दो परमाणु शक्तियों भारत और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के बीच वार्षिक बैठक पिछले 18 वर्षों से लगातार होती रही है। उल्लेखनीय है कि रूस भारत का अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सदैव मददगार साबित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अथवा एनएसजी में भारत की सदस्यता के लिए समर्थन की बात हो या शंघाई सहयोग संगठन की सदस्यता दिलाने में भारत की मदद करने का मामला, रूस हमेशा हमारा भरोसेमंद मित्र साबित हुआ है जबकि कठिन परिस्थितियों में भारत को अमेरिका जैसे देश से कोई सहायता मिलने की संभावना नहीं है। 13 अप्रैल 1948 को दोनों देशों के बीच एतिहासिक दोस्ती दुनिया ने देखी थी, उसके बाद से दोनों देश एक-दूसरे के पूरक बने रहे हैं। 1991 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद दोनों देशों के आपसी रिश्तों में कुछ शिथिलता आई थी लेकिन जब ब्लादिमीर पुतिन ने रूस की सत्ता संभाली तो पुरानी दोस्ती फिर पहले की तरह परवान चढ़ने लगी और वर्ष 2000 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस दोस्ती को प्रगाढ़ करने के उद्देश्य से दोनों राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों की वार्षिक भेंट की परम्परा का श्रीगणेश किया, जिसमें दोनों देशों द्वारा क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण फैसले भी लिए जाते हैं। इसी कड़ी में 19वीं वार्षिक बैठक में पांच अरब डाॅलर के रक्षा सौदे सहित कुल दस अरब डाॅलर के ऊर्जा, टैक्नोलाॅजी, साइंस, रेलवे, अंतरिक्ष, शिक्षा, पर्यटन इत्यादि कई क्षेत्रों में कुछ अहम समझौते किए गए हैं।
भारतीय वायुसेना दुनिया की चैथी सबसे बड़ी वायुसेना मानी जाती है और निसंदेह 37 हजार करोड़ रुपये की लागत से एस-400 एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल प्रणाली का सौदा भारत वायुसेना को बेमिसाल ताकत प्रदान करेगा। भारतीय वायु सेना को 45 स्क्वाड्रन अर्थात् वायुसेना की टुकड़ी की आवश्यकता है किन्तु फिलहाल वायुसेना के पास केवल 31 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं, जिनमें अधिकांश पुराने रूसी लड़ाकू विमान ही शामिल हैं और आगामी 14 वर्षों बाद इनकी संख्या घटकर मात्र 16 रह जाएगी जबकि अगर आने वाले समय में चीन या पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसी स्थितियां पैदा होती है तो वायुसेना को उस समय कम से कम 42 स्क्वाड्रन की जरूरत होगी। इसी के दृष्टिगत दिसम्बर 2017 में वायुसेना ने संसद की डिफेंस स्थायी समिति को बताया था कि उसे आगामी 10 वर्षों में मिग-21, मिग-27 तथा मिग-29 फाइटर जेट सहित 14 और स्क्वाड्रन की आवश्यकता होगी। बता दें कि प्रत्येक स्क्वाड्रन में 17 से 18 फाइटर जेट होते हैं। बहरहाल, अब एस-400 प्रणाली भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल करने के लिए रूस के साथ महत्वपूर्ण करार होने के बाद वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ का कहना है कि एस-400 तथा राफेल विमान वायुसेना के लिए ‘बूस्टर खुराक’ होगी।
मल्टी फंक्शन रडार से लैस एस-400 आज की तारीख में दुनियाभर में सर्वाधिक उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियों में से एक है, जो रूसी सेना में 2007 में सम्मिलित हुई थी। यह प्रणाली जमीन से मिसाइल दागकर हवा में ही दुश्मन की ओर से आ रही मिसाइलों को नष्ट करने में सक्षम है, जो एक साथ 36 लक्ष्यों और दो लाॅन्चरों से आने वाली मिसाइलों पर निशाना साध सकती है और 17 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक अपने लक्ष्य पर हमला कर सकती है। इसकी रेंज 400 किलोमीटर है और यह 600 किलोमीटर की दूरी तक निगरानी करने की क्षमता से लैस है, जिससे पाकिस्तान के चप्पे-चप्पे पर नजर रखना संभव हो सकेगा। यह किसी भी प्रकार के विमान, ड्रोन, बैलिस्टिक व क्रूज मिसाइल तथा जमीनी ठिकानों को 400 किलोमीटर की दूरी तक ध्वस्त करने में सक्षम है। इसके जरिये भारतीय वायुसेना देश के लिए खतरा बनने वाली मिसाइलों की पहचान कर उन्हें हवा में ही नष्ट कर सकेगी। भारत के लिए बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहे पड़ोसी देश चीन के पास भी यह मिसाइल रक्षा प्रणाली है, जिसने रूस के साथ 2014 में ही इसके लिए समझौता किया था, इसलिए चार हजार किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा के मद्देनजर हमारे लिए भी यह रक्षा प्रणाली हासिल करना और अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत करते हुए वायुसेना की ताकत बढ़ाना बेहद जरूरी हो गया था।
