यह फैसला ऐतिहासिक है और इसके आधार आधारित प्रशासन व्यवस्था का विकास किया जा सकता है और अनेक प्रशासनिक जगहों से भ्रष्टाचार मिटाया जा सकता है या उसे न्यूनतम किया जा सकता है। यह समाज के लोकतांत्रिककरण की दिशा में आगे बढ़ने का उपकरण साबित हो सकता है। अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार आगे क्या करेगी?

काले धन को मिटाने या उस पर रोक लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 5 सौ और 1 हजार के पुराने नोटों को रद्द कर दिया था। एकाएक रद्द करने की घोषणा से पूरे देश में अफरातफरी मच गई थी और देश के लोगों को अभूतपूर्व परेशानियों का सामना करना पड़ा था। कितने लोग तो बैंको में अपने पुराने नोट जमा करने और नये नोट निकालने के लिए कतार में खड़े खड़े ही मर गए थे। कुछ बैंककर्मी काम के बोझ के तले दब कर मर गए थे। नोटबंदी के कारण अनेक काम धंधे तबाह हो गए और लाखों लोग बेरोजगार हो गए।

उसके बावजूद उस समय नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। नोटबंदी के शुरुआती महीनों में जहां जहां चुनाव हो रहे थे, लगभग सभी जगहों पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। नोटतंगी के दौर में ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा को अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलताएं हासिल हुई।

उसका कारण यह था कि लोग वास्तव में काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था से निजात चाहते थे और उन लोगों को दंडित देखना चाहते थे, जिन्होंने गलत सलत तरीके से अपार धन प्राप्त कर रखे थे। लोगों की वह लालसा नरेन्द्र मादी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी को लोकप्रिय बना रही थी और चुनावों में उसके कारण सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।

पर नोटबंदी विफल हो चुकी है। नोटबंदी की घोषणा करते हुए जितने भी लाभ प्रधानमंत्री ने गिनाए थे, उनमें से एक भी देखने को नहीं मिला। उन्होंने कहा था कि 500 और 1000 के नोट रद्दी के टुकड़ों में तब्दील हो रहे हैं, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। लगभग सभी रद्द किए गए पुराने नोट बैंकों में वापस आ गए हैं। इतनी सारी परेशानियों और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नया नोट छापने में किए गए हजारों करोड़ रुपये के खर्च के बावजूद रद्द की गई करेगी के रूप में काला धन नहीं पकड़ा जा सका और न ही उसे समाप्त किया जा सका। उलटे उस घोषणा के कारण काला धन के निर्माण के कुछ नये रास्ते भी खुल गए और हवाला कारोबारियों, भ्रष्ट बैंक कर्मचारियों और जालसाजों की चांदी हो गई थी।

नोटबंदी के दौर में ही काले धन के विशेषज्ञ यह कहते दिख रहे थे कि काले धन का मात्र 3 से 5 फीसदी ही करेंसी के रूप में लोगों के पास रहता है। काला धन तो सबसे ज्यादा जमीन जायदादा के रूप में लोग अपने पास रखते हैं। इसलिए जमीन जायदाद के रूप में रखे काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है। नोटबंदी की उस तरह हो रही आलोचना के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार ने संकेत दिया था कि आधार से जमीन जायदाद व अन्य संपत्तियों को लिंक कर बेनामी संपत्ति का पता लगाया जा सकता है और उन संपत्तियों को बने नये कानून के तहत सीज किया जा सकता है।

लेकिन सरकार के हाथ बंधे हुए थे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में आधार की वैधता और सांवैधानिकता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे थे। मामला सुप्रीम कोर्ट में था और सरकार संपत्तियों को आधार से लिंक करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकती थी, क्योंकि उस पैन से लिंक करने का उस निर्णय भी लगातार टलता जा रहा था।

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने आधार की संवैधानिकता को स्वीकार कर लिया है और इसे सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है, तो सरकार के सामने वह अवरोध समाप्त हो गया है, जिसके कारण वह आधार से लोगों की अचल संपत्तियों को लिंक करवा सकती है। अचल ही नहीं, सोने जेवरात जैसी चल संपत्तियों को भी सरकार चाहे तो आदेश जारी कर आधार से लिंक करवा सकती है। इससे यह पता चल जाएगा कि किसके पास कितनी संपत्तियां और संपत्तियों का ब्यौरा भी मिल जाएगा।

अभी तो सरकार उन लोगों को ईनाम देने की योजना चला जा रही है, जो किसी अन्य व्यक्ति के पास जमा बेनामी संपत्ति की जानकारी देते हैं। लेकिन अधिकांश जानकारियां अनुमान के आधार पर दी जाती हैं, जिनके कारण कार्रवाई नहीं हो पाती। संपत्तियों को आधार से लिंक किए जाने के बाद खुद संपत्ति मालिक द्वारा ही जानकारी उपलब्ध करा दी जाएगी और उसके बाद बेनामी संपत्तियों का पता आसानी से लग जाएगा।

जिन संपत्तियों की आधार से लिंकिंग नहीं होगी, उन्हें सरकार बेनामी संपत्ति मान सकती है और कानून के अनुसार उसे जब्त किया जा सकता है और उसके जो दावेदार हों, उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाया जा सकता है। खुद द्वारा बताई गई संपत्ति का अर्जित करने के सा्रेत बताने में विफल लोगों की संपत्तियां बेनामी संपत्ति नये कानून के तहत पहले ही घोषित हो चुकी है। इसलिए वैसे संपत्तियों को जब्त करने और उनके मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करने में सरकारी एजेंसियों को कोई परेशानी नहीं होगी।

सवाल उठता है कि क्या नरेन्द्र मोदी ऐसा साहसिक फैसला ले पाएंगे? उन्हें अगले साल ही देश की जनता से अपने लिए एक और जनादेश की मांग करनी है। बेनामी संपत्ति पर आधार के तोप से किया गया सर्जिकल स्ट्राइक करने के पहले वे निश्चय ही चुनावी नफा नुकसान का आकलन करेंगे। (संवाद)