समझौते के पहले अंग्रेज हुकूमत दलितों को मुस्लिम, ईसाई और सिक्खों की तर्ज पर ही दलितों को पृथक मतदाता मंडल के तहत कम्युनल अवार्ड दे रही थी, जिसके तहत दलित मतदाताओं की अलग से मतदाता सूची बननी थी और उस दलित पृथक दलित मतदाता सूची में शामिल मतदाताओं द्वारा ही अपने प्रतिनिधि चुनने थे। उसके पहले मुस्लिम, ईसाई और सिक्खों की अलग से मतदाता सूचियां बनी हुई थीं और उनके प्रतिनिधियों का चुनाव भी अपनी अपनी सूचियों के मतदाताओं के द्वारा ही किया जाता था।

अंग्रेजों ने कम्युनल अवार्ड के तहत पृथक मतदाता सूची बनाकर उनके प्रतिनिधियों को चुनने की व्यवस्था राष्ट्रीय आंदोलन को विभाजित करने के लिए कर रखी थी। उस व्यवस्था के कारण ही हिन्दू मुस्लिम दंगे हो रहे थे और राष्ट्रीय आंदोलन पर उसका असर पड़ता था। फूट डालो और राज करो की नीति के तहत अगला कम्युनल अवार्ड अंग्रेज हुकूमत ने दलितों को देनी चाही। दलितों पर दाना फेकने का एक कारण साइमन कमीशन का कांग्रेस द्वारा किया जा रहा बहिष्कार था। बहिष्कार इसलिए हो रहा था कि ब्रिटिश भारत के नये संविधान के निर्माण के लिए बने साइमन कमीशन में किसी भी भारतीय को नहीं रखा गया था, जबकि अंग्रेजी हुकूमत का वायदा था कि संविधान बनाने वाले अगले आयोग में भारतीय को भी रखा जाएगा।

कांग्रेस के बहिष्कार से परेशान अंग्रेजी हुकूमत ने आम्बेडकर जैसे दलित नेताओं को प्रोत्साहित करना शुरू किया और कांग्रेस के बाहर के दलित नेताओं ने दबाव समूह बनाकर साइमन कमीशन का स्वागत करना शुरू किया। जाति के आधार पर सामाजिक विभाजन तो था ही और यह भी सच है कि दलितों के साथ समाज अमानवीय व्यवहार करता था। लेकिन सच यह भी है कि कांग्रेस ने दलितों के खिलाफ हो रहे भेदभाव के विरूद्ध केरल में एक बड़ा आंदोलन किया था, जिसका समर्थन अंग्रेज हुकूमत ने नहीं किया था। फिर भी वह गांधी के नेतृत्व में छूआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ भारत में हुआ पहला संगठित जन आंदोलन सफल रहा था और वायकम के मंदिर के पास के रास्ते कथित अछूत और निम्न जातियों के लोगों के लिए खोलना पड़ा था।

वायकम आंदोलन की सफलता के कारण देश भी के दलितों में आत्मविश्वास जगा था और वे जहां तहां अपने खिलाफ हो रहे अमानवीय व्यवहार के खिलाफ आंदोलित होने लगे थे। अंग्रेजों ने उनके इस आंदोलन का इस्तेमाल कांग्रेस के नेतृत्व में हो रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने की नीति बनाई और इसके तहत उन कथित अछूतों को गैर हिन्दू मानते हुए अलग से कम्युनल अवार्ड देना चाहा, जिसका देश भर में विरोध होने लगा। उस समय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय थे और महासभा कांग्रेस का ही हिस्सा थी। मदन मोहन मालवीय खुद छूआछूत के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे और हिन्दू समाज की उस घृणित प्रथा को समाप्त करने की कोशिश कर रहे थे। कम्युनल अवार्ड के कारण उनका प्रयास कमजोर हो जाता और गैर दलित हिन्दुओं से दलितों की दूरी और भी बढ़ जाती। दोनों समुदायों के बीच उसी तरह से दंगे भी हो सकते थे, जिस तरह से हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगे हो रहे थे। इसलिए मालवीय के नेतृत्व में कथित अछूतों को प्रस्ताविक कम्युनल अवार्ड के खिलाफ बड़ा आंदोलन होने लगा।