अब सवाल यह है कि आखिर अमेरिका रूस के साथ किसी के भी देश के सामरिक संबंधों के खिलाफ क्यों है? इसका एक कारण तो यही है कि विगत चार वर्षों से अमेरिका और रूस के संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं। 2014 में जब रूस ने यूक्रेन से क्राइमिया छीन लिया गया था, तब यह तनाव उत्पन्न हुआ था और उसके दो वर्ष बाद 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में रूस के हस्तक्षेप ने इस तनाव को और बढ़ा दिया। इसी के चलते अमेरिका द्वारा कई रूसी कम्पनियों पर प्रतिबंध लगा दिए गए और रूस, ईरान तथा उत्तर कोरिया पर राजनीतिक व आर्थिक प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से ही उसने गत वर्ष एक विशेष कानून बनाते हुए अन्य देशों को भी इन तीनों देशों के साथ रक्षा समझौते करने से रोकने का प्रयास किया।
हालांकि भारत के लिए दिनों-दिन मुसीबत बनते जा रहे पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान के साथ पिछले कुछ वर्षों में रूस के संबंध बेहतर हुए हैं लेकिन अभी तक ऐसा कोई अवसर सामने नहीं आया है, जब इस वजह से भारत और रूस के घनिष्ठ संबंधों पर कोई आंच आती दिखी हो। दोनों देश आर्थिक मोर्चे पर भी एक दूसरे के हितों का ख्याल रखते नजर आए हैं। वैसे भी भारत एक विशाल और विश्व पटल पर तेजी से मजबूत ताकत के रूप में आगे बढ़ता देश है, इसलिए रूस के साथ-साथ अमेरिका भी उसकी अहमियत बखूबी समझता है। अमेरिका की तकलीफ यह है कि पिछले कुछ वर्षों में काफी कोशिशों के बाद भारत के साथ अमेरिका का रक्षा निर्यात काफी बढ़ा है और अमेरिका हरगिज नहीं चाहेगा कि रूस जैसे देशों के साथ भारत के इतने बड़े रक्षा सौदों के चलते उसके हथियार व्यापार पर कोई आंच आए। गौरतलब है कि भारत 15 फीसदी हथियार अमेरिका से जबकि 11 फीसदी इजरायल से खरीद रहा है।
दूसरी ओर अगर भारत की रक्षा जरूरतों की बात करें तो भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदार देशों में से एक है, जो अपनी रक्षा जरूरतें पूरी करने के लिए बहुत ही कम हथियार खुद निर्मित करता है और सर्वाधिक हथियार व रक्षा उपकरण रूस से ही खरीदता है। कभी भारत की करीब 80 फीसदी रक्षा जरूरतें रूस से ही पूरी होती थी किन्तु वक्त की मांग के अनुरूप भारत ने अमेरिका, फ्रांस और इजरायल के साथ भी कई बड़े रक्षा समझौते किए लेकिन फिर भी करीब 62 फीसदी रक्षा सौदे भारत आज भी रूस के साथ ही करता है। अगर 2013 से 2017 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनियाभर में हथियारों का करीब 12 फीसदी आयात भारत में ही हुआ, जो अन्य देशों के मुकाबले सर्वाधिक था। फिलहाल भारत के लिए जटिल स्थिति यह है कि उसे एक तरफ अपने भरोसेमंद कूटनीतिक सहयोगी रूस और दूसरी तरफ अस्थायी किन्तु मजबूत सहयोगी अमेरिका दोनों के साथ अपने कूटनीतिक संबंध बनाए रखने हैं लेकिन फिर भी अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस के साथ रक्षा करार करके भारत ने बड़े साहस के साथ यह साबित कर दिखाया है कि अमेरिका हो या कोई अन्य देश, वह अब उनका पिछलग्गू नहीं बना रह सकता। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भारत-रूस के बीच 19वें वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन के दौरान हुए रक्षा करार देश के रक्षा क्षेत्र में एक युग की शुरूआत है। (संवाद)
रक्षा क्षेत्र में भारत-रूस की बढ़ती साझेदारी
वायुसेना को बेमिसाल ताकत प्रदान करेगी एस-400
योगेश कुमार गोयल - 2018-10-09 12:32
रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जाएगी। दरअसल यह यात्रा ऐसे वक्त पर हुई, जब भारत-रूस की दशकों पुरानी मित्रता पर चुनौतियों के बादल मंडरा रहे थे। भारत-रूस की इस शिखर बैठक के दौरान जहां करीब 5 अरब डाॅलर का एस-400 एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल रक्षा प्रणाली का सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण करार हुआ, वहीं अमेरिका की प्रतिबंधों की धमकियों को दरकिनार कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका को भी सख्त संदेश दे दिया कि भारत अपनी सामरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसी धमकियों की परवाह नहीं करेगा। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री के इस रूख से अमेरिका की दादागिरी को झटका लगा है और आने वाले समय में विश्व पटल पर भारत की दमदार छवि उभरकर सामने आएगी।