इस घटना के दो पक्ष हैं। एक पक्ष तो मैनेजर विवेक तिवारी की मौत है, जो वास्तव में बहुत दुखद है। दूसरा पक्ष है पुलिस जवान का विवेक तिवारी पर गोली चलाना। गोली कोई सामान्य परिस्थिति में नहीं चली थी। मीडिया इसके बारे में खूब झूठ फैला रहा है। अलग अलग तरह की बातें की जा रही हैं। सच कहा जाय, तो पुलिस की गोली किस प्रकार और किस हालत में चली, इसको लेकर ऐसी ऐसी बातें की गईं, जो प्रथम दृष्टि में ही अविश्वसनीय थी।
अनेक न्यूज चैनल वाले और उसके बाद कुछ अखबार भी यह बता रहे थे कि गाड़ी साधारण स्पीड से जा रही थी और दो पुलिस वाले बाइक से उसका पीछा करने लगे। कार न रोकने के कारण पुलिस वाले ने अपना बाइक गाड़ी के आगे लगा दिया। कार उस बाइक को ठोकती हुई आगे चली गई और फिर एक पुलिस वाले ने आगे से गोली मार दी। इस हास्यास्पद स्थिति को मीडिया वाले बताते रहे और इस बात को दबाया कि दरअसल जब पुलिस ने कार में बैठे तिवारी को टोका था, तो उस समय गाड़ी एक जगह खड़ी थी और उसका हेडलाइट बुझा हुआ था।
लेकिन मीडिया हर हाल में पुलिस जवान को अपराधी करार देने पर तुला हुआ है और उसे पुलिस विभाग और उत्तर प्रदेश की सरकार से भी बल मिल रहा है। पुलिस के बड़े अफसर यह घोषणा कर चुके हैं कि गोली चलाने की स्थिति वहां पैदा नहीं हुई थी और सीधे सवार को ही गोली मारने की जरूरत नहीं थी और गोली से टायर को पंक्चर करना उस समय की मांग थी। पता नहीं, जो पुलिस अफसर इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं, वे खुद क्या करते, जब उन्हें वैसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़ता, जैसा पुलिस जवान प्रशांत चैधरी ने किया था।
अब तो मीडिया तिवारी द्वारा कार लेकर भागने के लिए भी जवान चैधरी को ही जिम्मेदार बता रहा है। फौरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया जा रहा है कि चूंकि चैधरी ने पिस्तौल पहले से ही निकाल रखी थी, इसलिए वह भागने लगा। यानी यदि वह पिस्तौल नहीं निकालता, तो तिवारी कार नहीं भगाता। विचित्र और बेवकूफी भरी बातें कही जा रही हैं। भला फोरेंसिक जांच से यह कैसे पता चला कि सिपाही ने अपनी पिस्तौल कब निकाली और पुलिस का पिस्तौल देखकर कोई भाग जाता है यह कौन एक्सपर्ट कहता है। लेकिन तिवारी के भागने को तर्कसंगत बताने के लिए मीडिया एक झूठी थ्योरी लेकर सामने आ गया है।
मीडिया द्वारा खड़े किए गए झूठ के पहाड़ के बीच सच्चाई यही है कि तिवारी गाड़ी को खड़ी कर और हेडलाइट को बुझाकर पुलिस द्वारा पकड़े गए थे। पुलिस उनके पास पहुंची और उनकी गाड़ी से तीन फीट की दूरी पर उन्होंने अपनी बाइक खड़ी कर दी और उतर कर विवेक के पास पहुंचे। इसी बीच विवेक ने अपनी गाड़ी स्टार्ट कर दी और भागने के चक्कर में पुलिस की बाइक को ठोक दिया। बाइक गिर गई। संयोग से पुलिस का कोई भी जवान उस बाइक पर उस समय नहीं था। बाइके के गिरने के बाद विवेक की गाड़ी का रास्ता अवरूद्ध हो गया। इसलिए उसने गिरे बाइक के बगल से अपनी कार निकालने के लिए अपनी गाड़ी को रिवर्स किया और फिर बाइक को बचाते हुए गाड़ी आगे बढ़ाने की कोशिश की।
