भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सामान्य नहीं हैं। कश्मीर के अंदर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद जारी है और नियंत्रण रेखा पर दोनों के बीच गोलियां चलती रहती है। आतंकवाद और सीमा पर होने वाली फायरिंग में हमारे जवान लगातार मारे जा रहे हैं। पाकिस्तान ने एक तरह से भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है। इसके कारण भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने की नीति बना रखी है। मुख्य विपक्षी कांग्रेस भी इस नीति के खिलाफ नहीं है। लगभग पूरे देश में इस बात पर सहमति बनी हुई है कि भारत को पाकिस्तान से तबतक बातचीत नहीं करनी चाहिए, जबतक पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा है।

वैसे माहौल में नवजोत सिद्धू का शपथग्रहण समारोह मे जाना गलत है। सिद्धू कह सकते हैं और कह भी रहे हैं कि पाकिस्तान की यात्रा वे निजी हैसियत से दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। लेकिन इसमें वे गलत हैं। इसका कारण यह है कि वे सिर्फ एक पूर्व क्रिकेटर नहीं हैं। वे राजनीतिज्ञ और राजनेता भी हैं। वे पंजाब सरकार में एक मंत्री हैं। वे कांग्रेस पार्टी के एक सदस्य भी हैं। इसलिए उनकी यह यात्रा अराजनैतिक यात्रा नहीं मानी जा सकती है। इमरान अपने समय के भारत के अन्य क्रिकेटरों से भी परिचित हैं। यह सच है कि सिद्धू भी इमरान के खिलाफ मैच खेलते थे, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने क्रिकेट की दुनिया में वह मुकाम कभी हासिल नहीं किया, जो मुकाम कपिलदेव और सुनील गावस्कर ने हासिल किया। ये दोनों भारतीय टीम के कैप्टन भी रह चुके हैं और सिद्धू की अपेक्षा लंबे समय तक क्रिकेट खेलते रहे हैं। इमरान की बराबरी के क्रिकेटर कपिलदेव और सुनील गावस्कर तो रहे हैं, लेकिन सिद्धू उनकी बराबरी के क्रिकेटर नहीं रहे।

इसलिए सिद्धू को मिले आमंत्रण का एक कारण उनका राजनीति में होना भी है। वे पाकिस्तान से सटे भारतीय प्रांत पंजाब की सरकार में मंत्री हैं और आमंत्रण के पीछे का बड़ा कारण यही हो सकता है, क्योंकि सिद्धू के स्तर और उनसे भी ऊंचे स्तर के कम से कम दो दर्जन भारतीय क्रिकेटरों से इमरान की दोस्ती रही होगी, लेकिन बुलाया उन्होंने सिर्फ नवजोत को ही, तो उसका कारण यह है कि वे एक राजनीतिज्ञ भी हैं।

इसलिए नवजोत को अपनी पाकिस्तान यात्रा से संबंधित निर्णय लेते समय एक राजनेता की तरह सोचना चाहिए था। उन्हें यह सोचना चाहिए था कि जब सीमा पर हमारे जवान पाकिस्तानियों के हाथों मारे जा रहे हैं और कश्मीर में आतंकवाद का दौर चल रहा है, तो क्या पाकिस्तान जाना उचित होगा। उन्हें यह विचार करना चाहिए था कि जब भारत सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत को तैयार नहीं है, तो क्या उन्हें पाकिस्तान जाना चाहिए था। नवजोत को इस तथ्य का भी ध्यान रखना चाहिए था कि भारतीय टीम पाकिस्तान नहीं खेलने जाती और पाकिस्तानी टीम को खेलने के लिए भारत मे आमंत्रित नहीं किया जाता। नवजोत को यह सोचना चाहिए था कि जब हमारे देश के वर्तमान क्रिकेटर ही खेलने पाकिस्तान नहीं जाते, तो पूर्व क्रिकेटर के रूप में उनको पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत पड़ी थी।

सिद्धू यह भी कह रहे हैं कि इमरान उनके अच्छे मित्र हैं और मित्रता का इस्तेमाल कर वे भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधो को तनावहीन बनाने का काम करेंगे। लेकिन नवजोत को यह तो पता होगा कि क्रिकेट मैच खेलते समय विपक्षी टीम के खिलाड़ी से मित्रता का कोई मतलब नहीं होता। इमरान नवजोत के मित्र रहे होंगे, लेकिन नवजोज ने उनके द्वारा फेंकी गई गेंद को एक बल्लेबाज के रूप में इसलिए नहीं छोड़ दिया होगा कि यह उनके मित्र द्वारा फेंकी गई गेंद है। और इमरान ने भी गेंद फेंकते समय यह नहीं सोचा होगा कि सामने बल्लेेेेबाजी कर रहा नवजोत सिंह सिद्धू उसका दोस्त है इसलिए उसे आसान गंेद फेंकनी चाहिए, ताकि वह उस पर छक्का जड़ दे।

क्रिकेट मैच की तरह की डिप्लोमेसी में कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं होता। सभी के अपने अपने हित होते हैं और अपने अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए ही सभी निर्णय लिए जाते हैं। इसलिए नवजोत की दोस्ती इमरान सरकार के भारत के प्रति अपनी नीति को बदल देगा यह सोचना भी गलत है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते उसी समय से खराब हैं, जिस समय से पाकिस्तान का निर्माण हुआ है। दोनों देशों के बीच अनेक युद्ध हुए है और 1971 तक के हुए युद्धों में तो दोनों देशों की तरफ से वे सैनिक अधिकारी भी आपस मे एक दूसरे के खिलाफ युद्धरत थे, जो अंग्रेज के जमाने में एक ही प्रशिक्षण केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उनमें से अनेक एक दूसरे के अच्छे दोस्त भी रहे होंगे, लेकिन उन्हें आपस में लड़ना पड़ा, क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता अपने अपने देश के प्रति थी।

नवजोत सिंह सिद्धू भले ही राजनीति में हैं, लेकिन वे एक अराजनैतिक व्यक्ति हैं, जो अपनी हसोड़ तुकबंदियो के कारण राजनीति में आए हैं। उनकी कोई राजनैतिक प्रतिबद्धता भी नहीं है। वे पहले भाजपा मे थे और अटलबिहारी वाजपेयी ने उनको टिकट देकर संसद का सदस्य बनाया था। लेकिन जब पूरा देश अटल के निधन पर शोक मना रहा है और सात दिन के राष्ट्रीय शोक की अवधि पूरी भी नही हुई है, लेकिन नवजोत शपथग्रहण का जश्न मनाने पाकिस्तान चले गए। उन्होंने तो वही किया, जो उनको सही लगा, लेकिन उनकी पार्टी कांग्रेस ने उनको जाने क्यों दिया, यह आश्चर्य का विषय है। भारतीय जनता पार्टी इसे भी एक चुनावी मुद्दा बनाएगी और कांग्रेस के पास इसका जवाब नहीं होगा। लगता है कि भाजपा को हराने की कांग्रेस की इच्छाशक्ति मर गई है।(संवाद)