लेकिन मोदी लहर ने भाजपा और उसके समर्थक दल को 73 सीटों पर जीत दिला दी। उत्तर प्रदेश के शानदार प्रदर्शन के कारण ही भाजपा को लोकसभा में बहुमत हासिल हो गया। जाहिर है मोदी की सरकार उत्तर प्रदेश के रास्ते से बनी थी और वह सरकार भी उत्तर प्रदेश के रास्ते से ही सत्ता से बाहर हो सकती है। 2014 के बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा के 4 उपचुनाव हुए। उनमें से एक तो मुलायम सिंह द्वारा जीती गई सीट थी, जहां हुए उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार की ही जीत हुई। तीन अन्य उपचुनाव उन क्षेत्रों में हुए जहां 2014 में भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। उन तीनों उपचुनाव में विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवारों के सामने भाजपा के उम्मीदवार टिक नहीं सके। खुद मुख्यमंत्री योगी का क्षेत्र गोरखपुर उसके हाथ से निकल गया। 1989 के बाद वहां से सिर्फ महंत अवैद्यनाथ और उनके शिष्य वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही जीतते आ रहे थे।
उपचुनावों में भाजपा की हार ने विपक्षी दलों में उम्मीदें जगा दीं कि 2019 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा को सत्ता से बाहर किया जा सकता है। यह उम्मीद गलत भी नहीं है, क्योंकि यदि उपचुनावों की तरह आगामी लोकसभा चुनाव में भी वहां के चार दल- समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल- आपस में हाथ मिला ले और सभी सीटों पर अपना संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करे, तो भारतीय जनता पार्टी को प्रत्येक सीट पर जीतने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ेगा और अधिकांश सीटों पर उसकी हार हो जाएगी, क्योंकि इस महागठबंधन के पास मतशक्ति भारतीय जनता पार्टी की मतशक्ति से 10 से 15 फीसदी तक ज्यादा होगी। उत्तर प्रदेश में जमीन खोने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सदस्य संख्या लोकसभा में गिर जाएगी और केन्द्र मे उसका फिर से सरकार बनाने का सपना पूरा होना लगभग असंभव हो जाएगा।
पर उत्तर प्रदेश में जो राजनैतिक हलचलें हैं, वह महागठबंधन के लिए बहुत शुभ नहीं है। विपक्ष की राजनीति के मुख्य खिलाड़ी वहां अखिलेश यादव और मायावती हैं और दोनों की अपनी अपनी राजनीति के कारण महागठबंधन बनना आसान नहीं और यदि यह गठबंधन किसी तरह बन भी गया, तो फिर उसकी विश्वसनीयता बने रहना भी आसान नहीं होगा और वह गठबंधन जमीनी स्तर पर शायद उतर नहीं सके। सबसे पहले अखिलेश यादव का उदाहरण लें। वे इस समय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उसके सुप्रीमो हैं। वे भाजपा को हराने के लिए किसी भी हद तक जाने की कसमें खा रहे हैं। वे मायावती के सामने झुक गए हैं और अपनी पार्टी से कमजोर के बावजूद वे बसपा को अपनी बराबर सीट देने को तैयार हैं। वे कांग्रेस के लिए भी कुर्बानी करने को तैयार हैं। ऐसा वे इसलिए करना चाहते हैं, ताकि भारतीय जनता पार्टी की सरकार केन्द्र से हटे।
लेकिन अखिलेश की राजनीति का अंतर्विरोध देखिए कि वे अपने चाचा शिवपाल यादव के लिए कोई कुर्बानी देने को तैयार नहीं हैं। वे अपनी मुहबोली बुआ मायावती के सामने झुकने को तैयार हैं, लेकिन अपने सगे चाचा शिवपाल को पार्टी में सम्मानजनक जगह देने को तैयार नहीं। पार्टी का महासचिव नियुक्त होने का इंतजार करते हुए शिवपाल यादव ने अपना एक अलग संगठन बना लिया है और उस संगठन के उम्मीदवार उत्तर प्रदेश की सभी सीटों से उतारने की घोषणा कर रहे हैं। अब यदि उनके उम्मीदवार सभी सीटों पर होंगे, तो फिर सपा- बसपा गठबंधन कितना कारगर होगा, इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है। आज अखिलेश सत्ता में नहीं हैं कि हर कोई उनके इशारे पर चले। वे विपक्ष में हैं और पार्टी पर उनकी वह पकड़ नहीं जो उनके मुख्यमंत्री रहते थी। बसपा और कांग्रेस के समझौते के तहत जिन सीटों पर अखिलेश उम्मीदवार नहीं खड़ा करेंगे वहां शिवपाल के उम्मीदवार महागठबंधन के मंसूबों पर अपने उम्मीदवार खड़ा कर पानी फेर देंगे।
महागठबंधन के लिए दूसरी समस्या मायावती ही खड़ी कर रही हैं। एक तरह राहुल और अखिलेश कह रहे हैं कि भाजपा को सत्ता से बेदखल करना ही उनका उद्देश्य है, लेकिन मायावती कह रही हैं कि उनकी दिलचस्पी सम्मानजनक सीटें पाने में है। यदि सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं, तो वे गठबंधन नहीं करेंगे। इसका मतलब तो यही है कि मायावती भाजपा को हराने के बारे मे उस तरह नहीं सोचतीं जैसा राहुल और अखिलेश सोचते हैं। वे दोनो त्याग करने के लिए तैयार हैं, लेकिन मायावती त्याग करना तो दूर अपनी ताकत से चार गुना ज्यादा सीटें पाने के लिए आतुर हैं।
और यदि मायावती को उनकी ताकत से ज्यादा सीटें अखिलेश दे देते हैं, तो फिर समाजवादी पार्टी में ही विद्रोह हो जाएगा, जिसे हवा देने के लिए चाचा शिवपाल यादव पहले से ही वहां मौजूद हैं। गौरतलब हो कि विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस को उसकी ताकत से तीन गुना ज्यादा सीटें दे दी थीं। उसका असर कांग्रेस के 19 फीसदी उम्मीदवारें की हार के रूप में सामने आया था। वह एक बार फिर लोकसभा चुनाव मे दुहराया जा सकता है। मायावती अखिलेश की बांह मरोड़कर उनके समर्थन से अपना उम्मीदवार नहीं जिता सकतीं और अखिलेश यादव चाचा शिवपाल की उपेक्षा कर सपा समर्थक मतदाताओं के वोट मायावती की बसपा को नही ट्रांसफर करा सकते। जाहिर है, उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की राह आसान नहीं है। (संवाद)
उत्तर प्रदेश की राजनैतिक हलचल
महागठबंधन की राह आसान नहीं
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-09-19 12:25
भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने के लिए जिस महागठबंधन पर भरोसा किया जा रहा है, उसका उत्तर प्रदेश में सफल होना बेहद जरूरी है। इसका कारण यह है कि उत्तर प्रदेश लोकसभा में 80 सांसद भेजता है और 2014 के चुनाव में इसने भाजपा के 71 और उसके सहयोगी अपना दल के 2 सांसदों को संसद में चुनकर भेजा था। उत्तर प्रदेश के इतिहास में भारतीय जनता पार्टी को उतनी बड़ी जीत पहले कभी मिली ही नहीं थी। जब वहां राम मंदिर आंदोलन के कारण सांप्रदायिक माहौल अत्यंत ही तनावपूर्ण था और प्रदेश की राजनीति पर कल्याण सिंह की तूती बोलती थी, तब भी संयुक्त उत्तर प्रदेश की 85 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा 58 सीटों पर भी भाजपा की जीत हुई थी।