यह पीएमओ की कार्यशैली के बारे में बताता है। पीएमओ मे भी लालफीताशाही का राज है, जैसे कि अन्य सरकारी कार्यालयों में होता है और यह समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है कि लाल टेप के राज मंे क्या क्या होता है और क्या क्या हो सकता है। शायद रघुराम राजन की रिपोर्ट एक ऐसे लपेटन के नीचे फिसल गई कि उसने फिर रोशनी देखी ही नहीं। अन्यथा यह कल्पना करना मुश्किल है कि मोदी पूरे बैंकिंग क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था के संभावित खतरे पर कार्रवाई नहीं करते, अगर वह समस्या से अवगत होते।
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व प्रमुख के इस खुलासे ने मोदी सरकार को इतना शर्मिंदा किया है कि उसे इस पर कुछ कहते नहीं बन रहा है। इस खुलासे ने राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी को राफेल सौदे के साथ-साथ विजय माल्या और नीरव मोदी के रूप में मोदी सरकार पर हमला करने के लिए विस्फोटक उपलब्ध करा दिया है। इस खुलासे के कारण विजय माल्या और नीरव मोदी प्रकरण और भी लंबे समय के लिए जिंदा रहेगा।
हमारी सिस्टम में फाइलों के माध्यम से शासन किया जाता है और पीएमओ अपने नियमों और प्रक्रियाओं का एक जंगल जैसा है जिसमें यदि कुछ एक बार खो जाय, तो फिर उसे दुबारा मिलना लगभग असंभव हो जाता है। और यदि यह दुबारा मिल भी जाता है, तो यह कुछ और ही परिणाम देने वाला बन जाता है। नौकरशाही के सेट-अप में फाइलों, शिकायतों और प्रस्तावों के साथ अजीब चीजें होती रहती हैं।
नमो ऐप और अन्य पहुंच बनाने वाले कार्यक्रमों के साथ एक संचार ओवरकिल की स्थिति पैदा हो जाती है। नमो ऐप ने लगभग 10 मिलियन डाउनलोड हासिल किए हैं। पीएमओ वास्तव में, सूचनाओं का एक बड़ा टीला बन गया है जिसे संभालना सीमित नौकरशाही के नियंत्रण के बाहर की बात है। सभी मामलों में तत्काल प्रतिक्रिया का आग्रह है। इसके कारण ध्यान देने की गुणवत्ता प्रभावित होती है जिससे फाइल को कहां जाने चाहिए और उसे कहां भेज दिया जाता है, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं। राजन की रिपोर्ट के साथ भी ऐसा हुआ होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
हमारे एक सहकर्मी को पीएमओ को संदर्भित मामले में कड़वा स्वाद चखना पड़ा। आईपीए के एक सीनियर मैनेजर ए सुबैया एटीएम कार्ड धोखाधड़ी के शिकार हो गए थे। जब धोखाधड़ी करने वाले ने कैनरा बैंक के उनके डेबिट कार्ड के जालसाज इस्तेमाल से तीन लेनदेन कर लिया और उनके बैंक अकाउंट से करीब 25 हजार रुपये की चोरी कर ली। यह 2016 की बात है। अपनी रकम की वापसी के लिए उपलब्ध तमाम चैनलों का इस्तेमाल करते करते 20 महीने बीत गए। सफलता नहीं मिली। उसके बाद सुबैया ने पीएमओ में अपनी शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद की हुई कार्रवाइयों का संदेश उन्हें मिलता रहा, लेकिन रकम नहीं मिली। उन कार्रवाइयो से इनको किसी प्रकार की राहत नहीं मिली। समस्या उनकी शिकायत में नहीं थी, लेकिन जिस तरह से शिकायत को हैंडिल किया गया, समस्या वहां पाई गई। नौकरशाहों ने शिकायत के साथ गड़बड़झाला किया। शिकायत मिलने के बाद पीएओ के नौकरशाह ने तत्काल उसे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को भेज दिया, जबकि जिस खाते से साइबर चोरी हुई थी, वहा खाता कैनरा बैंक का था।
यह स्पष्ट नहीं है कि संबंधित अधिकारी यह नहीं जानता था कि भारत का केन्द्रीय बैंक रिजर्व बैंक है। अ्रंग्रेजी में केन्द्रीय बैंक को सेंट्रल बैंक कहते हैं। भारत का सेंट्रल बैंक रिजर्व बैंक है, लेकिन संयोग से हमारे देश में सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया नाम का एक काॅमर्सियल बैंक भी है। हो सकता है कि भारतीय रिजर्व बैंक की जगह उसे सेंट्रल बैंक को ही वह बैंक समझ लिया है, जहां बैंकों से संबंधित शिकयातों का निबटारा होता हो और इसीलिए संेट्रल बैंक में उसने वह शिकायत फाॅरवर्ड कर दी।
