शुक्रवार, 6 अक्तूबर, 2006
दुनिया की गिरती सेहत और धन कमाने की होड़
ज्ञान पाठक
दुनिया भर में लोगों की सेहत गिरती जा रही है और चिकित्सा सुविधाएं महंगी की जा रही हैं। व्यवसायी अधिकाधिक कमाने के लिए और सरकारें अपनी राजकोषीय स्थितियों में सुधार के नाम पर ऐसा कर रही हैं। परिणाम स्वरुप जानलेवा बीमारियां महामारी का रुप धारण कर रही हैं। लाखों जानें सिर्फ लापरवाही या अमानवीय लोभ में की जा रही गड़बड़ियों के कारण जा रही हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने ऐसी स्थितियों पर विश्व स्वास्थ्य रपट 2006 में गंभीर चिंता व्यक्त की है। इक्कीसवीं शताब्दी के इस पहले दशक को उसने दो चरम स्थितियों के जनक मे रुप में देखा है। उसने कहा कि जहां एक ओर दवाओं और चिकित्सकीय प्रौद्योगिकी या तकनीक के मामले में उल्लेखनीय प्रगति हुई है वहीं दूसरी ओर ये इतनी महंगी हो गयी हैं कि एक बहुत बड़ी आबादी इनका लाभ उठाने की स्थिति में नहीं है। ऐसी चरम स्थितियां पहले कभी नहीं हुई थीं। उसने चेतावनी दी है कि बीमारियों के फैलने से वे लोग भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं जो इस समय चिकित्सा क्षेत्र की सुविधाओं का लाभ उठाने की स्थिति में हैं।
संगठन ने दुनिया को सचेत कर दिया है कि चिकित्सा के अनेक मामलों में अप्रत्याशित ढंग से हम पीछे खिसक गये हैं। धनी देशों के मुकाबले कुछ गरीब देशों में जन्म से समय संभावित आयु ध्वस्त होकर आधी रह गयी है। इसका कारण बताते हुए रपट ने उप-सहाराई राष्ट्रों में फैले एच आई वी और एड्स तथा लगभग एक दर्जन से ज्यादा विफल राष्ट्रों का जिक्र किया है। आज धनी और गरीब दोनों तरह के देशों में समान रुप से भय का वातावरण है, क्योंकि सार्स, पक्षियों को इन्फ्लुएंजा, आदमी के व्यवहार मे हो रहे बदलाव जैसे मानसिक विकार या बीमारियां तथा घरों के अंदर फैल रहे हिंसा के माहौल नयी समस्याएं खड़ी कर रही हैं।
रपट ने स्पष्ट किया कि विडंबना है कि स्वास्थ्य संबंधी वर्तमान चुनौतियों में से अधिकांश का सामना करने के लिए दुनिया के पास पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी साधन हैं फिर भी आज अनेक राष्ट्रों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं कमजोर, अप्रभावी, अन्यायपूर्ण और यहां तक कि असुरक्षित हैं। उसने कहा कि आज की स्थिति में स्वास्थ्य योजनाओं को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छा-शक्ति की आवश्यकता है।
रपट ने इस बात का खुलासा किया है कि दुनिया में इस समय डाक्टरों, नर्सों, धाइयों और अन्य सहयोगी स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी है। उसके आकलन के अनुसार जरुरतों की तुलना में इनकी संख्या लगभग 43 लाख कम है। उसने बताया कि दुनिया के कोई 57 देशों में स्थिति काफी गंभीर है जहां यह कमी 24 लाख के आसपास है। विडंबना यह है कि इन देशों में प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी और डाक्टर भी काफी संख्या में बेरोजगार हैं। उसने इसके कारणों में भारी गरीबी, निजी क्षेत्र के श्रम बाजार में खराब स्थितियां, सार्वजनिक या सरकारी धन की इस क्षेत्र को उपलब्धता की कमी, लालफीताशाही, और गलत दिशा में राजनीतिक हस्तक्षेप को बताया है जिसके कारण उपलब्ध तेजस्वी मानवशक्ति का भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि स्थितियां नहीं सुधारी गयीं तो आने वाले दिनों में गरीब और धनी सभी देशों को भारी कीमतें चुकानी पड़ेंगी। धनी देशों का भविष्य कम जन्म दर और बूढ़ों की संख्या में भारी वृद्धि के कारण खतरे में है। इसके कारण वहां लगातार बनी रहने वाली बीमारियों के शिकार लोगों की संख्या बढ़ेगी और उन्हें ज्याद चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता होगी।
