लेकिन जब परिवार के अंदर की तीसरी वरिष्ठ सदस्या मीसा भारती ने खुद दोनों भाइयों के बीच संघर्ष की बात कही, तो फिर संदेह करने की कोई गुंजायश ही नहीं रही। सबकुछ आइने की तरह साफ हो गया कि दोनों भाइयों के बीच संबंध अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं, जब तेज प्रताप अपने को कृष्ण और अपने छोटे भाई तेजस्वी को अर्जुन कहा करते थे। दरअसल इस तरह का संबंध दोनों के बीच लालू यादव ने बनाया था और आने वाले दिनों में दोनों के बीच किसी प्रकार की टकराव न हो, इसलिए अपने बड़े बेटे को कृष्ण कहकर अपने छोटे बेटे से श्रेष्ठतर बताने की कोशिश की थी और अपने बेटे को कमतर बता कर भी अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी अघोषित रूप से घोषित कर रखा था। तेज प्रताप ने भी यह स्वीकार कर लिया था कि कृष्ण की तरह उन्हें हस्तिनापुर की सत्ता ( लालू के राजनैतिक उत्तराधिकार) में कोई दिलचस्पी नहीं है और उत्तराधिकरी हुए बिना भी अपने छोटे भाई के ऊपर उनकी वरीयता कायम है।

लेकिन राजनीति तो अब मात्र सत्ता का खेल रह गई है और यदि आप यह खेल नहीं खेलते हैं, तो फिर आप राजनीति से ही बाहर हो जाते हैं। आज राजनीति की सफलता का माननंड सत्ता प्रतिष्ठानों मे उपस्थिति और नियंत्रण रह गया है। तेज प्रतान इसका अपवाद नहीं हो सकते। वे लालू यादव के बड़े बेटे हैं और और पारंपरिक सामंती या कृषक समाज के मूल्यों के अनुसार लालू की विरासत पर उनका पहला अधिकार बनता है। वे कृष्ण की भूमिका को अपनाने के लिए भी तैयार हैं, लेकिन शर्त यह होनी चाहिए कि अर्जुन उनका आदेश माने। वे सत्ता पर बैठने के मोह से अपने को अलग तो रख सकते, लेकिन वह यह जरूर चाहेंगे कि जो सत्ता पर बैठा है, वह उन्हें नजरअंदाज नहीं करे।

और उनकी समस्या तब शृरू हुई, जब उन्हें नजरअंदाज किया जाने लगा। वे राजनीति में हैं, तो उनके इर्द गिर्द के लोगों की भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा होगी और वे पार्टी का पद चाहेंगे। अब चूंकि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र तो है नहीं कि लोकतांत्रिक तरीके से कोई किसी पद पर बैठ सके। पद के लिए नेताओं की गणेश परिक्रमा करनी पड़ती है और तेज प्रताप की गणेश परिक्रमा करने वाले भी पद चाहते थे, लेकिन तेज प्रताप उन्हें पद पर बिठाने में असफल हो रहे थे। वे कभी अपनी मां से तो कभी अपने भाई से और कभी पार्टी की बिहार ईकाई के अध्यक्ष से अपने समर्थक युवकों को पद देने की सिफारिश करते थे, लेकिन उनकी चलती ही नहीं थी।

जाहिर है, अपने समर्थकों को पद देने के लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से अपने असंतोष का इजहार करना पड़ा और उसके साथ ही टकराव भी सतह पर आ गई। उन्हें पता चल गया कि कृष्ण बनकर उन्हें अपमानित ही होना पड़ेगा। इसलिए दोनों भाइयों के बीच में संबंधों का जो सम्मानपूर्ण संतुलन लालू यादव ने बना दिया था, वह संतुलन बिगड़ गया है। यदि लालू यादव जेल में नहीं होते, तो वे दोनों बेटों के संबंधों के बीच बिगड़ते संतुलन को समाप्त कर सकते थे। सत्ता की बागडोर उनके हाथ में ही होती और यदि तेज प्रताप को कोई शिकायत होती, तो अपने पिता लालू यादव से ही होती और वे उनकी शिकायतों को या तो दूर करते या खारिज कर देते।

लालू यादव के राजनीति से बाहर हो जाने के बाद राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव हो चुका है। सदानंद सिंह, शिवानंद तिवारी और रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता अब अतीत होते जा रहे हैं और युवा कार्यकत्र्ता और नेता पार्टी के पायदान पर ऊपर चढ़ने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यह गणेश परिक्रमा की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। उन्हें पता है कि तेजस्वी ज्यादा शक्तिशाली हैं। इसलिए उनकी पहली पसंद तेजस्वी की गणेश परिक्रमा करना ही हैं, लेकिन जो वहां नहीं पहुंच सकते, वे तेज प्रताप की गणेश परिक्रमा को भी अपनी राजनीति के भविष्य के लिए बेहतर समझते हैं। और वे तेज प्रताप की सहायता से पार्टी के ऊंचे पायदानों पर चढ़ना चाहेंगे और तेज प्रताप भी अपने अपनी सत्ता का अहसास करने और कराने के लिए अपने समर्थकों को पार्टी के अंदर स्थापित करने की कोशिश करते हैं। इसीसे टकराव बढ़ता है और एक टकराव नये टकरावों को जन्म देता है।

सत्ता के इस संघर्ष में मां राबड़ी देवी अपने छोटे बेटे के साथ है, लेकिन तेज प्रताप भी पूरी तरह से अकेला नहीं हैं। उनकी शादी एक राजनैतिक परिवार मे हो गई है। वह दारोगा राय का परिवार है। दारोगा राय बिहार के प्रथम यादव मुख्यमंत्री हैं। जब लालू यादव पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के शीर्ष पर भी नहीं पहंुचे थे, तो दरोगा राय बिहार की सत्ता के शीर्ष पर थे। तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राय दारोगा राय की पोती हैं और उनके पिता चन्द्रिका राय भी प्रदेश के मंत्री रहे हैं। अपने ससुराल पक्ष से राजनैतिक दिशा तेज प्रताप को जरूर मिल रही होगी और उन्हें अब बिहार की राजनीति मे कृष्ण और अर्जुन का अंतर समझ में आ गया होगा।

दोनों भाइयों की टकराव का खुलासा करने वाली मीसा भारती लालू- राबड़ी की सबसे बड़ी संतान हैं। वह भी राजनीति में हैं। वह लोकसभा का एक चुनाव लड़कर हार चुकी हैं और बाद में राज्यसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं। तेजस्वी की तरह वह राजनीति मे मुखर नहीं हैं, लेकिन राजनीति में होने के कारण सत्ता के संघर्ष में शामिल होने से बच नहीं सकती। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लालू परिवार के अंदर चलने वाले सत्ता संघर्ष में क्या वे भी हाथ आजमाएंगी? (संवाद)