ़ाये जाने के कारण सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ गया है। निवेश की मांग भी बढ़ गयी है और सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी भी।

भारत में बढ़ती कीमतों और मुद्रास्फीति की दर, जो 6 प्रति शत तक हो गयी है, के लिए पेट्रोलियम, चीनी और अन्य खाद्य पदार्थों, रसायन और रासायनिक पदार्थों और सीमेंट की कीमतों में वृद्धि को जिम्मेदार बताया गया।

भारत के लिए बजट घाटे को गंभीर समस्या बताया गया। कहा गया कि लगातार राजकोषीय घाटे के कारण सार्वजनिक कर्ज काफी बढ़ गया है। उम्मीद जतायी गयी कि भारत का कुल कर्ज सकल घरेलू उत्पाद का 64 प्रति शत तक रह सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत के कुल कर्ज का 5 प्रति शत विदेशी कर्ज है।

चालू खाते में भारत के घाटे को सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 प्रति शत बताया गया, इस टिप्पणी के साथ कि भारत इस स्तर को संभाल सकता है।

रपट में भारत सरकार की प्रशंसा इस बात के लिए की गयी कि इसने अवसंरचना क्षेत्र में विकास पर ध्यान दिया है। रपट का कहना है कि ग्रामीण सड़कों और बिजली में सुधार से भारत, चीन और थाइलैंड में गरीबी घटी है। भारत के विशेष संदर्भ में कहा गया कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम में 10 लाख रुपये खर्च करने से गरीबी जितनी घटती है उससे सात गुना ज्यादा फायदा सड़क बनाने से होता है।

सबसिडियों के मामले में सुझाव दिया गया कि सरकारें कमजोर वर्ग के लोगों को सीधे वाऊचर जारी करने की सोच सकती हैं ताकि गरीब वर्ग बिजली आदि के शुल्क अदा करने में उनका उपयोग कर सकें। सबसिडियां कम करने के उपायों के संदर्भ में यह सुझाव दिया गया है।#