इसके अलावा, ऋण जाल के शिकार होने के रास्ते पर अन्य कमजोर राष्ट्र भी हैं। वे नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार हैं। भारत बेल्ट और रोड पहल में शामिल नहीं है। फिर भी, यह चीनी ऋण जाल के प्रभाव से बहुत दूर नहीं है।

2017 में, श्रीलंका ऋण जाल में गिर गया, जिसके कारण हम्बनटोटा बंदरगाह चीन को सौंप दिया गया। अफ्रीकी राष्ट्र जिबूती एक प्रमुख बंदरगाह पर अपना नियंत्रण चीन के हाथों खोने की कगार पर है। मलेशिया के नव निर्वाचित प्रधान मंत्री महाथिर मोहम्मद ने चीनी विकास कर्ज ने लेने का संदेश देने के लिए चीन का दौरा किया। उन्होंने कहा कि मलेशिया 20 अरब अमेरिकी डॉलर का पूर्वी तट रेल लिंक परियोजना - एक विशाल बेल्ट और रोड परियोजना को रद्द कर रहा है। टोंगा के प्रधानमंत्री अकिलिस पोहिवा ने कहा कि प्रशांत द्वीप राष्ट्रों को चीन से ऋण को माफ करने का अनुरोध करना चाहिए।

दक्षिण पूर्व एशिया में अफ्रीका के छोटे राष्ट्रों के नेताओं पर चीनी कर्जजाल के बादल मंडरा रहे हैं। उन्होंने बेल्ट और रोड पहल में भाग लेने के अपने हिस्से के रूप में चीन से पर्याप्त विकास ऋण स्वीकार किए हैं, जिससे वे कर्ज जाल में पडते दिख रहे हैं। इंडोनेशिया का मामला भी कुछ वैसा ही है। ऋण जाल इन देशों को वित्तीय अशांति में धकेल देगा और अपनी खुद की विकास परियोजनाओं को वित्त पोषित करने में वे विफल होने लगेंगे।

ऋण के जाल का उपयोग करने वाले चीनी ऋण दक्षिण पूर्व एशिया में चीनी आर्थिक पहुंच फैलाने के एक गुप्त प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। ऋण के बढ़ते बोझ से चीन के लिए कर्ज के लिए बेचैन देशों में व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए थोपी गई शर्तों के कारण उसके लिए व्यापार के नये दायरे खुल जाएंगे, जो अंततः इन देशों में चीनी आर्थिक उपनिवेशवाद को स्थापित करेगा। उत्तर पूर्व और एशियान के बीच कनेक्टिविटी के विकास से नई पहलों के माध्यम से एशियान के साथ व्यापार और निवेश संबंधों का विस्तार करने के रास्ते में यह भारत को एक मजबूत चुनौती देगा।

चीनी बेल्ट और रोड पहल और कनेक्टिविटी के लिए आसियान मास्टर प्लान (एएमपीसी) के बीच देशों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए कई समानताएं हैं। चीन और आसियान के बीच बेहतर कनेक्टिविटी एशियान बाजार में प्रवेश करने के लिए चीन के दायरे को मजबूत करेगी और इन देशों के बढ़ते कर्ज बोझ से व्यापार और निवेश पर एकाधिकार करने में उसे मदद मिलेगी, जिससे भारत के लिए इस बाजार में प्रवेश की गुंजाइश कम हो जाएगी।

चीनी ऋण जाल का मतलब आसियान देशों की संप्रभुता खोना है। ऋण इक्विटी में बदल रहे हैं और अंततः स्वामित्व चीन को प्राप्त होता जाएगा। भारत के लिए यह व्यापार के अवसरों को खोने के अलावा, यह सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ाएगा। उदाहरण के लिए, श्रीलंका के हंबंतोटा बंदरगाह के स्वामित्व के हस्तांतरण के साथ चीन ने भारत के लिए सुरक्षा चिंता को बढ़ा दिया। बंदरगाह का उपयोग चीन के सैन्य आधार के लिए किया जा सकता है।

आर्थिक साझेदारी के लिए क्षेत्रीय सहयोग (आरसीईपी) दुनिया के सबसे बड़े व्यापार ब्लॉक के रूप में उभर रहा है। इसमें शामिल होने के लिए भारत के लिए ऋण जाल एक अतिरिक्त चिंता होनी चाहिए। दो डेडलाइन के विफल होने के बाद इसकी पूरी संभावना है कि आरसीईपी इस साल के अंत तक आकार ले लेगा।

चीन आरसीईपी में सबसे बड़ा हितधारक है, जिसमें आसियान के 10 देश व अन्य 6 (चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और भारत) देश शामिल हैं। वर्तमान में, भारत में आरसीईपी के साथ व्यापार घाटा है। आरसीईपी में चीन के प्रभुत्व को देखते हुए भारत के लिए प्रमुख चिंता यह है कि चीन के व्यापार उपनिवेशीकरण से आरसीईपी में भारत के व्यापार विस्तार बहुत ही कठिन हो जाएगा।

दूसरे शब्दों में, चीन और उसके कर्ज जाल में फंसे राष्ट्र इण्?स नये व्यापार ब्लॉक में गेमचेंजर साबित होंगे। भारतीय उद्यमियों को डर है कि ऋण-बोझ वाले राष्ट्र चीन के लिए पीछे के दरवाजे के माध्यम से टैरिफ रियायतों के लाभों का लाभ उठाने के लिए और अवसर खोलेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत चीन को टैरिफ रियायतों के लिए व्यापारिक वस्तुओं का कम कवरेज प्रदान करता। (संवाद)