विश्व संसद के लिए मुहिम
दुनिया के लिए भी एक लोकतंत्र जरुरी
ज्ञान पाठक
विश्व संसद के लिए इन दिनों एक मुहिम चलायी जा रही है जिसे पांच महादेशों के 70 देशों के लगभग 400 सांसदों का अब तक समर्थन हासिल हो चुका है। इनके अलावा अनेक विख्यात और अल्पज्ञात कलाकार और बुद्धिजीवी शामिल हो गये हैं।
इस मुहिम ने एक बार दुनिया भर के लोगों, विशेषकर चिंतकों को नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। राजनीति की अब तक की एक सर्वोच्च परिकल्पना है लोकतंत्र। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जनता के स्तर पर यह सही अर्थों में दुनिया के किसी भी देश में लागू नहीं हो सका है, हालांकि भारत जैसे चंद देशों में गांवों या वार्डों के स्तर पर इसे लागू किये जाने की कोशिशें की जा रही हैं जबकि गांवों से ऊपर के स्तरों जैसे राज्यों या राष्ट्र के स्तर पर, जहां लोकतंत्र है भी, वहां गांवों या वार्डों के स्तर पर लोकतंत्र के काफी विरोधी हैं। विश्व के स्तर पर अब तक किसी भी तरह का लोकतंत्र नहीं है, और इसलिए मुहिम चलायी जा रही है कि विश्व संसद भी होनी चाहिए ताकि विश्व स्तर पर कोई लोकतंत्र की स्थापना हो जाये और विभिन्न देशों की मनमानी पर कुछ अंकुश लगे।
वर्तमान लोकतंत्र की परिकल्पना है कि जनता स्वयं अपनी शासन व्यवस्था करे। गांवों या वार्डों के स्तर पर, जहां हर वयस्क स्थानीय सभा का सदस्य हो, और वे खुद निर्णय करें कि उनके इलाके में क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं। ऐसा लगभग 100 परिवारों के लिए संभव है। इसी को भारत में पंचायती राज के माध्यम से लागू करने की कोशिशें की जा रही हैं और इसे 12 वर्षों में सीमित सफलता ही मिल पायी है।
इससे ऊपर के स्तर पर लोकतंत्र की जो व्यवस्था है वह यह कि जनता सिर्फ मतदान करे और अपने विकास की जिम्मेदारी अपने प्रतिनिधियों पर छोड़ दे। एक तरह से राज्य और राष्ट्र स्तर के नेता जनता से कहते हैं कि आप हमें सिर्फ वोट दें और आप अपने विकास के निर्णय प्रक्रिया से मुक्त हो जायें। हम नेता तो आपके विकास के लिए सोचने और करने के लिए ही हैं। इस स्तर पर लागू लोकतंत्र की बदहाली से सभी वाकिफ हैं।
लेकिन राष्ट्र के स्तर से ऊपर विश्व स्तर पर किसी भी तरह का निर्वाचित लोकतंत्र नहीं है। विभिन्न राष्ट्र इसके अभाव में अपने-अपने लाभ के लिए मनमानी कर रहे हैं – कोई किसी की बांहें मरोड़ रहा है तो कोई किसी देश पर आक्रमण कर रहा है। इसमें अंतत: आम लोग ही पिस रहे हैं। जिन राष्ट्रों में किसी भी तरह का लोकतंत्र नहीं है वहां के लोग तो पहले से ही बदहाल हैं।
फिर भी समस्या यह है कि सभी देश अपनी सार्वभौमिकता के पक्षधर हैं। कोई देश यह नहीं चाहता कि उनकी सरकार से बड़ी भी कोई सरकार हो। यही कारण है कि विश्व संसद की मुहिम चलाने वालों पर एक लंबे समय से आरोप लगाया जाता रहा है कि वे कुछ देशों के इशारे पर दुनिया में विश्व सरकार की स्थापना करना चाहते हैं।
इन आरोपों के बीच ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि परोक्ष रुप से दुनिया पर कुछ दबंग देश शासन चला रहे हैं। दुनिया भर के देशों पर शासन करने की संस्थाएं बनी हुई हैं और जनता की रजामंदी के बगैर ये संस्थाएं उनपर शासन कर रही हैं। जनता ने उन्हें कभी निर्वाचित नहीं किया।
उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, और विश्व व्यापार संगठन आदि को लिया जा सकता है। ये संस्थाएं दुनिया भर के लोगों की जीवनदशा में हस्तक्षेप कर रहे हैं जिनकी अनुमति जनता ने उन्हें नहीं दी है। ये सभी संस्थाएं विभिन्न देशों के समूहों ने बनायी हैं जिनमें विभिन्न राष्ट्र अपने मनोनीत लोगों को भेजते हैं। ये संस्थाएं अच्छा काम कर रही हैं या बुरा, यह विचार करना इस लेख का विषय नहीं है। यहां तो सिर्फ इतना भर उल्लेख किया जा सकता है कि ये असली लोकतंत्र के प्रतिनिधि संस्थान नहीं हैं।
यही कारण है कि बार-बार मांग की जाती है कि इन विश्व संस्थाओं में सुधार किया जाये। लेकिन इन मांगों को निहित स्वार्थी देश नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि वे इन संस्थाओं में लोकतांत्रिक न्यायपूर्ण सुधार कर देंगे तो वे दुनिया भर के देशों को आखिर अपनी मुट्ठी में कैसे रख पायेंगे !