बाइक गिरने से गुस्से में आकर चैधरी ने अपनी पिस्तौल निकाली होगी और तैश में आकर गोली चला दी। गोली नहीं चलती तो बेहतर होता, लेकिन किस स्थिति में गोली चली, इसके बारे में हमें जजमेंटल होने की जरूरत नहीं। पुलिस जवान का कहना है कि विवेक तिवारी उस पर अपनी गाड़ी चढ़ाना चाहता था। गाड़ी चढ़ाने का मतलब है कि वह उसे कुचलकर वहां से निकल जाना चाहता था, इसलिए आत्मरक्षा में उसने गोली चला दी।
हो सकता है कि गोली चलाने के अलावा उसके पास और भी विकल्प हो। एक विकल्प तो उसे भाग जाने देना भी था, हालांकि जिस पुलिस जवान की बाइक किसी गाड़ी वाले ने ठोकर मारकर गिरा दी हो, उसे भागने की इजाजत तो दुनिया का कोई ही पुलिस वाला देगा। दूसरा विकल्प उसके पास था टायर में गोली मारकर उस गाड़ी की गति को रोक देना। लेकिन जिस तरह की गतिविधियां वहां हो रही थीं, उनके बीच निर्णय लेने के लिए बहुत ही कम समय प्रशांत चैधरी के पास था।
और उस कम समय ने उसने सीधे गोली चलाने का निर्णय ले लिया, जिसे हम एक नागरिक की हैसियत से गलत कह सकते हैं, लेकिन हमें उसके नजरिए से भी सोचना होगा। गाड़ी में शरीफ शहरी बैठा हुआ है या कोई दुर्दांत अपराधी, इसके बारे में तो उसको जानकारी उस समय रही नहीं होगी। हम यह कह सकते हैं कि विवेक तिवारी से उसकी जान को खतरा नहीं था, लेकिन निर्णय लेते समय वह क्या सोच रहा था, यह ज्यादा महत्वपूर्ण था।
दूसरी तरफ विवेक तिवारी की गलती भी कोई छोटी नहीं थी। जब पुलिस वाले उसके पास आ गए थे और वे वर्दी में थे, तो उससे भागना गलत था। रोकने के लिए पुलिस वाले ने अपनी बाइक उसकी गाड़ी के सामने खड़ी कर दी थी। बाइक को गिराकर भागने की कोशिश तो और भी गलत थी। बाइक गिरने के बाद रास्ता निकालने के लिए रिवर्स गियर में जाकर सामने खड़ी पुलिस की ओर गाड़ी बढ़ाना तो ऐसी गलती थी, जो उसकी मौत का कारण बनी। लेकिन हम उसकी गलती को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो बिल्कुल गलत है। (संवाद)
पुलिस की गोली से विवेक तिवारी की मौत
मीडिया ने एक बार फिर भंग की अपनी मर्यादा
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-10-06 10:51
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आधी रात को एक पुलिस जवान की गोली से निजी कंपनी के एक मैनेजर की मौत हो गई। एक ऐसे व्यक्ति की हत्या, जिसका कोई आपराधिक रिकाॅर्ड न हो और जो पुलिस के साथ मुठभेड़ भी नहीं कर रहा हो, निश्चय ही दुखदायी है। अपना ट्रिगर दबाते समय पुलिस के जवान या अधिकारी को निश्चय ही इसका ध्यान रखना चाहिए कि क्या उसका ट्रिगर दबाना वाकई आवश्यक है। लेकिन प्रशांत चैधरी नामक उस पुलिस जवान ने तैश में आकर गोली चला दी। गोली चलाना आवश्यक था या नहीं, इसका फैसला तो अब अदालत में ही होगा, लेकिन मीडिया जिस तरह से उस पुलिस जवान को अपराधी साबित करने में जुटी हुई है, वह निश्चय ही निंदनीय है।