नामुमकिन है कि वर्तमान परिवेश में इस तरह कानून बन सके, जिससे राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ रोकी जा सके। इस मसले पर देशवासियों को सुप्रीम कोर्ट से बहुत बड़ी उम्मीदें थी, जो अपने लोकतांत्रिक पाॅवर का प्रयोग कर इस तरह के लोगों को जनप्रतिनिधि बनने पर रोक लगा सके, जिनसे लोकतंत्र को खतरा हो रहा हो, जिनसे लोकतंत्र की मर्यादा धूमिल हो रही हो, जिनसे देश में अव्यवस्थाएं पनाह ले रही हो । पर ऐसा नहीं हो सका।

इस मामले पर देश का सर्वोच्य न्यायलय जो लोकतंत्र का स्वतंत्र जागरूक स्तंभ है, जिसपर किसी का नियंत्रण नहीं, जो संपूर्ण देशवासियों की आस्था एवं विश्वास का प्रतीक है, कैसे राजनीति में अपराधियों की रोकथाम करने के लिये कानून बनाने जाने के लिये संसद के जिम्में सौंप दिया जहां ऐसे लोगों की बहुतायत है जिनके खिलाफ कानुन बनना है ? इस मसले पर सर्वोच्य न्यायलय कोई ठोस निर्णय अपने पूर्व निर्णयों के तरह लेता , तो शायद कोई रास्ता निकल पाता। अभी कुछ दिन पूर्व ही सर्वोच्य न्यायलय ने आदेश देकर देश के पूर्व मुख्यमंत्रियों से बंगले खाली करवायें थे जिन्हें न्यायलय के नजरियें में अनाधिकृृत कब्जा माना गया था। इस मामलें में सुप्रीम कोर्ट की राय स्पष्ट रही की जो मुख्यमंत्री नहीं रहे, वे देश के सामान्य नागरिक है, उन्हें सरकारी बंगला खाली कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सभी देशवासियों को बहुत ही अच्छा लगा। ऐसा लगने लगा कि सर्वोच्य न्यायलय की पहल पर बिगड़ैल नेतृृत्व पर लगाम लगेगी एवं लोकतंत्र की बिगड़ती काया सुधरेगी। पर दागी जन प्रतिनिधियों के राजनीतिक प्रवेश पर रोकथाम का मसला संसद के हाथ सौंपकर वर्तमान में अपराधिक प्रवृृŸिा से जुड़े लोगों को राजनीति में आने की खुली छूट मिल गई। वर्तमान एक सरकारी आकड़े के मुताबिक सांसदों एवं विधायकों की कुल संख्या 4896 में से 1765 सांसद एवं विधायक आपाराधिक मामलों में फंसे हुए है जिनपर 3045 मुकदमें दर्ज होने के अनुमान है। इस तरह की परिस्थिति में लोकतंत्र में अपराधियों की घुसपैठ रोकने हेतु संसद में कैसे कानुन बन पायेगा ? न नौ मन तेल होंगे, न राधा नाचेंगी वाली कहावत इस मामलें में चरितार्थ होती दिखाई दे रही है।

वैसे देश की संसद सर्वोपरि होती है , जिसकी अपनी मर्यादाएं है। संसद की इसी मर्यादा का ख्याल रखते हुये देश की सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे महत्वपूर्ण मसले जिससे लोकतंत्र की शाख गिरती जा रही हो, उसे बचाने के लिये संसद को कानुन बनाने का परामर्श देते हुए राजनीतिक दलों को दिशा निर्देश दिया कि अदालत में लंबित अपराधिक मामलों का शपथपत्रों में मोटे अक्षरों में उल्लेख किया जाय एवं मीडिया में प्रकाशित कराने के साथ - साथ राजनीतिक दल अपने वेवसाइट पर भी इसको प्रसारित करें। सुप्रीम कोर्ट नें संसद की मर्यादा का ख्याल रखते हुए संसद को इस दिशा में कानून बनाने का मौका देकर संसद की गरिमा को बनाये रखा पर संसद को चलाने वाले सांसद सुप्रीम कोर्ट के इस परामर्श पर कितना अमल कर पाते है, लोकतंत्र का भावी भविष्य इस बात पर टिका है। वैसे सरकार के पास राजनीति में अपराधियों को रोकने के लिये कानून बनाने का मामला पहले से ही विचाराधीन है। वर्ष 2013 में ही व्यापक चुनाव सुधार का मामला विधि आयोग के हवाले किया जा चुका है। इस दिशा में रिटायर्ड जज ए.पी. शाह की अध्यक्षता वाली टीम ने 2014 में ही अपनी रिर्पोट विधि आयोग को सौप दी पर इस पर आज तक अमल नहीं हो पाया। अब सुप्रीम कोर्ट ने संसद को कानून बनाने का मौका देकर स्वच्छ लोकतंत्र स्थापित किये जाने की दिशा में एक अनोखी पहल की है जिसका अमल सभी जनप्रतिनिधियों को करना चाहिए। जिससे सही लोकतंत्र की स्थापना हो सके। भविष्य में दागी जनप्रतिनिधियों के कारण लोकतंत्र की जड़ें कमजोर न हो सके । (संवाद)