कुछ चिंतकों का कहना है कि यदि विश्व सरकार या संसद की स्थापना हो गयी तो समस्याएं और बढ़ जायेंगी। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था ही बनी रहनी चाहिए क्योंकि इसी से उनकी सार्वभौमिकता बनी रहेगी। प्रत्येक देश की अस्मिता बची रहनी चाहिए। विश्व सरकार या संसद बनने पर देशों की कोई स्वतंत्रता नहीं रह जायेगी।
लेकिन विश्व संसद के पक्षधरों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में तो विश्वस्तर की संस्थाएं तो हमारे नाम पर हमारी जीवनदशा को प्रभावित कर रही हैं, जबकि जनता किसी भी तरह से उनको प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है। आखिर विश्व संस्थाओं को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाने में बुराई क्या है। उनके अनुसार विश्व संसद की मुहिम इसी दिशा में एक कदम है।
उनका सीधा प्रहार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और आई एम एफ जैसे संस्थानों पर है जिन्हें लोकतंत्र के आधार पर नहीं बल्कि वीटो के विशेषाधिकार पर चंद देश चलाते हैं। इसलिए ऐसी अलोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को समाप्त कर नये सिरे से लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं की जानी चाहिए। विडम्बनापूर्ण स्थितियां तो तब हो जाती हैं जब ये अलोकतांत्रिक संस्थाएं लोकतांत्रिक राष्ट्रों की सरकारों को आदेश देती हैं और दुनिया भर के देशों की विवशता होती है कि इन्हीं को अलोकतांत्रिक संस्थानों के अलोकतांत्रिक निर्णयों को जायज और न्यायपूर्ण मान लिया जाता है।
अनेक अन्य चिंतक विश्व लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने के मार्ग को दुर्गम मानते हुए कहते हैं कि इतने बड़े स्तर पर सीधा मतदान करवाना कठिन होगा। फिर वे यह भी कह रहे हैं कि मतदाताओं की संख्या जितनी बड़ी होगी उतना ही अलोकतांत्रिक होती है उनके द्वारा चुनी गयी संसद। सही अर्थों में लोकतंत्र तो गांवों या वार्डों के स्तर पर ही हो सकता है जहां का हर व्यक्ति शासन प्रक्रिया में भाग ले सकता है।
एक विचार यह भी है कि परोक्ष मतदान के माध्यम से विश्व संसद की स्थापना की जा सकती है। चिंतकों की एक बड़ी संख्या मानती है कि जहां किसी भी तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था न हो वहां त्रुटिपूर्ण व्यवस्था ही सही, लागू की जानी चाहिए। बाद में सुधार होता रहेगा।
विश्व संसद की यह पहल एक महत्वपूर्ण कदम है, हालांकि इसके लिए एक लंबे समय से चिंतक ऐसा सोचते रहे हैं। उम्मीद है कि यह चर्चा आने वाले दिनों में जोर पकड़ेगी। #
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से
विश्व संसद के लिए मुहिम
System Administrator - 2007-10-20 06:09
विश्व संसद के लिए इन दिनों एक मुहिम चलायी जा रही है जिसे पांच महादेशों के 70 देशों के लगभग 400 सांसदों का अब तक समर्थन हासिल हो चुका है। इनके अलावा अनेक विख्यात और अल्पज्ञात कलाकार और बुद्धिजीवी शामिल हो गये हैं।