पर उनकी मौत के बाद एक तरफ मुख्यधारा का टीवी और प्रिंट मीडिया उनका गुणगान करने में लगा था, तो सोशल मीडिया पर उनके गुणगाण के साथ साथ कटु आलोचना भी हो रही थी। करगिल को उनकी उपलब्धि बताई जाती है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे उनकी नाकामी बताया जा रहा था और इसके पक्ष मे अकाट्य तथ्य दिए जा रहे थे कि उनकी गलत राजनीति के कारण करगिल में पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ की थी और अपनी जमीन हासिल करने के लिए सैंकड़ों भारतीय जवानों को अपनी शहादत देनी पड़ी।
देश का आरक्षण पाने वाला समुदाय, जिसकी संख्या करीब 85 फीसदी थी, अटल को आरक्षण विरोधी कह रहे थे और देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमांे को बिक्री कर आरक्षण समाप्त करने के लिए उनकी आलोचना कर रहे थे। उन पर आरोप लगाया जा रहा था कि उन्होंने सरकारी कंपनियों को बेचने के लिए एक मंत्रालय ही बना डाला था। परमाणु परीक्षण कर भारत के एक परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाने के लिए उनकी आलोचना हो रही थी, तो उनकी इसी उपलब्धि के लिए उनकी आलोचना भी हो रही थी कि भारत तो परमाणु शक्ति पहले से ही था, उनके निर्णय से पाकिस्तान भी घोषित रूप से एक परमाणु शक्ति बन गया और जो भारत से सैन्य दृष्टि से कमजोर राज्य था, अब भारत की बराबरी पर आ गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी के एक अपनी स्वीकृति को आधार बनाकर भी उनकी खूब आलोचना हुई। उन्होंने एक बार कहा था कि मैं शादीशुदा नहीं हूं, लेकिन मैं कुंवारा भी नहीं हूं। इसे आधार बनाकर उनके चरित्र पर सवाल भी उठाए गए और भारतीय व हिन्दू संस्कृति के वाहक होने के दावे का खंडन किया गया। इसके अलावा बलराज मधोक के हवाले उसे दीनदयाल की मौत को लेकर उनके ऊपर सवाल खड़े किए गए, तो सुब्रह्मण्यम स्वामी की बातों को दुहराकर भी उनपर हमले किए गए।
संविधान समीक्षा आयोग बनाने को लेकर भी अटलजी की बहुत आलोचना हुई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कार्यकारी कुलपति ने इस मसले को उठाया। इसके बाद उनको धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ते दबाव के बीच कार्यकारी कुलपति को सफाई पेश करनी पड़ी कि उनका इरादा न तो किसी को अपमानित करने का था और न ही किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का। लेकिन वाजपेयी के लिए कहे गए शब्दों को उन्होंने वापस नहीं लिया, बल्कि सफाई देते हुए एक बार और रेखांकित कर दिया कि अटल सरकार में संविधान समीक्षा आयोग का गठन एक बुरा कदम था।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और संविधान द्वारा तय की गई सीमा के तहत कोई भी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है। एक राय महात्मा गांधी विश्वविद्यालय मोतिहारी के सहायक प्रोफेसर संजय कुमार यादव ने भी रखी। उनकी राय सोशल मीडिया पर दलितों और पिछड़े वर्गों की राय से मिलती जुलती ही थी। उन्होंने अपनी राय व्यक्ति करते हुए अटलजी को फासीवादी करार दिया और उनकी मौत को भारत के फासीवाद के एक युग का अंत भी कह डाला।
वैसे अटलजी को फासीवादी कहना गलत था। वे छह साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे और उनके कार्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसके आधार पर हम उनका फासीवादी कहें। यह सच है कि जिस आरएसएस से जुड़े रहे, उसको देश के बौद्धि समुदाय का एक तबका पहले भी फासीवादी मानता था और आज भी फासीवादी ही मानता है, लेकिन अटल सरकार में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिससे हम उन्हें फासीवादी कहें।
फिर भी देश के नागरिकों को अपनी राय व्यक्त कहने का अधिकार है। यदि किसी को लगता है कि अटल बिहारी फासीवादी थे, तो उन्हें ऐसा कहने का अधिकार है। लेकिन दुर्भाग्य से उस सहायक प्रोफेसर की उस राय के लिए सरे आम निर्मम पिटाई कर दी गई। उन्हें उनके घर से बाहर खींचकर निकाला गया। शरीर के बाहरी कपड़े फाड़ दिए गए। सड़क पर लाकर निर्मम पिटाई की गई। आरोप के अनुसार उनपर तेल छिड़ककर जलाने की कोशिश भी की गई। उन्हें कन्हैया कुमार का नाम ले लेकर पीटा गया। संयोग से वह प्रोफसर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।
सवाल उठता है कि क्या किसी की महानता को समाज के ऊपर थोपा जा सकता है? अतीत में शायद ऐसा हुआ भी होगा, लेकिन आज सोशल मीडिया के युग में मुख्यधारा के समाचार चैनल और अखबार मिलकर अपनी मान्यता को समाज के लोगों के ऊपर थोप नहीं सकते। जिनकी आवाज को मीडिया की मुख्यधारा दबाती रही है, अब वे सही या गलत तरीके से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपने विचारों को शेयर करते हैं। ऐसा करते समय अनेक बार गलत शब्दों का इस्तेमाल भी होता है, लेकिन यदि कोई बात बहुत ही आपत्तिजनक और कानून का उल्लंघन है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन बिहार में सहायक प्रोफेसर के साथ जो हुआ, वह बहुत ही गलत था। यह तो अच्छा हुआ कि उस घटना में प्रोफेसर की मौत नहीं हुई, अन्यथ प्रदेश में भयानक कानून व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती थी। समझदारी दिखाते हुए कुलपति ने विश्वविद्यालय को फिलहाल बंद कर दिया है। समय बीतने के साथ स्थिति सामान्य हो जाएगी, लेकिन अपनी सोच को ही सही मानना और अलग विचार रखने वाले लोगों पर हमले करना फासीवादी सोच है और इस तरह की सोच को हमारे देश में बढ़ रही है, जो दुर्भाग्यपूण है। (संवाद)
अटल की मौत और उसके बाद
किसी की कथित महानता को समाज पर थोपा नहीं जा सकता
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-08-21 12:12
अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद उनकी महानता केे चर्चे स्वाभाविक हैं। राजनीतिज्ञों की छवि आमतौर पर खराब होती है, लेकिन अटलजी इसके अपवाद थे। उनकी छवि एक अच्छे राजनीतिज्ञ की थी और उनके विरोधी भी उनपर निजी हमला करने से बचा करते थे, हालांकि बलराज मधोक और सुब्रह्मण्यन स्वामी जैसे अपवाद भी थे, जो उनके बारे में खराब राय रखते थे और सार्वजनिक रूप से उसका उल्लेख भी किया करते थे। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अटल बिहारी वाजपेयी शायद ऐसे नेता थे, जिन्हें अपने विरोधियों के बीच भी सम्मान मिलता था और वे एक ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी सबसे कम आलोचना राजनेता वर्ग में हुई है।