वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रदेश में करारी हार हुई थी। कांग्रेस को कुल मतदान का 33.1 प्रतिशत ही मिल पाये थे। जबकि भाजपा को 45.2 प्रतिशत मत मिले थे। उस चुनाव में कांग्रेस 102 सीटों से घटकर मात्र 21 सीटो पर आ गयी थी। कांग्रेस को 75 सीटो का घाटा हुआ था। उसके बाद 2014 में हुये लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस प्रदेश की सभी 25 सीटे हार गयी थी। कांग्रेस की करारी हार के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर गुर्जर नेता सचिन पायलेट को लाया गया था। युवा सचिन पायलेट ने निष्क्रिय पड़ी कांग्रेस को धीरे-धीरे सक्रिय करना शुरू किया।
सचिन पायलेट ने प्रदेश के सभी जिलो का दौरा कर कांग्रेसजनो को भाजपा सरकार से मुकाबला करने को तैयार किया। आज हर कोई मानकर चल रहा है कि राजस्थान में अगली सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। इसका मुख्य कारण मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को लेकर आम जन में नाराजगी माना जा रहा है। वसुन्धरा राजे से राजपूत समाज की नाराजगी को कांग्रेस अपने लिये शुभ संकेत मान रही है। कांग्रेस के नेता वसुन्धरा राजे से नाराज राजपूत नेताओं को अपने पाले में लाने का पूरा प्रयास कर रहें हैं। कभी भाजपा के बड़े नेता रहे जसवंतसिंह के विधायक पुत्र मानवेन्द्र सिंह भाजपा छोडकर कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। कांग्रेस की कई अन्य राजपूत नेताओं पर भी नजर है जो भाजपा से नाराज है। इनमें करणी सेना के अघ्यक्ष लोकेन्द्र सिंह कालवी प्रमुख है।
राजस्थान में किसान मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है व कांग्रेस हर संभव किसानों को अपने पक्ष में करना चाहती है। किसानो में जाट मतदाता सबसे प्रभावी व मुखर है। राजस्थान में करीबन 80 से 90 सीटो पर जाट मतदाता निर्णायक रहते हैं। ऐसे में कांग्रेस जाट नेताओं पर डोरे डाल रही है। कांग्रेस के पास आज एक भी जाट नेता ऐसा नहीं है जो अपने जिले में भी असर रखता हो। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व दातारामगढ़ विधायक नारायण सिंह बूढ़े हो चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी स्वयं को जाटो में स्थापित नहीं कर पाये हैं। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान लगातार तीन बार हार चुके हैं। 2013 के चुनाव में तो उनकी उनके गृह क्षेत्र मंडावा में जमानत तक जब्त हो चुकी है। महिपाल मदेरणा जेल में हैं। उनकी सीट पर उनकी पत्नी पिछला चुनाव हार चुकी है। डा. हरि सिंह लगातार दलबदल के कारण जनता में प्रभाव खो चुके हैं। पूर्व मंत्री राजन्द्र चैधरी को अशोक गहलोत ने हासिये पर कर दिया है। नागौर के हरेन्द्र मिर्धा पिछली बार निर्दलिय चुनाव लड़ कर हार चुके हैं। नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा 2009 से 2014 तक सांसद रही मगर 2014 का लोकसभा चुनाव हार चुकी है।
वर्तमान में राजस्थान में जाट समाज के पांच सांसद व 31 विधायक है। जिनमें पांचो सांसद व 21 विधायक भाजपा के हैं। 31 विधायकों में 6 कांग्रेस के 3 निर्दलिय व एक राजपा से हैं। इस तरह पूर्व में जाटो का ज्यादा झुकाव भाजपा की तरफ ही रहा है। अजमेर लोकसभा सीट से जाट सांसद सांवरलाल जाट के निधन पर भाजपा ने जहां उनके पुत्र रामस्वरूप लाम्बा को टिकट दिया वहीं कांग्रेस ने ब्राम्हण समाज के डा.रघु शर्मा को टिकट दिया जिसमें डा.रघु शर्मा के जीतने से राजस्थान में एक जाट सांसद कम हो गया।
