हर साल 30 अगस्त को दुनिया भर के खोये हुए लोगों की खोज के लिए संकल्प लिये जाते हैं, और फिर हजारों लोग खो भी जाते हैं। खोये हुए लोगों और उनके परिवारों की पीड़ा भीषण त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं का विषय अब तक नहीं बन पाया है। यह आंकड़ों का विषय ही रह गया है और इसलिए रेड क्रास की अन्तर्राष्ट्रीय कमिटी (आईसीआरसी) को इस वर्ष कहना पड़ा कि जितना किया जाना चाहिए उतना नहीं किया जा रहा है।
इस अवसर पर कमिटी ने “खोये हुए लोग – एक छुपी हुई त्रासदी” नामक रपट भी जारी की जिसमें इस त्रासदी पर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया गया – जिसे आम तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है – और जो सशस्त्र संघर्ष या अन्य हिंसा की स्थितियों में लापता हो जाते हैं।
जब युद्ध होता है या सघर्ष होता है तब अनेक लोग रहस्यमय ढंग से लापता हो जाते हैं। ऐसे लोगों की कहानी भीषण त्रासदी की होती है, चाहे वे बंदी बनाये गये हों या अपहृत किये गये हों, चाहे उन्हें गुप्त ठिकानों में रखा गया हो चाहे वे बंदी की हालत में मर गये हों, चाहे उन्हें थोक के भाव अज्ञात कब्र में दफना दिया गया हो, या जिनकी लाशें पहचानी न जा सकी हों या फिर विस्थापित या पलायन कर गये हों। ऐसे लोग या उनके परिवार के लोग पूरी तरह अन्याय के शिकार की गहरे मनोभाव और आक्रोश तथा पीड़ा में जीने को भी, यदि बच गये तो, मजबूर होते हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि दुनिया के तीस देशों में अभी भी गुप्त कारावास की परम्परा है जिसे जल्द से जल्द समाप्त करने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर जारी “खोये हुए लोग – एक छुपी हुई त्रासदी” एक मार्मिक दस्तावेज है। दस्तावेज कहता है कि जब से लोग युद्ध लड़ रहे हैं तब से ही लोग विलुप्त होते रहे हैं। हो सकता है कि वे सामूहिक प्राणदंड के शिकार होकर अज्ञात कब्रों में फेंक दिये गये हों जैसा कि बलकान में हुआ। हो सकता है उन्हें बंदी बना लिया गया हो या अपहृत कर लिया गया हो जैसा कि श्री लंका में युवाओं के साथ हुआ। हो सकता है कि उन्हें उनके घरों में ही कैद कर लिया गया हो या गुप्त कैदखानों में रखा गया हो जहां वे मर गये हों। अनेक नागरिक भाग गये हों या अपने बच्चों या परिवार के सदस्यों से बिछुड़ गये हों, जैसा कि कांगों मे हुआ। हो सकता है कि सैनिक और अन्य मार दिये गये हों और लाशें लावारिस पड़ी रही हों, जैसा कि इथियोपिया और एरिट्रिया में हुआ।
ऐसी घटनाएं न सिर्फ विलुप्त हुए लोगों की त्रासदी है बल्कि उनके परिवार के लोग भी इसके शिकार होते हैं। एक छण उन्हें लगता है कि उनके प्रिय जन मर गये हैं और दूसरे ही छण उन्हें लगता है कि वे जीवित भी हो सकते हैं। वे आशा और निराशा के बीच झूलते रहते हैं और भारी मानसिक और संवेदना के स्तर पर पीड़ा में जीवन भर तड़प रहे होते हैं।
इन पीड़ित लोगों को ठग भी ठग रहे होते हैं उनके परिजनों की खोज के नाम पर। ये लोग संवेदना के स्तर पर ही नहीं बल्कि वित्तीय रुप से भी टूट जाते हैं। इन दु:खद कहानियों की कथा अकथ है।
लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने इस समस्या को अबतक कुल मिलाकर नजरअंदाज ही किया है । ऐसी घटनाओं पर उम्मीदें छोड़ दी जाती हैं। यही कारण है कि अब तक लोगों को सही सही नहीं मालूम कि दुनिया में कितने लोग लापता हैं। इसकी संख्या लाखों में है।
नेपाल में चले सशस्त्र संघर्ष में ही 1,048 लोगों के लापता होने की खबर है। इनमें से अधिकांश परिवारों की शिकायत है कि उनके परिजनों को सुरक्षा बल उठा ले गये थे। माओवादियों ने भी हजारों को अगवा किया था। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार वहां दोनों ओर से इन संघर्षों में लगभग 15000 लोग मारे गये।
नब्बे के दशक में अकेले युगोस्लाविया के संघर्ष में 17,800 लोग लापता हुए जो अभी तक नहीं मिले। बोस्निया में इस वर्ष जुलाई महीने तक 13,449 लोग लापता हो चुके हैं, जबकि क्रोशिया में 2386 तथा कोसोवो में 2,047 लोग लापता हुए हैं।
कमिटी ने अपनी रपट में बताया है कि हालांकि अभी सही - सही नहीं पता कि इराक युद्ध में कितने लोग लापता हुए हैं लेकिन एक आकलन के अनुसार 3,75,000 से 10,00,000 के बीच लग लापता हैं।
रपट के अनुसार श्री लंका में कोई 6000 लोग लापता हैं जिनके बारे में किसी के पास कोई सुराग नहीं है। अफ्रीका में हजारों लोग लापता हैं। अंगोला में लगभग 22,000 लोगों को लापता घोषित किया गया है। इस तरह लापता लोगों की सूची काफी लंबी है।
खोये हुए लोगों का पता लगाने के लिए पिछले साल दिसम्बर महीने में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसमें सभी देशों से कहा गया था कि वे इसपर हस्ताक्षर करें और इसके लिए अपने देशों में समुचित प्रावधान करें। लेकिन दुर्भाग्य की बात तो यह कि अब तक दुनिया के सिर्फ 61 देशों ने ही इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए हस्ताक्षर किये हैं। #