मध्यप्रदेश में वह मायावती की पार्टी से गठबंधन को लेकर गंभीर थी, लेकिन मायावती की मांग उसे बहुत ज्यादा लगी। इधर कांग्रेस अपनी स्थिति उस प्रदेश में भी मजबूत पा रही है, इसलिए उसे वहां भी मायावती से गठबंधन की जरूरत नहीं लग रही है। छत्तीसगढ़ में मायावती ने अजित जोगी की पार्टी से गठबंधन कर अपना रास्ता पहले से ही अलग कर लिया है, हालांकि अपनी शर्तों पर कांग्रेस से वह वहां भी समझौता करना चाह रही थीं।

तीन राज्यों में कांग्रेस से समझौता और गठबंधन कर पाने में विफल होने के बाद मायावती ने अब कभी भी कांग्रेस से गठबंधन न करने की घोषणा कर दी है। उन्होंने देश की सबसे पुरानी इस पार्टी को सांप्रदायिक और जातिवादी भी करार दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस और भाजपा के बीच अंदरूनी तालमेल का आरोप भी लगा दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ नेता आरोप लगा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के दबाव में आकर मायावती उस तरह के राजनैतिक फैसले ले रही है। उनका कहना है कि मायावती के भाई आनंद के खिलाफ सरकार ने फाइल बना रखी है और मायावती पर दबाव बनाकर अपने मनमाफिक फैसला और बयानबाजी उनके करा रही है।

कांग्रेस नेताओं के आरोप सही भी हो सकते हैं और गलत भी, लेकिन जो मायावती की राजनीति को जानते हैं, उनको पता है कि उनकी राजनैतिक सोच और शैली शुरू से ही अलग रही है। मायावती के मेंटर कांशीराम कहा करते थे कि कांग्रेस और भाजपा में एक नागनाथ और दूसरा सांपनाथ। मायावती भी उसी विचार को मानने वाली हैं। इसलिए वे इन दोनो पार्टियों या किसी अन्य पार्टी से भी समझौता करते वक्त सिर्फ अपना और अपना हित देखती हैं। वे यह नहीं देखती कि कौन हारेगा और कौन जीतेगा, बल्कि वह यह देखती हैं हारजीत के इस खेल में उन्हें क्या हासिल होने वाला है।

जैसे अभी कांग्रेस सहित अधिकांश विपक्षी पार्टियां 2019 के चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करना चाहती हैं। कहने को तो मायावती भी यही कहती रही हैं, लेकिन वे भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए उतना व्यग्र नहीं हैं, जितना अन्य विपक्षी नेता। भाजपा का विरोध करते हुए भी वे यही चाहेंगी कि उनकी पार्टी को ज्यादा से ज्यादा फायदा हो और यदि उनका हित किसी गठबंधन या तालमेल से नहीं सधता है, तो मायावती को यह फिक्र नहीं है कि भाजपा की सरकार बने या न बने। यदि भाजपा के साथ गठबंधन से उनका हित सधता हो, तो वह उसके साथ भी जाने से कभी नहीं झिझकेगी। वे अतीत में 3 बार भाजपा के समर्थन से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। सच तो यह है कि आज मायावती जिस मुकाम पर पहुंची है, उसमें भारतीय जनता पार्टी का सबसे ज्यादा योगदान है। बहुत कम सीटें होने के बावजूद संख्या बल में उनसे दुगनी से ज्यादा होने के बावजूद भाजपा उनको मुख्यमंत्री बना दिया करती थीं।

इसलिए मायावती ने कांग्रेस को झिड़क कर वहीं किया है, जो वह सामान्य परिस्थितियों में करती रही हैं। उनके भाई की गिरफ्तारी को खतरा हो या नहीं हो, वह किसी अन्य पार्टी को लाभ पहुंचाने अथवा किसी अन्य पार्टी को नुकसान पहुंचाने के लिए गठबंधन कभी नहीं करती हैं। उनके सामने एक ही विकल्प रहता है और वह है कि किसी गठबंधन में उनका अपना क्या फायदा होता है। उनको पता है कि उत्तर प्रदेश के बाहर उनका कोई राजनैतिक वजूद नहीं है, और उत्तर प्रदेश में गठबंधन के लिए कांग्रेस की मजबूरी का लाभ उठाकर वह छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की बाहें मरोड़ रही थीं। लेकिन कांग्रेस पर उनका दबाव काम नहीं आया और उसने वही निर्णय किया, जो उसे अपनी राजनीति के हित में लगा, लेकिन अब मायावती कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में उसकी हैसियत दिखा देने की धमकी दे रही है।

इस धमकी के साथ ही उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनने की संभावना खतरे में पड़ गई है। मायावती लगातार कह रही है कि वहां वह तभी गठबंधन करेंगी, जब उन्हें सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। सम्मानजनक सीटें वे कितनी सीटों को कहती हैं, यह अभी उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन जाहिर है कि अपनी हैसियत से वे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगे और दबाव की राजनीति में वे इसलिए अखिलेश और कांग्रेस पर भारी हैं, क्योंकि भाजपा किसी भी सूरत में चुनाव हारे, इसके लिए मायावती प्रतिबद्ध नहीं हैं, बल्कि इस तरह की प्रतिबद्धता कांग्रेस और अखिलेश ने पाल रखी है। कांग्रेस तो उत्तर प्रदेश में एक छोटा खिलाड़ी है और अखिलेश की भूमिका ही वहां महत्वपूर्ण होगी।

अखिलेश यादव ने अबतक यह साबित किया है कि वे राजनैतिक रूप से अपरिपक्व हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले उन्होंने जो राजनैतिक नाटक अपने पिता के साथ मिलकर खेला वह उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता का सबूत तो था ही, कांग्रेस को 100 से भी ज्यादा सीटें देकर उन्होंने भाजपा की ऐतिहासिक जीत का रास्ता तैयार कर दिया, क्योंकि सभी सीटों पर कांग्रेसी उम्मीदवार के खड़े होने से कांग्रेस के जो वोट मिलते, उसमें 75 फीसदी वोट गठंबधन के कारण भाजपा की ओर चले गए। इस तरह कांग्रेस तो गठबंधन में पिटी ही, अखिलेश की पार्टी को भी शर्मनाक हार का मुह देखना पड़ा था। मायावती की राजनीति के सामने भी अखिलेश उसी तरह अपरिपक्व नजर आ रहे हैं, जिस तरह विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के सामने दिख रहे थे। (संवाद)