राजस्थान में गुर्जर समाज कई वर्षो से पांच प्रतिशत विशेष आरक्षण देने की मांग करता आ रहा है। मगर संवैधानिक बंदिशो के चलते ऐसा होना सम्भव नहीं हैं। वर्तमान में गुर्जर समाज भाजपा पर वादा खिलाफी का आरोप लगा कर सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहा है। कांग्रेस गुर्जरों को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलेट स्वयं गुर्जर समाज से आते हैं। इस कारण वो गुर्जर समाज को यह समझाने का प्रयास कर रहें है कि यदि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो वो मुख्यमंत्री बनने के प्रबल दावेदार है। यदि वो मुख्यमंत्री बनते हैं तो गुर्जर समाज का प्रदेश में पहला मुख्यमंत्री होगा। एक बार वो मुख्यमंत्री बन गये तो समाज की सभी समस्यायें सुलझा देंगें। जैसे उनके पिता राजेश पायलेट ने हिमाचल प्रदेश में गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करवाकर लाभ दिलाया था। कुछ वैसा ही लाभ वो राजस्थान के गुर्जरो को भी दिलवा देंगें।
कांग्रेस टिकट का हर दावेदार मान कर चल रहा है कि टिकट मिलते ही उसकी जीत पक्की है। ऐसे में टिकटों की दौड़ में एक दूसरे की जमकर टांग खिंचाई की जा रही है। प्रतिद्वदियों के गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। राजस्थान में सचिन पायलेट व अशोक गहलोत के दो खेमे बन चुके हैं। दानो के समर्थक एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं चूक रहें हैं। सोशल मिडिया पर दोनो के समर्थक अपने नेता को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहें हैं। सचिन पायलेट के समर्थक कह रहें है कि राजस्थान में गहलोत ने 2013 के चुनाव में कांग्रेस को 200 में से मात्र 21 सीटो पर ही जीत दिला पाये थे। सचिन पायलेट ने साढ़े चार साल तक संघर्ष कर कांग्रेस को प्रदेश में सरकार बनाने के मुकालबे में ला खड़ा किया है तो मुख्यमंत्री का हक उन्ही का बनता है। गहलोत तो वैसे भी चार साल तक शान्त बैठे थे अब कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता देख चुनावो के समय सक्रिय हुये हैं।
राजस्थान में कांग्रेस व सट्टा बाजार भाजपा को बहुत कमजोर मान रहा है। मगर भाजपा सरकार ने जनहित के कई ऐसे काम किये है जिनको जनता आज भी अपने लिये फायदेमन्द मान रही है। भाजपा सरकार ने भामाशाह कार्ड योजना प्रारम्भ की थी जिसमें तीन लाख रूपये तक की मुफ्त चिकित्सा का प्रवधान है। भामाशाह कार्ड का प्रदेश में लाखों लोगो ने फायदा उठाया है। इस कार्ड के माध्यम से काफी लोगों ने निशुल्क हृदय में बाल्व तक डलवाया है। वसुन्धरा सरकार ने प्रदेश के तीस लाख किसानो का 50 हजार रूपये तक का कृषि ऋण माफ किया है। प्रदेश के किसानो के ट्यूबवैल पर प्रतिवर्ष दस हजार रूपये का अनुदान देना स्वीकृत किया है। निजी वाहनो को स्टेट हाई वे पर टोल टेैक्स में छुटकारा दिलाना, हाल ही में हजारों ऐसे शिक्षकों को उनके गृह जिले में स्थानान्तरण करना जो गत 15-20 वर्षों से दूसरे जिलो में कार्यरत थे। गत पांच वर्षो में भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप ना लगना भाजपा सरकार का मजबूत पक्ष है। (संवाद)
राजस्थान विधानसभा चुनावः भाजपा विरोधी माहौल को भुनाने में लगी है कांग्रेस
रमेश सर्राफ - 2018-10-29 12:43
राजस्थान में होने जा रहे आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह से आाशान्वित नजर आ रही है। राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलेट व राजस्थान के दो बार मुख्यमंत्री रहे व वर्तमान में कांग्रेस के संगठन महामंत्री अशोक गहलोत पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी लगने लगा है कि उनकी पार्टी की लगातार हो रही हार का सिलसिला राजस्थान से ही टूट सकता है सो वो भी लगातार राजस्थान का दौरा कर रहें हैं।