विकास के रुझान पर उसने सवाल खड़ा किया है जिसमें विकास दर बढ़ने के कारण जिन लोगों की वित्तीय हालत मजबूत होती चली जाती है उनमें परिवारों और व्यक्तियों में बीमारों की सेवा करने की इच्छाशक्ति और क्षमता घटती चली जाती है। इसलिए उनकी सेवा के लिए भी यदि चिकित्सकीय देखभाल करने वाले लोगों की संख्या नहीं बढ़ायी गयी तो भारी संकट की स्थितियों में लोगों को जीना पड़ेगा।
गरीब देशों में भी स्थितियां कम गंभीर नहीं होने जा रही हैं। वहां के लगभग एक अरब युवा शीघ्र ही अधेड़ और बूढ़े होंगे जिन्हें चिकित्सकीय सुविधाओं की स्वाभाविक रुप से ज्यादा आवश्यकता होगी। वहां की स्थितियां पहले से ही अनेकानेक बीमारियों से जटिल होती जा रही हैं और गरीबी के कारण लोग उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।
दुनिया भर के विशेषज्ञ आज चिंतित हैं और कह रहे हैं कि स्वास्थ्य की चुनौतियों का मुकाबला प्रथमिकता के तौर पर किया जाना चाहिए।
जानी मानी बीमारियों में टीबी तथा एचआईवी/एड्स आज ध्यानाकर्षण की मुख्य बीमारियां हो गयी हैं क्योंकि इसका फैलाव बड़ी तेजी से हो रहा है। संक्रमक बीमारियों में टीबी आज सबसे ऊपर है। आज दुनिया में प्रत्येक सेकंड कम से कम एक व्यक्ति इस बीमारी का शिकार हो रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही एक अन्य ताजे आंकड़े के अनुसार दुनिया में 17 लाख लोग 2004 में इसी बीमारी से मरे थे। उस बर्ष डायरिया जैसी बीमारी से 22 लाख, और एड्स से 30 लाख लोग मौत के शिकार हुए थे।
जहां तक एशिया का सवाल है, यूनिसेफ की ताजा रपट चौंकाने वाली है जिसमें मारक बीमारियों का ब्योरा दिया गया है।
सांस की बीमारियां इस क्षेत्र में होने वाली सर्वाधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। यहां सालाना 19,72,000 मौतें इसी से होती हैं।
दूसरे नंबर की जानलेवा बीमारी है टीबी। इससे क्षेत्र में प्रति वर्ष 9,65,000 लोग मरते हैं। भारी बोझ वाले 22 टीबी देशों में दस हैं – भारत, चीन, इंडोनेशिया, बांगलादेश, पाकिस्तान, फिलीपीन्स, वियतनाम, थाईलैंड, म्यांमार और कम्बोडिया।
तीसरे नंबर पर है डायरिया जिससे प्रति वर्ष होने वाली मौतों की संख्या है 7,58,000 और सर्वाधिक दक्षिण एशियाई बच्चे ही इससे मर रहे हैं।
एचआईवी और एड्स से मरने वालों की संख्या एशिया में 6,00,000 प्रति वर्ष है। पांचवां नंबर है मलेरिया का जिससे मरने वालों की संख्या प्रति वर्ष 76,000 होती है।
डेंगू महामारी के बारे में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया को चेतावनी दे रखी है, जिसका कहर अभी दिल्ली में देखा जा रहा है। यहां बड़े-बड़े अस्पतालों तक में स्वच्छता का अभाव है, और वहां भी डेंगू बीमारी लगने और मरने की खबरें आयी हैं। #
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दुनिया की गिरती सेहत ...
System Administrator - 2007-10-20 06:27
दुनिया भर में लोगों की सेहत गिरती जा रही है और चिकित्सा सुविधाएं महंगी की जा रही हैं। व्यवसायी अधिकाधिक कमाने के लिए और सरकारें अपनी राजकोषीय स्थितियों में सुधार के नाम पर ऐसा कर रही हैं। परिणाम स्वरुप जानलेवा बीमारियां महामारी का रुप धारण कर रही हैं। लाखों जानें सिर्फ लापरवाही या अमानवीय लोभ में की जा रही गड़बड़ियों के कारण जा रही हैं।