एससी / एसटी एक्ट पर गहराते विवाद एवं होते दुरूपयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ताख पर रख केन्द्र सरकार ने इस वर्ग को लुभाने एवं अपनी ओर आकर्षित कर आम चुनाव में अपना पक्ष मजबूत बनाने की दिशा में एससी / एसटी एक्ट के उस स्वरुप को अध्यादेश लाकर लागू कर दिया जिसे लेकर उभरे विवाद एवं होते दुरूपयोग को रोकने हेतु सुप्रीम कोर्ट ने एतराज जताते हुए नियम में संशोधन किया था, सरकार ने उसे अध्यादेश के आधार पर बदल दिया ।
वहीं तीन तलाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तीन तलाक पर सरकारी अघ्यादेश जारी कर गैर कानूनी करार करने फैसला लिया । गैस सब्सीडी के मामलें में नया अध्यादेश लाकर आर्थिक सम्पन्न लोगों की सब्सीडी सरकार ने समाप्त तो कर दी, स्वागत योग्य कदम रहा पर अब सरकार से देश के आमजन की ओर से यह भी आवाज आने लगी है कि सरकार आरक्षण के मामलें में क्यो नहीं अध्यादेश लाकर आर्थिक सम्पन्न लोगों का आरक्षण समाप्त कर देती । पर ऐसा कर पाना संभव नहीं , आरक्षण से वोट की राजनीति जुड़ गई है। इस तरह कदम उठाकर इस वर्ग को नराज कोई नहीं करना चाहता। इसी कारण आरक्षण का आज खुला दुरूपयोग हो रहा है पर किसी भी राजनीतिक दल में इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं। मंदिर - मस्जिद का मुद्दा भी वोट की राजनीति से जुडा मामला है, जिसे कोर्ट के बहाने आजतक सभी एक दूसरे को उलझाते रहे। जिन मुद्दों से राजनीतिक दलो फायदा पहुंचने वाला है, उन मुद्दों का कोई समाधान नहीं चाहता । सरकार भी वहीं अध्यादेश लागु कर रही है जहां सरकार से जुड़े राजनीतिक दल का चुनावी फायदा पहुंचने वाला है। पूर्व में वर्तमान सरकार द्वारा ऊŸार प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पूर्व कालाधन रोकने के नाम नोटबंदी पर लाया अध्यादेश चुनाव में सŸाा पक्ष से जुड़े राजनीतिक दल भाजपा को तत्काल लाभ तो पहुंचा गया जिससे वहां उसकी सरकार गठित हो गई। नोटबंदी से कालाघन तो रूका नहीं, देश में आमजनता जरूर परेशान हुई। कई घरों के चुल्हें बंद हो गये। छोटे लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा जिसे आज तक यह तबका भूल नहीं पाया। आज भी सरकार सरकार लाभ से जुड़े अध्यादेश चुनाव पूर्व ला तो रही है पर लाभ से जुड़े लागू हो रहे सरकारी अध्यादेश , क्या बदल पायेंगे परिवेश को जहां बढ़ती महंगाई से परेशान आम जनमानस एवं देश की बेरोजगार युवापीढ़ी के बीच उभर रहा है जनाक्रोश !
आज देश के हालात पर मंथन करें जहां दिन पर दिन प्रेट्रोल - डीजल के भाव बढ़ते ही जा रहे है। जिससे देश की महंगाई जुड़ी हुई है। किसानों की खेती, यातायात के हर साधन पर सीधे प्रभाव पड़ता है। इससे आमजन तो प्रभावित है ही बाजार भी प्रभावित होता है। रोजगार के नाम एक भी नया बड़ा उद्योग आता नजर नहीं आ रहा है, जो बड़े उद्योग चल भी रह है , वहीं रोजगार बंद है। उसे ठेकदार एवं सरकार के चहेते निजी कम्पनी वाले चला रहे है जहां रोजगार के नाम छलावा है। सरकारी बैंकों का विलय होता जा रहा है एवं बैंकों में घोटाले भी बढ़ते जा रहे है। जो बैंक आम आदमी को लोन देने में कई परेशानियां खड़े कर देते वे ही बैंक अमीर घरानों को आसानी से करोड़ों लोन देते जो लोन लेकर विदेश भाग जाते। इस पर कोई नियंत्रण नहीं । इस हालात में यदि बैंक दिवालिया हो जाता तो आम आदमी की गाढ़े की कमाई से की गई छोटी बचत की बैंक में जमा राशि का देनदार कौन होगा ? इस पर कोई अध्यादेश नहीं ।
चुनाव से पूर्व राजस्थान में डिजीटल इंडिया के तहत कम कीमत पर भामाशाह कार्डघाराकों को जिओं मोबाइल देने के प्रक्रिया के माध्यम से अंबानी ग्रुप को अरबों का अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने के परिदृृश्य को देखा व परखा जा सकता है। इस तरह के अनेकों अभी उपहार चुनाव पूर्व उभरेंगे जो आमजनमानस को लुभाने का प्रयास करेंगे। इस तरह चुनाव में आमजनमानस के साथ -साथ अपने चहेते व्यापारी वर्ग को भी लाभांश पहुंचाकर अपने पक्ष में करने की प्रक्रिया जारी रहेगी पर आमजनमानस पर इस प्रयोग का प्रभाव कितना पड़ सकता है, चुनाव उपरान्त ही पता चल पायेगा। देश की जनता अपने नजरियें से हर चीज की परख करती है। इसलिये चुनाव के आसपास लाभ से जुड़े जारी अध्यादेश ,क्या बदल पायेंगे परिवेश, क्या आमजनमानस पर प्रभाव डाल पायेंगे, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता ? (संवाद)
लाभ से जुड़े सरकारी अध्यादेश
क्या बदल पायेंगे परिवेश?
डाॅ. भरत मिश्र प्राची - 2018-09-21 12:19
जैसे -जैसे देश में आम चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है, राजनीतिक सरगर्मिया तेज हो चली है। सत्ता पक्ष अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिये अपने तरीके से प्रयासरत है तो विपक्ष सत्ता तक पहुंचने की तैयारी में बेमेल संगम के बीच जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करने में जी तोड़ प्रयास में सक्रिय नजर आ रहा है। इस समय राजनेताओं को देवी - देवताओं के दरवाजें भी नजर आने लगे है जहां वे माथा टेककर सत्ता तक पहुंचने का प्रयास कर रहे है। सत्ता तक पहुंचने के क्रम में आम जनमत को अपनी ओर आकर्षित करने की दिशा में नई - नई घोषणाओं के दौर के साथ अपने मतलब के लिये लाभ से जुड़े सरकारी अध्यादेश के बदलते तेवर भी देखे जा सकते है। इस दिशा में कहीं सुप्रीम कोर्ट की पहल सकरात्मक हो जाती है तो कहीे नकरात्मक नजर आने लगती है।