राजधानी दिल्ली में भी बारिश ने 8 वर्षों का रिकाॅर्ड तोड़ते हुए बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए। वैसे दिल्ली में कुछ ही दिनों पूर्व भी कुछ पलों की तेज बारिश के चलते कई बार ऐसे ही हालात दिखाई दिए, जब कई स्थानों पर सड़कें दरिया बन गई, सड़कों पर इतना पानी भर गया कि वाहन तक पानी में डूबे नजर आने लगे। घरों, दुकानों इत्यादि तक में इस कदर पानी भर गया कि हर तरफ बड़े-बड़े तालाबों जैसा नजारा दिखाई देने लगा। इस तरह के दृश्यों को देखकर दिल्ली में भी हर किसी को बार-बार अब यही डर सताने लगता है कि अगर चंद घंटों की बारिश में ही दिल्ली का भी यह हाल हो सकता है तो अगर देश के कुछ अन्य राज्यों की भांति यहां भी तीन-चार दिनों तक लगातार ऐसी ही बारिश हो जाए तो शायद दिल्ली भी बाढ़ की चपेट में आ जाए।

कमोवेश यही हालात आज देश के लगभग सभी शहरों में हैं, जहां थोड़ी देर की बारिश में ही जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है, सड़कें पानी में डूब जाती हैं और कई स्थानों पर तो तेज बारिश के चलते मकान या अन्य इमारतें भी ताश के पत्तों की भांति पलभर में ढ़ह जाते हैं। हिमाचल में तो मानसून की विदाई की बारिश में पर्यटकों की एक बाॅल्वो बस ही पानी में बह गई। बात चाहे दिल्ली की हो या मुम्बई की या फिर हिमाचल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड अथवा महाराष्ट्र की, हर साल मानसूनी बारिश के चलते ऐसे हालातों से रूबरू होना जैसे हमारी नियति बन गई है और इस वर्ष तो बाढ़ के चलते देश के कई राज्यों में तबाही का जो हृदयविदारक मंजर देखा जा रहा है, वह भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं हैं।

कोई माने या न माने किन्तु हकीकत यही है कि यह सब प्रकृति से मानवीय छेड़छाड़ के चलते कुदरत के प्रकोप का ही असर है कि एक साथ देश के कई राज्य भयानक बाढ़ से त्रस्त हैं और हम प्रकृति के इस प्रकोप के समक्ष पूरी तरह बेबस और लाचार हैं। केरल में बाढ़ से हुई भारी तबाही का मंजर तो हर किसी ने देखा ही है, इसके अलावा देश के कई अन्य राज्य भी बाढ़ से बुरी तरह बेहाल हैं। बाढ़ की वजह से देशभर में अभी तक डेढ़ हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। बहुत से पर्यावरण वैज्ञानिकों ने देश के विभिन्न राज्यों में आई बाढ़ को मानव निर्मित त्रासदी की संज्ञा दी है। दरअसल अति वर्षा और बाढ़ की स्थिति के लिए जलवायु परिवर्तन, विकास की विभिन्न परियोजनाओं के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई, नदियों में होते अवैध खनन को प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है, जिससे मानसून प्रभावित होने के साथ-साथ भू-रक्षण और नदियों द्वारा कटाव की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते होती तबाही के मामले अब निरन्तर बढ़ने लगे हैं।

इस साल एक साथ कई राज्यों में आई बाढ़ कुदरत की ऐसी तबाही है, जिसे किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रतिवर्ष इसी प्रकार के हालात कई राज्यों में उत्पन्न होते हैं लेकिन न सरकारी तंत्र कोई ऐसे पुख्ता इंतजाम करता है, जिससे मानसून के दौरान पैदा होने वाली इस प्रकार की परिस्थितियों की वजह से होने वाले नुकसान को बेहद कम किया जा सके, न ही आमजन ऐसे हालातों से कोई सबक लेकर पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान देने की कोई पहल करता दिखता है। कितनी चिंता की बात है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में ही होता है और प्रतिवर्ष बाढ़ के चलते देश को करीब एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

निश्चित रूप से प्रकृति में व्यापक मानवीय दखलंदाजी, अवैज्ञानिक विकास, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और हमारी कुव्यवस्थाएं ही हर साल बाढ़ जैसे हालात पैदा करने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं। प्रकृति में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के चलते ही समुद्र का तल लगातार ऊंचा उठता जा रहा है, जिससे नदियों के पानी की समुद्रों में समाने की गति कम हो गई है और यही अक्सर बाढ़ का सबसे बड़ा कारण बनता है। यह विड़म्बनाजनक स्थिति ही है कि 1950 में देश में जहां करीब ढ़ाई करोड़ हैक्टेयर भूमि बाढ़ के दायरे में आती थी, वहीं अब बाढ़ के दायरे में आने वाली भूमि बढ़कर सात करोड़ हैक्टेयर हो गई है।

कुछ अध्ययनों में यह तथ्य भी सामने आया है कि मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ते जाने का एक बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है और अगर पर्यावरण के साथ खिलवाड़ इसी कदर जारी रहा तो इस प्रकार की त्रासदियां अभी आने वाले समय में और भी गंभीर रूप में सामने आएंगी लेकिन हम हैं कि प्रकृति द्वारा बार-बार दी जा रही गंभीर चेतावनियों के बावजूद कोई सबक सीखने को तैयार ही नहीं हैं। बाढ़ जैसी आपदाएं आने पर हम जी भरकर प्रकृति को तो कोसते हैं किन्तु यह समझने का प्रयास ही नहीं करते कि मानसून की जो बारिश हमारे लिए प्रकृति का वरदान होनी चाहिए, वो अब साल दर बड़ी आपदा के रूप में तबाही बनकर क्यों सामने आती है? किसी भी आपदा के लिए हम सदैव सारा दोष प्रकृति पर मढ़ देते हैं किन्तु वास्तव में प्रकृति के असली गुनाहगार तो हम स्वयं हैं। हम स्वयं से ही यह क्यों नहीं पूछते कि जिस प्रकृति को हम कदम-कदम पर दोष देते नहीं थकते, उसी प्रकृति के संरक्षण के लिए हमने क्या किया है? न हम वृक्षों को बचाने और चारों ओर हरियाली के लाने के लिए वृक्षारोपण में कोई दिलचस्पी दिखाते और न ही अपने जल स्रोतों को स्वच्छ बनाए रखने के लिए कोई कदम उठाते हैं।

आज देश के पर्वतीय क्षेत्र भी प्रकृति का प्रकोप झेलने को अभिशप्त हो रहे हैं लेकिन हम तमाम कारण जानते हुए भी जान-बूझकर अनजान बने रहते हैं और जब एकाएक तबाही का कोई मंजर सामने आता है तो हाय-तौबा मचाने लगते हैं। प्रकृति ने तो पहाड़ों की संरचना ऐसी की है कि तीखे ढ़लानों के कारण वर्षा का पानी आसानी से निकल जाता था किन्तु पहाड़ों पर भी अनियोजित विकास और बढ़ते अतिक्रमण के कारण बड़े पैमाने हो रहे वनों के विनाश ने यहां भी प्रकृति को काुपित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहरहाल, यदि हम चाहते हैं कि देश में हर साल ऐसी आपदाएं भारी तबाही न मचाएं तो हमें कुपित प्रकृति को शांत करने के उपाय करने होंगे और इसके लिए हमें प्रकृति के विभिन्न रूपों जंगल, पहाड़, वृक्ष, नदी, झीलें इत्यादि की महत्ता समझनी होगी। (संवाद)