यह भी हो सकता है कि केनरा बैंक और सेंट्रल बैंक में वह कन्फ्यूज हो गया हो और केनरा बैंक की जगह गलती से सेंट्रल बैंक में उसने वह शिकायत अग्रसारित कर दी। कारण चाहे जो भी हो, वह शिकायत सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया में गई और उसने पीएमओ को जवाब भेजा कि यह मामला उसका नहीं बल्कि केनरा बैंक का है। अब पीएमओ ने सुबैया के पास जवाब भेजा कि वह शिकायत सेंट्रल बैंक से संबंध नहीं रखती, बल्कि केनरा बैंक से संबंध रखती हे, इसलिए आपका मामला अब क्लोज किया जाता है। यानी पीएमओ ने खुद गलती की और अपनी गलती की ही दुहाई देते हुए मामला क्लोज कर दिया और सुबैया को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली। दूसरे शब्दों में कहें तो पीएमओ को गलती के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए पीएमओ ने वह केस बंद कर दिया। इस तरह पीएमओ ने अपने खिलाफ ही गोल कर डाला, लेकिन इसका शिकार सुबैया हुए। उन्हें राहत नहीं मिली।
यह पीएमओ की अकेली समस्या नहीं है। बैंक प्रहरी के पास भी शिकायत भेजी गई थी। उसने तो और भी बड़ी गड़बड़ी की। जहां तक बैंक के नाम की बात है, तो वहां गलती नही हुई। बैंक प्रहरी ने शिकायत को केनरा बैंक के पास ही भेजा, लेकिन उसने जालसाज लेनदेन के समय में हेराफेरी कर दी। तीन जालसाज लेनदेन हुई थी। उसमें एक का समय था 14:35 यानी 2 बजकर 35 मिनट। उसे बैंक प्रहरी ने खुद 12 बजकर 26 मिनट कर दिया, जबकि दो अन्य लेनदेन का समय वही रहने दिया गया।
बैंक प्रहरी द्वारा की गई गड़बड़ी के कारण दो लेनदेन के बीच का अंतराल लगभग दो घंटा हो गया, जबकि वास्तव मे तीनों लेनदेन दो ही मिनटों में हो गए थे और सुबैया को पहली लेनदेन के बाद अपने डेबिट कार्ड को ब्लाॅक कराने का अवसर ही नहीं मिल पाया था। लेकिन पहले और दूसरे ट्रांजैक्शन में दो घंटे का ंअंतराल पैदा करके बैंक को कहने का यह मौका दे दिया कि ग्राहक को पहले जालसाज ट्रांजैक्शन के बाद शिकायत करने के लिए दो घंटे का समय था, जिसका इस्तेमाल करके वह दूसरा जालसाज ट्रांजैक्शन रुकवा सकता था। लेकिन ग्राहक ने वैसा नहीं किया। इसलिए बैंक की जिम्मेदारी नहीं बनती है। सवाल उठता है कि बैंक प्रहरी बैंको के लिए काम करता है या वह निष्पक्ष होकर बैंक और ग्राहक के विवादों को सुलझाता है?
बैंक प्रहरी ने भी सुबैया को जिम्मेदार ठहराते हुए किसी प्रकार की राहत के रास्ते बंद कर दिया। सवाल उठता है कि क्या बैंक प्रहरी ने जानबूझकर ट्रांजैक्शन का समय बदल डाला, ताकि वह दोष ग्राहक पर ही डाल दे? अब यदि पीएमओ और बैंक प्रहरी इस तरह काम करे, तो सिर्फ भगवान ही हमारे बैंकों और उनके ग्राहकों की रक्षा कर सकते हैं। (संवाद)
पीएमओ सूचनाओं का जंगल है और वहां के नियम भी जंगली हैं
तेजी के चक्कर में काम की गुणवत्ता ही मारी जाती है
के रवीन्द्रन - 2018-09-24 11:36
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने पीएमओ को एक रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें प्रमुख बैंकों के डिफॉल्टरों का विवरण दिया गया था, लेकिन लगता है कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्ट के संबंध में दो संभावित परिदृश्य हैं। रिपोर्ट के बारे में मोदी ने फैसला किया होगा कि सूची में ऐसे नाम शामिल हैं जो उन्हें बहुत शर्मिंदगी दे सकते हैं, तो उन्होंने उसे दबा दिया। दूसरा परिदृश्य यह हो सकता है कि रिपोर्ट उनकी मेज पर पहुंची ही नहीं।