लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नरेन्द्र मोदी के सामने भ्रष्टाचार की चुनौतियों से निबटने के मौके मिल रहे थे। ललित मोदी का घोटाला जोर पकड़ रहा था। आरोप लग रहा था कि राजस्थान की मुख्यमंत्री ने ललित मोदी को बचाने में योगदान किया। सुषमा स्वराज द्वारा भी ललित मोदी की सहायता के मामले सामने आए। और सिर्फ आरोप ही नहीं लग रहे थे, बल्कि उसके सबूत भी सामने आ रहे थे। मध्यप्रदेश में व्यापम घोटोले की व्यापकता भी सामने आ रही थी। और छत्तीसगढ़ मे भी जन वितरण प्रणाली में घोटाले के मामले सामने आए थे। ये सारे के सारे घोटाले मोदी की पार्टी के नेताओ से ही जुड़े थे, लेकिन प्रधानमंत्री ने उन घोटालों पर चुप्पी डाल ली। उनकी वह चुप्पी मनमोहन सिंह द्वारा अपने कार्यकाल में लगाई गई चुप्पी से भी ज्यादा अखरने वाली थी। सच कहा जाय, तो मनमोहन सिंह ने कम ही सही, पर कुछ न कुछ कार्रवाई की थी। अनेक मंत्रियों को अपनी सरकार से बाहर कर दिया था। शुरुआत उन्होंने शशि थरूर से की थी और रेल मंत्री तक को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बावजूद मनमोहन सिंह ने लोगो ंका विश्वास खो दिया था।

पर नरेन्द्र मोदी ने तो अपने होंठ ही सिल लिए थे। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं के खिलाफ न तो किसी प्रकार की कार्रवाई की और न ही अपना मुह खोला। उसी का नतीजा था कि चारा घोटाले के कारण जिस लालू यादव को बिहार के लोगों से सत्ता से बाहर कर दिया था, उनकी पार्टी एक बार और सत्ता में आ गई। बिहार चुनाव के बाद तो अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार के वित्तमंत्री के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। अरविंद केजरीवाल ने ही नहीं, बल्कि भाजपा सांसद कीर्ति झाा आजाद ने भी सबूतों के साथ आरोप लगाया कि अरुण जेटली भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों को संरक्षण दे रहे थे। लेकिन श्री जेटली अभी भी मोदी सरकार में बने हुए हैं और आम धारणा है कि मोदी सरकार में प्रधानमंत्री के बाद वे सबसे ज्यादा शक्तिशाली मंत्री हैं।

जाहिर है भ्रष्टाचार मिटाने वाले एक सुपरमैन की छवि मोदी खो चुके थे और इस छवि के साथ वे उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में मतदाताओं का विश्वास हासिल नहीं कर सकते थे। लगता है कि अपनी कमजोर हो रही छवि को फिर मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री ने बड़े नोटों को चलन से बाहर निकालने का फैसला किया, ताकि लोगों को लगे कि वे भले खुदरा के भाव से भ्रष्ट लोगों का इलाज न कर सके हों, पर थोक भाव से उन्होंन इलाज कर दिया। देश की जो जनता भ्रष्टाचार को मिटते देखने के लिए लालायित है, उसे मोदी जी के उस निर्णय से निश्चय ही सकून मिला और देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा उनके इस निर्णय का समर्थक हो गया।

मोदीजी ने उत्तर प्रदेश में अपने विरोधियों के धनबल को कमजोर करने का काम भी इस निर्णय से किया है। मायावती पर उनकी पार्टी के लोग ही टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं। यदि इस आरोप में सच्चाई है, तो मायावती के पास काले धन का बड़ा जखीरा होगा। मोदीजी के उस निर्णय से वह जखीरा रद्दी के ढेर मे तब्दील हो गया होगा। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी पर उसके विरोधी अकूत धन इकट्ठा करने का आरोप लगाते रहे हैं। चुनाव मे उस धन का इस्तेमाल होता है और बहुत बड़ा हिस्सा काला धन ही होता है। जाहिर है, इस निर्णय से मोदी जी ने अपने विरोधी मुलायम सिंह की पार्टी को भी चुनाव के पहले आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया।

सवाल उठता है कि क्या इसके कारण भारतीय जनता पार्टी की जीत आसान हो गई है? इसका सकारात्मक जवाब देना खतरे से खाली नहीं है। इसका कारण यह है कि सरकार के इस फैसले से आम लोगों को काफी परेशानी हो रही है। परेशानी मात्र एक सप्ताह के लिए ही होती, तब भी गनीमत थी, भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए उठाए गए दुख के रूप में इसे लोग स्वीकार कर लेते, लेकिन लगता है कि अभी आने वाले कुछ महीनों तक लोगों का तकलीफें उठानी पड़ सकती हैं और यदि उसी दौर में चुनाव हो गए, तो भारतीय जनता पार्टी को इससे नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि विरोधी पक्षों के नेता सरकार पर बिना तैयारी के ही इस बड़े निर्णय की घोषणा का आरोप लगा रहे हैं।

4 लोकसभा क्षेत्रों के उपचुनाव के लिए मतदान 19 नवंबर को हुए। कुछ विधानसभा के चुनाव के लिए भी मतदान हुए। 22 नवंबर को चुनाव नतीजे आ जाएं। उन नतीजों में यह देखा जा सकता है कि इस निर्णय से भारतीय जनता पार्टी का नुकसान होता है या फायदा। यदि इसमें भाजपा को फायदा होता है, तो मानना पड़ेगा कि आगे होने वाले चुनावों में भी फायदा होगा और यदि इसमे नुकसान होता है, तो आगे आने वाले चुनावों में क्या होगा यह इस पर निर्भर करेगा कि लोगों की परेशानी का दौर कितना लंबा खिंचता है। (संवाद)