उस समय महात्मा गाधी जेल में थे। बाहर का माहौल खराब हो रहा था। कम्युनल अवार्ड के खतरे को गांधी भी समझ रहे थे और अंग्रेज हुकूमत की मंशा को भी वे समझ रहे थे। उन्होंने कम्युनल अवार्ड के खिलाफ अनशन शुरु कर दिया। उनके अनशन के दबाव में आम्बेडकर झुक गए और महात्मा गांधी द्वारा सुझाए गए बीच के रास्ते को उन्होंने स्वीकार कर लिया। गांधी द्वारा कराए गए समझौते के तहत दलितों को आरक्षण मिलना था, लेकिन वह संयुक्त मतदाता मंडल के तहत ही मिलना था। उनके लिए मतदान के क्षेत्र आरक्षित किए जाने थे, लेकिन उनको चुनने वाले मतदाता उस क्षेत्र के सभी मतदाता होते।

वही व्यवस्था आज भी चल रही है। और यदि पूना पैक्ट नहीं होता, तो अंग्रेजों द्वारा दिया गया कम्युनल अवार्ड सिर्फ आजादी के पहले तक ही अमल में रह पाता। आजादी के पहले 1935 के बाद जितने चुनाव होते, उनमें कम्युनल अवार्ड के तहत दलित प्रतिनिधियों को सिर्फ दलितों द्वारा ही चुना जाता। लेकिन वह अंग्रेजी हुकूमत का फाॅर्मूला था, इसलिए अंग्रेज हुकूमत के भारत से जाने के बाद वह उसी तरह समाप्त हो जाता, जिस तरह से मुसलमानों, सिक्खों और ईसाइयो को मिलने वाला कम्युनल अवार्ड समाप्त हो गया। चूुकि पूना पैक्ट पर मालवीय के दस्तखत होने से उस आरक्षण को राष्ट्रीय आंदोलन की सहमति प्राप्त हो गई थी, इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने संविधान बनाते समय पूना पैक्ट की उस व्यवस्था को बनाए रखा और जिसके कारण आज भी दलितों को आरक्षण मिल रहा है।

आम्बेडकर ने खुद भी लिखा है कि जब संविधान लिखा जा रहा था, तो ड्राफ्टिंग कमिटी के अन्य सदस्य आरक्षण की व्यवस्था करने के खिलाफ थे। तब उन्होंने (आम्बेडकर ने) गांधी और पूना पैक्ट का सहारा लिया। आम्बेडकर खुद लिखते हैं कि सरदार पटेल की कमजोरी महात्मा गांधी थे। उनका नाम लेकर उनसे कुछ भी करवाया जा सकता था। इसलिए आरक्षण को गांधी की इच्छा बताकर आम्बेडकर ने पटेल का समर्थन हासिल किया और फिर पटेल से ड्राफ्टिग कमिटी के अन्य सदस्यों पर दबाव बनाकर आरक्षण की व्यवस्था को संविधान में शामिल करवाया।

यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि अंग्रेज के जाने के पहले दलितों को कम्युनल अवार्ड ही मिला रहता, तो फिर उसे नये संविधान में समाप्त तो होना ही था, लेकिन पूना पैक्ट पर चूंकि राष्ट्रीय आंदोलन की मुहर लग चुकी थी, इसलिए उसे संविधान में शामिल करवाने में आम्बेडकर को ज्यादा मशक्क्त नहीं करनी पड़ी, सिर्फ गांधी का नाम लेना पड़ा, जिनकी मौत उस प्रावधान को शामिल करने के पहले ही हो गई थी। (संवाद)